[२६०]
कैंचा आत्मा कैंचा देह |
माझा मी चि नि:संदेह ||१||
कैंचें कर्म कैंचा कर्ता |
अवघी एक माझी सत्ता ||२||
कैंचें विश्व कैंचें भान |
मी चि आपणा प्रमाण ||३||
मिलोनिया मीतूंपण |
स्वामी झाला सच्चिद् घन ||४||
[२६१]
राम-नामी रंगे मन |
कैंची भूक कैची तहान ||१||
कैंचा राहे देह-भाव |
नुरे दिक्कालासी ठाव ||२||
कैंची आधि कैंची व्याधी |
अवघी संपली उपाधि ||३||
नित्य निवांत निर्भय |
स्वामी झाला राममय ||४||
||श्रीकृष्णापर्णमस्तु ||
Wednesday, July 6, 2011
Tuesday, July 5, 2011
[२५७]
छाया तैसा देह मानितों स्वभावें |
नाही आम्हां ठावें सुख-दु:ख ||१||
जन्म मरणाचा संपला संसार |
झाला साक्षात्कार स्व-रूपाचा ||२||
कैंचा देश-काळ विश्व चि केवळ |
माया-मृगजळ कळों आलें ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही अनादि अनंत |
सुख-दु:खातीत स्वयंसिद्ध ||४||
[२५८]
काम-क्रोध-व्यथा नाहीं भय चिंता |
संसाराची वार्ता दूर ठेली ||१||
लौकिकाचा पांग फेडिला सहजें |
सांडोनिया ओझें अहंतेचे ||२||
न सोडवे मज आत्म-सुख गोडी |
भावें दिली बुडी प्रेम-रंगी ||३||
स्वामी म्हणे आता झालों सुख-रूप |
कोण करी माप स्वानंदाचे ||४||
[२५९]
देह नव्हे ऐसा केलों गुरु-राये |
देखिली म्या सोये स्व-रुपाची ||१||
जन्म-मरणाची संपली ते वार्ता |
दूर ठेली चिंता संसाराची ||२||
आतां आत्म-रूप झालें त्रिभुवन |
हारपले भान दिक्कालाचें ||३||
स्वामी म्हणे मन होतां चि उन्मन |
लाधलें निधन स्वानंदाचें ||४||
छाया तैसा देह मानितों स्वभावें |
नाही आम्हां ठावें सुख-दु:ख ||१||
जन्म मरणाचा संपला संसार |
झाला साक्षात्कार स्व-रूपाचा ||२||
कैंचा देश-काळ विश्व चि केवळ |
माया-मृगजळ कळों आलें ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही अनादि अनंत |
सुख-दु:खातीत स्वयंसिद्ध ||४||
[२५८]
काम-क्रोध-व्यथा नाहीं भय चिंता |
संसाराची वार्ता दूर ठेली ||१||
लौकिकाचा पांग फेडिला सहजें |
सांडोनिया ओझें अहंतेचे ||२||
न सोडवे मज आत्म-सुख गोडी |
भावें दिली बुडी प्रेम-रंगी ||३||
स्वामी म्हणे आता झालों सुख-रूप |
कोण करी माप स्वानंदाचे ||४||
[२५९]
देह नव्हे ऐसा केलों गुरु-राये |
देखिली म्या सोये स्व-रुपाची ||१||
जन्म-मरणाची संपली ते वार्ता |
दूर ठेली चिंता संसाराची ||२||
आतां आत्म-रूप झालें त्रिभुवन |
हारपले भान दिक्कालाचें ||३||
स्वामी म्हणे मन होतां चि उन्मन |
लाधलें निधन स्वानंदाचें ||४||
Monday, July 4, 2011
[२५५]
' अहं देह ' वृत्ती पावते विनाश |
येतां उदयास आत्म-ज्ञान ||१||
अज्ञानाचा नाश करोनियां ज्ञान |
होतसे विलीन आत्म-रुपीं ||२||
' अहं आत्मा ' ह्या हि वृत्तीची निवृत्ती |
आत्म-रूप-स्थिती ती चि जाण ||३||
स्वामी म्हणे कैंची प्रवृत्ती-निवृत्ती |
शब्दातीत स्थिती स्वरूपाची ||४||
[२५६]
नाना रुपी विश्वीं नटलेंसे भासे |
परी एक असे आत्म-रूप ||१||
जैसे सान थोर होती अलंकार |
परी तें साचार सुवर्ण चि ||२||
वस्त्री ओत-प्रोत तंतु चि केवळ |
तरंगी तें जळ अभिन्नत्वें ||३||
स्वामी म्हणे तैसे विश्वी निरंतर |
स्थिर अविकार आत्म-तत्व ||४||
' अहं देह ' वृत्ती पावते विनाश |
येतां उदयास आत्म-ज्ञान ||१||
अज्ञानाचा नाश करोनियां ज्ञान |
होतसे विलीन आत्म-रुपीं ||२||
' अहं आत्मा ' ह्या हि वृत्तीची निवृत्ती |
आत्म-रूप-स्थिती ती चि जाण ||३||
स्वामी म्हणे कैंची प्रवृत्ती-निवृत्ती |
शब्दातीत स्थिती स्वरूपाची ||४||
[२५६]
नाना रुपी विश्वीं नटलेंसे भासे |
परी एक असे आत्म-रूप ||१||
जैसे सान थोर होती अलंकार |
परी तें साचार सुवर्ण चि ||२||
वस्त्री ओत-प्रोत तंतु चि केवळ |
तरंगी तें जळ अभिन्नत्वें ||३||
स्वामी म्हणे तैसे विश्वी निरंतर |
स्थिर अविकार आत्म-तत्व ||४||
Sunday, July 3, 2011
[२५३]
आड येतां विघ्न सोडी सुदर्शन |
भक्तां नारायण सांभाळितो ||१||
धरोनियां हात नेई पैलतीरा |
सोडवी संसारापासोनियां ||२||
पतित-पावन अनाथांचा नाथ |
पुरवी मनोरथ भाविकांचे ||३||
स्वामी म्हणे होई दासाचा हि दास |
येई नाना वेष धरोनियां ||४||
[२५४]
लौकिकाची मात सांडावी समस्त |
सेवावा एकांत आवडीनें ||१||
निर्वातीचा दीप तेवतो निवांत |
तैसी वृत्ती शांत असों द्यावी ||२||
अहंतेची नीद न लागो जीवास |
जागा सोsहं-ध्यास निरंतर ||३||
ठाईचि बैसोन करावें साधन |
भावें व्हावें लीन गुरुपाई ||४||
स्वामी म्हणे तुम्ही दिगंबरदास |
रहावें उदास देह-धर्मी ||५||
आड येतां विघ्न सोडी सुदर्शन |
भक्तां नारायण सांभाळितो ||१||
धरोनियां हात नेई पैलतीरा |
सोडवी संसारापासोनियां ||२||
पतित-पावन अनाथांचा नाथ |
पुरवी मनोरथ भाविकांचे ||३||
स्वामी म्हणे होई दासाचा हि दास |
येई नाना वेष धरोनियां ||४||
[२५४]
लौकिकाची मात सांडावी समस्त |
सेवावा एकांत आवडीनें ||१||
निर्वातीचा दीप तेवतो निवांत |
तैसी वृत्ती शांत असों द्यावी ||२||
अहंतेची नीद न लागो जीवास |
जागा सोsहं-ध्यास निरंतर ||३||
ठाईचि बैसोन करावें साधन |
भावें व्हावें लीन गुरुपाई ||४||
स्वामी म्हणे तुम्ही दिगंबरदास |
रहावें उदास देह-धर्मी ||५||
Saturday, July 2, 2011
[२५१]
कोण पाहे देह सबळ दुर्बळ |
झालों मी केवळ ब्रह्मरूप ||१||
कोण पाहे आतां संपत्ती विपत्ती |
जाहलीसे मति आत्म-रूप ||२||
प्रपंचाचा ठाव गेला भेद-भाव |
प्रकटला देव अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे कैंचें उरे देह-भान |
होतां चि तल्लीन आत्म-रूप ||४||
[२५२]
आलीं विघ्नें दूर सारुनी सहज |
उद्धरिलें मज पांडुरंगें ||१||
लडीवाळपणें घेतली जे आळी |
ते तूं पूर्ण केली आवडीनें ||२||
सर्व काळ माझें लक्षोनियां हित |
सांभाळूनी नीट चालविलें ||३||
स्वामी म्हणे कैसा होऊं उतराई |
तुझ्या पायी डोई ठेवियेली ||४||
कोण पाहे देह सबळ दुर्बळ |
झालों मी केवळ ब्रह्मरूप ||१||
कोण पाहे आतां संपत्ती विपत्ती |
जाहलीसे मति आत्म-रूप ||२||
प्रपंचाचा ठाव गेला भेद-भाव |
प्रकटला देव अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे कैंचें उरे देह-भान |
होतां चि तल्लीन आत्म-रूप ||४||
[२५२]
आलीं विघ्नें दूर सारुनी सहज |
उद्धरिलें मज पांडुरंगें ||१||
लडीवाळपणें घेतली जे आळी |
ते तूं पूर्ण केली आवडीनें ||२||
सर्व काळ माझें लक्षोनियां हित |
सांभाळूनी नीट चालविलें ||३||
स्वामी म्हणे कैसा होऊं उतराई |
तुझ्या पायी डोई ठेवियेली ||४||
Friday, July 1, 2011
[२४९]
देसी तरी देईं देवा मजप्रति |
संतांची संगती सर्वकाळ ||१||
हे चि एक मज पुरे वर-दान |
न मागे ह्याहून दुजें कांही ||२||
आवडीनें जीव जडो संतांपायी |
भावें घडो कांही सेवा त्यांची ||३||
स्वामी म्हणे रंगे नित्य संत संगे |
होईन निजांगें शांति-रूप ||४||
[२५०]
भलें देवा मज केलेंसी दुर्बळ |
तेणें चि निर्मळ जाहलों मी ||१||
कैसें नेणें तुझे झालें विस्मरण |
बळानें संपन्न होतों जेव्हां ||२||
शरीर सबळ असो वा दुर्बळ |
तुज सर्व काळ आठवीन ||३||
स्वामी म्हणे मन करोनियां शुद्ध |
तुझ्या चि सन्निध राहेन मी ||४||
देसी तरी देईं देवा मजप्रति |
संतांची संगती सर्वकाळ ||१||
हे चि एक मज पुरे वर-दान |
न मागे ह्याहून दुजें कांही ||२||
आवडीनें जीव जडो संतांपायी |
भावें घडो कांही सेवा त्यांची ||३||
स्वामी म्हणे रंगे नित्य संत संगे |
होईन निजांगें शांति-रूप ||४||
[२५०]
भलें देवा मज केलेंसी दुर्बळ |
तेणें चि निर्मळ जाहलों मी ||१||
कैसें नेणें तुझे झालें विस्मरण |
बळानें संपन्न होतों जेव्हां ||२||
शरीर सबळ असो वा दुर्बळ |
तुज सर्व काळ आठवीन ||३||
स्वामी म्हणे मन करोनियां शुद्ध |
तुझ्या चि सन्निध राहेन मी ||४||
Thursday, June 30, 2011
[२४७]
सांगशील तैसा वर्तेन अनंता |
जाणतसें सत्ता एक तुझी ||१||
आपुलें व्यक्तित्व वाहिले चरणी |
घ्यावें सांभाळोनी आतां मज ||२||
तुझ्या चि नामाचा घेउनी आधार |
पाववीन पार जड जीवां ||३||
स्वामी म्हणे मज तुझें कृपा-बळ |
म्हणोनि हा खेळ खेळतसें ||४||
[२४८]
श्वासोच्छवासीं देख राम-नाम-जप |
होतो आपेंआप अखंडित ||१||
तेथे रात्रं-दिन ठेवीं अनुसंधान |
सांडूनी मीपण सोsहं -भावे ||२||
राम-नामी चित्त रंगतां स्वानंदें |
सुखें हाता चढे तत्व-बोध ||३||
होतां तत्व-बोध लाभे परा शांति |
जीवासी विश्रांति स्वामी म्हणे ||४||
सांगशील तैसा वर्तेन अनंता |
जाणतसें सत्ता एक तुझी ||१||
आपुलें व्यक्तित्व वाहिले चरणी |
घ्यावें सांभाळोनी आतां मज ||२||
तुझ्या चि नामाचा घेउनी आधार |
पाववीन पार जड जीवां ||३||
स्वामी म्हणे मज तुझें कृपा-बळ |
म्हणोनि हा खेळ खेळतसें ||४||
[२४८]
श्वासोच्छवासीं देख राम-नाम-जप |
होतो आपेंआप अखंडित ||१||
तेथे रात्रं-दिन ठेवीं अनुसंधान |
सांडूनी मीपण सोsहं -भावे ||२||
राम-नामी चित्त रंगतां स्वानंदें |
सुखें हाता चढे तत्व-बोध ||३||
होतां तत्व-बोध लाभे परा शांति |
जीवासी विश्रांति स्वामी म्हणे ||४||
Wednesday, June 29, 2011
[२४५]
नको देह-दंड नको व्रत-नेम |
पाहे आत्माराम अंतर्यामी ||१||
नको हिंडूं तीर्थ नको धुंडू रान |
राहे दया-घन अंतर्यामीं ||२||
नाम तेथे राम भक्तांचा आराम |
निष्कामांचा काम नांदतसे ||३||
अंतरीं चि नाम अंतरीं चि राम |
अंतरीं विश्वास स्वामी म्हणे ||४||
[२४६]
जेथें जेथें माझें हिंडेल हें मन |
तुझे चि दर्शन तेथे होवो ||१|
तुजविण देवा न दुजी वासना |
शिवो माझ्या मना कदा काळी ||२||
वाहो माझें मन तुझा चि संकल्प |
तेणे आपेंआप स्थिरावेल ||३||
स्वामी म्हणे माझी पूर्ण करीं आस |
ना तरी उदास जिणे वाटे ||४||
नको देह-दंड नको व्रत-नेम |
पाहे आत्माराम अंतर्यामी ||१||
नको हिंडूं तीर्थ नको धुंडू रान |
राहे दया-घन अंतर्यामीं ||२||
नाम तेथे राम भक्तांचा आराम |
निष्कामांचा काम नांदतसे ||३||
अंतरीं चि नाम अंतरीं चि राम |
अंतरीं विश्वास स्वामी म्हणे ||४||
[२४६]
जेथें जेथें माझें हिंडेल हें मन |
तुझे चि दर्शन तेथे होवो ||१|
तुजविण देवा न दुजी वासना |
शिवो माझ्या मना कदा काळी ||२||
वाहो माझें मन तुझा चि संकल्प |
तेणे आपेंआप स्थिरावेल ||३||
स्वामी म्हणे माझी पूर्ण करीं आस |
ना तरी उदास जिणे वाटे ||४||
Tuesday, June 28, 2011
[२४३]
तुझे देह भिन्न माझे देह भिन्न |
ऐसा हा अभिमान कासयासी ||१||
एक चि अभिन्न आत्म-तत्व पाहीं |
द्रष्टा दृश्य नाही भाव जेथें ||२||
चार हि देहांचा करोनी निरास |
उन्मनीपदास गांठीं बापा ||३||
स्वामी म्हणे जिणें तरी चि सफळ |
नातरी केवळ भारभूत ||४||
[२४४]
कर्तृत्वाचा मद सांडोनी समस्त |
करी यथोचित कर्मे सारी ||१||
कर्म-फलाठायी न ठेवीं आसक्ती |
अलिप्तता चित्तीं असों देई ||२||
घडे तें तें कर्म होतां कृष्णार्पण |
कर्माचें बंधन उरे कोठें ||३||
स्वामी म्हणे कर्मे करोनी सकळ |
संन्यासाचें फळ अनायासें ||४||
तुझे देह भिन्न माझे देह भिन्न |
ऐसा हा अभिमान कासयासी ||१||
एक चि अभिन्न आत्म-तत्व पाहीं |
द्रष्टा दृश्य नाही भाव जेथें ||२||
चार हि देहांचा करोनी निरास |
उन्मनीपदास गांठीं बापा ||३||
स्वामी म्हणे जिणें तरी चि सफळ |
नातरी केवळ भारभूत ||४||
[२४४]
कर्तृत्वाचा मद सांडोनी समस्त |
करी यथोचित कर्मे सारी ||१||
कर्म-फलाठायी न ठेवीं आसक्ती |
अलिप्तता चित्तीं असों देई ||२||
घडे तें तें कर्म होतां कृष्णार्पण |
कर्माचें बंधन उरे कोठें ||३||
स्वामी म्हणे कर्मे करोनी सकळ |
संन्यासाचें फळ अनायासें ||४||
Monday, June 27, 2011
[२४१]
काळ जातो प्रतिक्षण |
तुज येईल मरण ||१||
अंती राहिले सवंगडे |
एकले चि जाणे पडे ||२||
आप्त इष्ट गण-गोत |
सर्वे नाही कोणी येत ||३||
स्वामी म्हणे तू एकला |
जाग जाग स्व-हिताला ||४||
[२४२]
ओळखी स्व-रूप नको होऊं भ्रांत |
अनादि अनंत आहेसी तूं ||१||
देह मिळे अंती पंच-महाभूती |
स्थिती त्यापरती असे तुझी ||२||
नामरूपात्मक मायिक संसार |
नित्य निर्विकार तूं चि एक ||३||
स्वामी म्हणे सोडी सोडी देहाहंता |
सुखे भोगीं सत्ता सोsहं-रूप ||४||
काळ जातो प्रतिक्षण |
तुज येईल मरण ||१||
अंती राहिले सवंगडे |
एकले चि जाणे पडे ||२||
आप्त इष्ट गण-गोत |
सर्वे नाही कोणी येत ||३||
स्वामी म्हणे तू एकला |
जाग जाग स्व-हिताला ||४||
[२४२]
ओळखी स्व-रूप नको होऊं भ्रांत |
अनादि अनंत आहेसी तूं ||१||
देह मिळे अंती पंच-महाभूती |
स्थिती त्यापरती असे तुझी ||२||
नामरूपात्मक मायिक संसार |
नित्य निर्विकार तूं चि एक ||३||
स्वामी म्हणे सोडी सोडी देहाहंता |
सुखे भोगीं सत्ता सोsहं-रूप ||४||
Sunday, June 26, 2011
[२३९]
द्यावे तैसे घ्यावे केलें तें भोगावें |
ऐसे हे स्वभावें ओघा येतें ||१||
कां गा वृथा द्यावा आणिकातें बोल |
अंतर्यामी खोल विचारावे ||२||
आपुले आपण होऊनियां वैरी |
कष्टतां संसारीं सुख कैचें ||३||
स्वामी म्हणे करा ढोपारशीं न्याय |
उगा चि कां धाय मोकलितां ||४||
[२४०]
कां रे प्राण्या जासी गुंतुनी संसारी |
सुखाशेच्या भरीं भरोनियां ||१||
घरों जातां सुख धांवे पुढां पुढां |
व्यर्थ तूं बापुडा श्रमी होसी ||२||
प्राशितां मृग-जळ काय तृषा भागे |
कैसा माया-संगें भुललासी ||३||
स्वामी म्हणे वेगें होई एकचित्त |
कांहीं आत्म-हित विचारीं गा ||४||
द्यावे तैसे घ्यावे केलें तें भोगावें |
ऐसे हे स्वभावें ओघा येतें ||१||
कां गा वृथा द्यावा आणिकातें बोल |
अंतर्यामी खोल विचारावे ||२||
आपुले आपण होऊनियां वैरी |
कष्टतां संसारीं सुख कैचें ||३||
स्वामी म्हणे करा ढोपारशीं न्याय |
उगा चि कां धाय मोकलितां ||४||
[२४०]
कां रे प्राण्या जासी गुंतुनी संसारी |
सुखाशेच्या भरीं भरोनियां ||१||
घरों जातां सुख धांवे पुढां पुढां |
व्यर्थ तूं बापुडा श्रमी होसी ||२||
प्राशितां मृग-जळ काय तृषा भागे |
कैसा माया-संगें भुललासी ||३||
स्वामी म्हणे वेगें होई एकचित्त |
कांहीं आत्म-हित विचारीं गा ||४||
Saturday, June 25, 2011
[२३७]
नको नको मना गुंतूं संसारात |
स्व-हिताचा घात होय जेणें ||१||
होई सावधान चिंतीं नारायण |
तेणें चि कल्याण पावसी तूं ||२||
हरि-पदांबुजीं घालोनिया रुंजी |
चैतन्याच्या कुंजीं वास करी ||3||
स्वामी म्हणे होसी चैतन्याचें रूप |
तरी आपेआप समाधान ||४||
[२३७]
आदरी संसार करीं व्यवहार |
परी सारासार विचारीं गा ||१||
विचारीं गा सुख आपुले पराचें |
ध्येय मानव्याचे लक्षोनियां ||२||
लक्षोनिया धर्म भोगीं-अर्थ-काम |
सुखे मोक्ष-धाम पावावया ||३||
पावावया शांति यावया विरक्ती |
असो पुष्टी तुष्टी स्वामी म्हणे ||४||
नको नको मना गुंतूं संसारात |
स्व-हिताचा घात होय जेणें ||१||
होई सावधान चिंतीं नारायण |
तेणें चि कल्याण पावसी तूं ||२||
हरि-पदांबुजीं घालोनिया रुंजी |
चैतन्याच्या कुंजीं वास करी ||3||
स्वामी म्हणे होसी चैतन्याचें रूप |
तरी आपेआप समाधान ||४||
[२३७]
आदरी संसार करीं व्यवहार |
परी सारासार विचारीं गा ||१||
विचारीं गा सुख आपुले पराचें |
ध्येय मानव्याचे लक्षोनियां ||२||
लक्षोनिया धर्म भोगीं-अर्थ-काम |
सुखे मोक्ष-धाम पावावया ||३||
पावावया शांति यावया विरक्ती |
असो पुष्टी तुष्टी स्वामी म्हणे ||४||
Friday, June 24, 2011
[२३५]
घेई घेई जीव स्व-रूपाचा ध्यास |
पुरे हा हव्यास प्रपंचाचा ||१||
विटे ऐसी गोडी नव्हे स्व-रुपाची |
सांगती ऐसें चि साधु-संत ||२||
संतांचे वचनीं ठेवोनी विश्वास |
करीं गा अभ्यास आवडीनें ||३||
स्वामी म्हणे भावे भोगीं आत्मानंद |
अवीट अखंड शांति-रूप ||४||
[२३६]
नको होऊं मना इंद्रियांचा दास |
प्रपंची उदास राहें सदा ||१||
हरि-पायीं भावे ठेवीं एक-निष्ठ |
न मानीं वरिष्ठ दुजे काही ||२||
लौकिकाचा संग दु:खासी कारण |
करी नागवण स्व-हिताची ||४||
स्वामी म्हणे होई हरि-पायीं लीन |
तरी चि कल्याण पावसील ||५||
घेई घेई जीव स्व-रूपाचा ध्यास |
पुरे हा हव्यास प्रपंचाचा ||१||
विटे ऐसी गोडी नव्हे स्व-रुपाची |
सांगती ऐसें चि साधु-संत ||२||
संतांचे वचनीं ठेवोनी विश्वास |
करीं गा अभ्यास आवडीनें ||३||
स्वामी म्हणे भावे भोगीं आत्मानंद |
अवीट अखंड शांति-रूप ||४||
[२३६]
नको होऊं मना इंद्रियांचा दास |
प्रपंची उदास राहें सदा ||१||
हरि-पायीं भावे ठेवीं एक-निष्ठ |
न मानीं वरिष्ठ दुजे काही ||२||
लौकिकाचा संग दु:खासी कारण |
करी नागवण स्व-हिताची ||४||
स्वामी म्हणे होई हरि-पायीं लीन |
तरी चि कल्याण पावसील ||५||
Thursday, June 23, 2011
[२३३]
देहाची आसक्ती बाळगिली थोर |
नव्हता निर्धार आत्म्याचा ||१||
तेणे चित्ती भय साठले अपार |
दाटला अंधार चोहींकडे ||२||
तो ची अकस्मात पातला गणनाथ |
' ना भी ' ऐसा देत नाभिकार ||३||
झणीं सोsहं-दीप लावूनी अंतरी |
म्हणे गा निर्धारीं आत्मरूप ||४||
स्वामी म्हणे माथां ठेवितांची हात |
निर्भय निवांत जाहलों मी ||५||
[२३४]
कोण मी कोठील कां गा जन्माला आलों |
नाम-रूप ल्यालों कासयासी ||१||
कर्म ते करावे कोणते उचित |
पावें आत्म-हित कैशापरी ||२||
क्षणोक्षणीं ऐसा करावा विचार |
कैसा भव-पार पावेन मी ||३||
भंगुर ते भोग वाटती ना गोड |
लागलीसे ओढ परमार्थाची ||४||
स्वामी म्हणे येसी पावतां हे दशा |
सद्गुरू आपैसा भेटेचि गा ||५||
देहाची आसक्ती बाळगिली थोर |
नव्हता निर्धार आत्म्याचा ||१||
तेणे चित्ती भय साठले अपार |
दाटला अंधार चोहींकडे ||२||
तो ची अकस्मात पातला गणनाथ |
' ना भी ' ऐसा देत नाभिकार ||३||
झणीं सोsहं-दीप लावूनी अंतरी |
म्हणे गा निर्धारीं आत्मरूप ||४||
स्वामी म्हणे माथां ठेवितांची हात |
निर्भय निवांत जाहलों मी ||५||
[२३४]
कोण मी कोठील कां गा जन्माला आलों |
नाम-रूप ल्यालों कासयासी ||१||
कर्म ते करावे कोणते उचित |
पावें आत्म-हित कैशापरी ||२||
क्षणोक्षणीं ऐसा करावा विचार |
कैसा भव-पार पावेन मी ||३||
भंगुर ते भोग वाटती ना गोड |
लागलीसे ओढ परमार्थाची ||४||
स्वामी म्हणे येसी पावतां हे दशा |
सद्गुरू आपैसा भेटेचि गा ||५||
Wednesday, June 22, 2011
[२३१]
लोळे विषयांत चंचळ हे चित्त |
न राहे निवांत क्षणभरी ||१||
म्हणुनी काकुळती आलो तुझ्या दारी |
तारीं किंवा मारीं पांडुरंगा ||२||
आता तुझे पाय न सोडीं विठ्ठला |
जावो जरी गेला जीव माझा ||३||
स्वामी म्हणे मज तुजविण त्राता |
नसे चि अनंता दुजा कोणी ||४||
[२३२]
येई रखुमाईच्या वरा |
हात देईं ह्या पामरा ||१||
बुडालों मी भव-सागरीं |
धांव पाव ग लौकरी ||२||
नको पाहूं माझा अंत |
मी तों अजाण पतित ||३||
मज नेईं पैल तीरा |
तूं चि पतित-पावन खरा ||४||
स्वामी म्हणे उडी घाली |
ब्रीद आपुलें सांभाळी ||५||
लोळे विषयांत चंचळ हे चित्त |
न राहे निवांत क्षणभरी ||१||
म्हणुनी काकुळती आलो तुझ्या दारी |
तारीं किंवा मारीं पांडुरंगा ||२||
आता तुझे पाय न सोडीं विठ्ठला |
जावो जरी गेला जीव माझा ||३||
स्वामी म्हणे मज तुजविण त्राता |
नसे चि अनंता दुजा कोणी ||४||
[२३२]
येई रखुमाईच्या वरा |
हात देईं ह्या पामरा ||१||
बुडालों मी भव-सागरीं |
धांव पाव ग लौकरी ||२||
नको पाहूं माझा अंत |
मी तों अजाण पतित ||३||
मज नेईं पैल तीरा |
तूं चि पतित-पावन खरा ||४||
स्वामी म्हणे उडी घाली |
ब्रीद आपुलें सांभाळी ||५||
Tuesday, June 21, 2011
[२२९]
बाह्य सुखालागी धांवतो हा जीव |
यंत्र-युगे हांव वाढवली ||१||
अंतरींच्या सुखा होउनी पारखा |
दु:खाचिया नरकामाजीं पडे ||२||
करावया क्रांति सत्याग्रही वीर |
पुढें येती धीर धरोनियां ||३||
स्वामी म्हणे होय सत्याचा विजय |
सत्य तें निर्भय आदि-अंती ||४||
[२३०]
यंत्र-युगे माजला आकांत |
बळावला प्रांत दुर्जनांचा ||१||
शास्त्रज्ञांचे शोध योजिती उन्मत्त |
साधावया घात दुर्बलांचा ||२||
लोभ अहंकार वाढती अपार |
नीति-धर्म थार नुरे कोठें ||३||
पाशवी संस्कार घालिती ते पिंगा |
गुप्त झाली गंगा मानव्याची ||४||
स्वामी म्हणे नाहीं स्वरूपाचा शोध |
व्यर्थ तो प्रबोध शास्त्रज्ञांचा ||५||
बाह्य सुखालागी धांवतो हा जीव |
यंत्र-युगे हांव वाढवली ||१||
अंतरींच्या सुखा होउनी पारखा |
दु:खाचिया नरकामाजीं पडे ||२||
करावया क्रांति सत्याग्रही वीर |
पुढें येती धीर धरोनियां ||३||
स्वामी म्हणे होय सत्याचा विजय |
सत्य तें निर्भय आदि-अंती ||४||
[२३०]
यंत्र-युगे माजला आकांत |
बळावला प्रांत दुर्जनांचा ||१||
शास्त्रज्ञांचे शोध योजिती उन्मत्त |
साधावया घात दुर्बलांचा ||२||
लोभ अहंकार वाढती अपार |
नीति-धर्म थार नुरे कोठें ||३||
पाशवी संस्कार घालिती ते पिंगा |
गुप्त झाली गंगा मानव्याची ||४||
स्वामी म्हणे नाहीं स्वरूपाचा शोध |
व्यर्थ तो प्रबोध शास्त्रज्ञांचा ||५||
Monday, June 20, 2011
[२२७]
जन्मोनियां नाही केलें आत्म-हित |
वेंचिलें जीवित वाउगें चि ||१||
प्रपंचाचा भर वाहोनियां शिरीं |
देह नाना परी कष्टविला ||२||
नाशिवंत देह पावेल पतन |
अंतीं समाधान कैचें राहील ||३||
स्वामी म्हणे होई आधीं चि सावध |
वेगे घेई शोध स्वरूपाचा ||४||
[२२८]
सदा माझें मन राहो सावधान |
कदा न हो भान प्रपंचाचें ||१||
चैतन्यी तद्रूप होवो माझें चित्त |
नायकोनि मात विषयांची ||२||
जडो माझा जीव नित्य पर-ब्रह्मीं |
अहंकार -ऊर्मि सांडोनियां ||३||
स्वामी म्हणे घडो अभेद-भजन |
सहज-समाधान निरंतर ||४||
जन्मोनियां नाही केलें आत्म-हित |
वेंचिलें जीवित वाउगें चि ||१||
प्रपंचाचा भर वाहोनियां शिरीं |
देह नाना परी कष्टविला ||२||
नाशिवंत देह पावेल पतन |
अंतीं समाधान कैचें राहील ||३||
स्वामी म्हणे होई आधीं चि सावध |
वेगे घेई शोध स्वरूपाचा ||४||
[२२८]
सदा माझें मन राहो सावधान |
कदा न हो भान प्रपंचाचें ||१||
चैतन्यी तद्रूप होवो माझें चित्त |
नायकोनि मात विषयांची ||२||
जडो माझा जीव नित्य पर-ब्रह्मीं |
अहंकार -ऊर्मि सांडोनियां ||३||
स्वामी म्हणे घडो अभेद-भजन |
सहज-समाधान निरंतर ||४||
Sunday, June 19, 2011
[२२५]
जेणे अंतरती हरि तुझे पाय |
करावे ते काय चमत्कार ||१||
कशासाठ व्हावी वश ऋद्धी सिद्धी |
नांवाची प्रसिद्धी कशासाठी ||२||
मज तृणवत हें प्राकृत |
आहे आत्म-हित तुझे पायी ||३||
स्वामी म्हणे माझे एक तूं निधान |
नाही समाधान तुजविण ||४||
[२२६]
हरि तुझी मूर्ति दिसे सर्व भूतीं |
असे तुझी वस्ती चराचरीं ||१||
तुजविण ठाव नसे अणुमात्र |
व्यापुनी सर्वत्र राहिलासी ||२||
काय वर्णू तुझें नाम रूप गुण |
सगुण निर्गुण तूं चि एक ||३||
स्वामी म्हणे तूं चि विश्वाचे जीवन |
समर्पिले मन तुझ्यापायीं ||४||
जेणे अंतरती हरि तुझे पाय |
करावे ते काय चमत्कार ||१||
कशासाठ व्हावी वश ऋद्धी सिद्धी |
नांवाची प्रसिद्धी कशासाठी ||२||
मज तृणवत हें प्राकृत |
आहे आत्म-हित तुझे पायी ||३||
स्वामी म्हणे माझे एक तूं निधान |
नाही समाधान तुजविण ||४||
[२२६]
हरि तुझी मूर्ति दिसे सर्व भूतीं |
असे तुझी वस्ती चराचरीं ||१||
तुजविण ठाव नसे अणुमात्र |
व्यापुनी सर्वत्र राहिलासी ||२||
काय वर्णू तुझें नाम रूप गुण |
सगुण निर्गुण तूं चि एक ||३||
स्वामी म्हणे तूं चि विश्वाचे जीवन |
समर्पिले मन तुझ्यापायीं ||४||
Saturday, June 18, 2011
[२२३]
असो सार्वभौम राजा चक्रवर्ती |
चुके चि ना अंती काळ-पाश ||१||
असो बाळ-वृद्ध असो नारी-नर |
भ्याड किंवा शुर असो कोणी ||२||
पंडित अजाण सज्जन दुर्जन |
सधन निर्धन असो कोणी ||३||
असो सुलक्षण सुरूप तरुण |
टळे ना मरण कोणासी हि ||४||
स्वामी म्हणे एक जगी आत्म-ज्ञानी |
मृत्यूतें मारुनी राहिलासे ||५||
[२२४]
काळाची गर्जना नये कानावरी |
जोंवरी शरीरीं बलोन्माद ||१||
प्रपंचांत सौख्य मानी मूढपणे |
न जाणे खेळणें काळाचें ते ||२||
होता शक्तिहीन शरीर तें क्षीण |
राहेल मरण डोळ्यांपुढें ||३||
स्वामी म्हणे अंतीं घडे पश्चात्ताप |
काळाची झडप पडे जेव्हा ||४||
असो सार्वभौम राजा चक्रवर्ती |
चुके चि ना अंती काळ-पाश ||१||
असो बाळ-वृद्ध असो नारी-नर |
भ्याड किंवा शुर असो कोणी ||२||
पंडित अजाण सज्जन दुर्जन |
सधन निर्धन असो कोणी ||३||
असो सुलक्षण सुरूप तरुण |
टळे ना मरण कोणासी हि ||४||
स्वामी म्हणे एक जगी आत्म-ज्ञानी |
मृत्यूतें मारुनी राहिलासे ||५||
[२२४]
काळाची गर्जना नये कानावरी |
जोंवरी शरीरीं बलोन्माद ||१||
प्रपंचांत सौख्य मानी मूढपणे |
न जाणे खेळणें काळाचें ते ||२||
होता शक्तिहीन शरीर तें क्षीण |
राहेल मरण डोळ्यांपुढें ||३||
स्वामी म्हणे अंतीं घडे पश्चात्ताप |
काळाची झडप पडे जेव्हा ||४||
Friday, June 17, 2011
[२२१]
देवपिसा झालों नामीं आनंदलो |
आतां नका बोलों दुज्या गोष्टी ||१||
प्रपंचाची वार्ता न ये माझ्या कानी |
न देखें नयनीं जन-लोक ||२||
जेथे पाहें तेथें दिसे वासुदेव |
वेडावला जीव जडे पायीं ||३||
स्वामी म्हणे माझी रंगली हे वृत्ती |
आठवितां चित्ती वासुदेव ||४||
[२२२]
आदरोत कोणी सुखें लोक-सेवा |
आम्हांसी बरवा भक्ती-मार्ग ||१||
सांगोत ते कोणी वेदांताचे ज्ञान |
न मानूं प्रमाण भक्तीविण ||२||
करोत ते कोणी जप-तप-ध्यान |
आम्हांसी साधन भोळा भाव ||३||
स्वामी म्हणे देव भावाचा भुकेला |
"ओ " देई हाकेला भक्ताचिया ||४||
देवपिसा झालों नामीं आनंदलो |
आतां नका बोलों दुज्या गोष्टी ||१||
प्रपंचाची वार्ता न ये माझ्या कानी |
न देखें नयनीं जन-लोक ||२||
जेथे पाहें तेथें दिसे वासुदेव |
वेडावला जीव जडे पायीं ||३||
स्वामी म्हणे माझी रंगली हे वृत्ती |
आठवितां चित्ती वासुदेव ||४||
[२२२]
आदरोत कोणी सुखें लोक-सेवा |
आम्हांसी बरवा भक्ती-मार्ग ||१||
सांगोत ते कोणी वेदांताचे ज्ञान |
न मानूं प्रमाण भक्तीविण ||२||
करोत ते कोणी जप-तप-ध्यान |
आम्हांसी साधन भोळा भाव ||३||
स्वामी म्हणे देव भावाचा भुकेला |
"ओ " देई हाकेला भक्ताचिया ||४||
Thursday, June 16, 2011
[२१९]
म्हणता 'माझा' देह मी तों नव्हे देह |
आहें नि :संदेह आत्म-रूप ||१||
सुख-दु:ख वार्ता देहाचिया माथां |
लावुनी तत्वतां वेगळा मी ||२||
गेले क्रिया-कर्म ठेले धर्माधर्म |
कळों आलें वर्म परमार्थाचें ||३||
स्वामी म्हणे गेला देह-अहंकार |
झाला साक्षात्कार स्व-रूपाचा ||४||
[२२०]
पाहों जातां मूळ अहंता तत्वतां |
उरे आत्म-सत्ता एकली चि ||१||
तेथे अहं सोsहं नुरे वृत्ती-भेद |
स्फुरे चिदानंद एकला चि ||२||
जाणीव नेणीव गळे द्वैत-भाव |
खेळे स्वयमेव प्र-ब्रह्म ||३||
स्वामी म्हणे मूळीं झाला वृत्ती-लोप
विश्व आत्म-रूप तयालागीं ||४||
म्हणता 'माझा' देह मी तों नव्हे देह |
आहें नि :संदेह आत्म-रूप ||१||
सुख-दु:ख वार्ता देहाचिया माथां |
लावुनी तत्वतां वेगळा मी ||२||
गेले क्रिया-कर्म ठेले धर्माधर्म |
कळों आलें वर्म परमार्थाचें ||३||
स्वामी म्हणे गेला देह-अहंकार |
झाला साक्षात्कार स्व-रूपाचा ||४||
[२२०]
पाहों जातां मूळ अहंता तत्वतां |
उरे आत्म-सत्ता एकली चि ||१||
तेथे अहं सोsहं नुरे वृत्ती-भेद |
स्फुरे चिदानंद एकला चि ||२||
जाणीव नेणीव गळे द्वैत-भाव |
खेळे स्वयमेव प्र-ब्रह्म ||३||
स्वामी म्हणे मूळीं झाला वृत्ती-लोप
विश्व आत्म-रूप तयालागीं ||४||
Wednesday, June 15, 2011
[२१७]
देहाची आसक्ति ठेवसील चित्तीं |
तरी तुज अंती दु:ख आहे ||१||
नित्य आत्म-रुपीं राहे सावधान |
तेणें देह-भान हारपेल ||२||
प्रपंचाचा अंत होईल निभ्रांत |
लाभता एकांत जीव-शिवा ||३||
स्वामी म्हणे देही असोनी , विदेही |
होसील लवलाहीं शांतीरूप ||४||
[२१८]
माझा प्राण माझी बुद्धी माझे मन |
दर सुत धन माझें माझें ||१||
माझी हि इंद्रिये माझें हें शरीर |
आहे घर-दार माझें माझें ||२||
माझा देश माझें कुळ माझा वर्ण |
ऐसे बोले कोण 'माझें माझें ' ||३||
स्वामी म्हणे शोध घेता अंतर्यामी |
जिरेल ती उर्मि मीपणाची ||४||
देहाची आसक्ति ठेवसील चित्तीं |
तरी तुज अंती दु:ख आहे ||१||
नित्य आत्म-रुपीं राहे सावधान |
तेणें देह-भान हारपेल ||२||
प्रपंचाचा अंत होईल निभ्रांत |
लाभता एकांत जीव-शिवा ||३||
स्वामी म्हणे देही असोनी , विदेही |
होसील लवलाहीं शांतीरूप ||४||
[२१८]
माझा प्राण माझी बुद्धी माझे मन |
दर सुत धन माझें माझें ||१||
माझी हि इंद्रिये माझें हें शरीर |
आहे घर-दार माझें माझें ||२||
माझा देश माझें कुळ माझा वर्ण |
ऐसे बोले कोण 'माझें माझें ' ||३||
स्वामी म्हणे शोध घेता अंतर्यामी |
जिरेल ती उर्मि मीपणाची ||४||
Tuesday, June 14, 2011
[२१५]
काम क्रोध लोभ ठेवोनी अंतरी |
पाहों जातां हरी कैंचा दिसे ||१||
काम तेथें पुष्टी क्रोध तेथे शांति |
लोभ तेथें तृप्ती राहे कैंची ||२||
काम क्रोध खल पापी अमंगळ |
समूळ चांडाळ त्यजावे ते ||३||
स्वामी म्हणे चित्त करावे निर्मळ |
तरी चि गोपाळ राहे तेथें ||४||
[२१६]
बैसोनी एकांतीं करीं सोsहं ध्यान |
तेणें तुझें मन स्थिरावेल ||१||
सोsहं सोsहं ऐसा शब्दाविण जप |
होतां आपेंआप चित्त-शुद्धी ||२||
कैसा शब्दाविण होतो 'सोsहं ध्वनी ' |
घेई विचारोनी संतांपासीं ||३||
स्वामी म्हणे जाई संतांसी शरण |
तेणे उद्धारण होय तुझें ||४||
काम क्रोध लोभ ठेवोनी अंतरी |
पाहों जातां हरी कैंचा दिसे ||१||
काम तेथें पुष्टी क्रोध तेथे शांति |
लोभ तेथें तृप्ती राहे कैंची ||२||
काम क्रोध खल पापी अमंगळ |
समूळ चांडाळ त्यजावे ते ||३||
स्वामी म्हणे चित्त करावे निर्मळ |
तरी चि गोपाळ राहे तेथें ||४||
[२१६]
बैसोनी एकांतीं करीं सोsहं ध्यान |
तेणें तुझें मन स्थिरावेल ||१||
सोsहं सोsहं ऐसा शब्दाविण जप |
होतां आपेंआप चित्त-शुद्धी ||२||
कैसा शब्दाविण होतो 'सोsहं ध्वनी ' |
घेई विचारोनी संतांपासीं ||३||
स्वामी म्हणे जाई संतांसी शरण |
तेणे उद्धारण होय तुझें ||४||
Monday, June 13, 2011
[२१३]
पोटीं भाव तरी पाणी होय तीर्थ |
पर्ण तें यथार्थ पत्रीरूप ||१||
दुध दहीं घृत शर्करासहित |
मधु पंचामृत तें चि होय ||२||
अन्नाचा प्रसाद राख ती विभूती |
तांदूळ ते होती मंत्राक्षता ||३||
स्वामी म्हणे जेथे भाव तेथें देव |
भावाचे गौरव काय वानूं ||४||
[२१४]
सद् गुरु-स्वरूप अगाध अपार |
काय मी पामर कैसे वानूं ||१||
देखता चि पडे ब्रह्मादिकां मौन |
निर्गुणाचे गुण काय बोलू ||२||
नव्हे तें निर्गुण नव्हे ते सगुण |
त्याचे लक्षण काय सांगूं ||३||
स्वामी म्हणे भाव ठेवा पायापासीं |
तरी चि तुम्हांसी आतुडेल ||४||
पोटीं भाव तरी पाणी होय तीर्थ |
पर्ण तें यथार्थ पत्रीरूप ||१||
दुध दहीं घृत शर्करासहित |
मधु पंचामृत तें चि होय ||२||
अन्नाचा प्रसाद राख ती विभूती |
तांदूळ ते होती मंत्राक्षता ||३||
स्वामी म्हणे जेथे भाव तेथें देव |
भावाचे गौरव काय वानूं ||४||
[२१४]
सद् गुरु-स्वरूप अगाध अपार |
काय मी पामर कैसे वानूं ||१||
देखता चि पडे ब्रह्मादिकां मौन |
निर्गुणाचे गुण काय बोलू ||२||
नव्हे तें निर्गुण नव्हे ते सगुण |
त्याचे लक्षण काय सांगूं ||३||
स्वामी म्हणे भाव ठेवा पायापासीं |
तरी चि तुम्हांसी आतुडेल ||४||
Sunday, June 12, 2011
[२११]
भूत-भविष्याचे भान |
आम्ही नेणों वर्तमान ||1||
सदा सर्वकाळ जाण |
आत्म-रुपीं सावधान ||२||
आम्ही ठाई चि निर्गुण |
आम्हां कैचें जन्म-मरण ||३||
स्वामी म्हणे आत्म-पणें |
आम्हा सर्वत्र नांदणें ||४||
[२१२]
जरी होय शुद्ध चित्त |
तरी विषाचे अमृत ||१||
येई माराया धांवोन |
तो चि करी संरक्षण ||२||
जन-निंदेची भूषणें |
होती विघ्नांची सुमने ||३||
नाना आघात आपत्ति |
ती हि सौख-फल देती ||४||
स्वामी म्हणे शत्रू मित्र |
आत्म-रूप ते सर्वत्र ||५||
भूत-भविष्याचे भान |
आम्ही नेणों वर्तमान ||1||
सदा सर्वकाळ जाण |
आत्म-रुपीं सावधान ||२||
आम्ही ठाई चि निर्गुण |
आम्हां कैचें जन्म-मरण ||३||
स्वामी म्हणे आत्म-पणें |
आम्हा सर्वत्र नांदणें ||४||
[२१२]
जरी होय शुद्ध चित्त |
तरी विषाचे अमृत ||१||
येई माराया धांवोन |
तो चि करी संरक्षण ||२||
जन-निंदेची भूषणें |
होती विघ्नांची सुमने ||३||
नाना आघात आपत्ति |
ती हि सौख-फल देती ||४||
स्वामी म्हणे शत्रू मित्र |
आत्म-रूप ते सर्वत्र ||५||
Saturday, June 11, 2011
[२०९]
नको मना होऊ इंद्रियांचा दास |
विषयांचा फांस दृढावेल ||१||
नको मना राहूं प्रपंची निमग्न |
होसील तूं खिन्न परिणामी ||२||
नको नको मना घन मान तृष्णा |
अंती विटंबना टळे कैसी ||३||
स्वामी म्हणे करीं हरीचें चिंतन |
नित्य समाधान पावसील ||४||
[२१०]
विश्वी विश्वंभर |
हरि-रूप चराचर ||१||
हरि पासी हरि दूर |
हरि अंतरी बाहेर ||२||
हरि सान हरि थोर |
हरि-रूप नारी-नर ||३||
हरि-रूप अहंकार |
स्वामी हरि चि साचार ||४||
नको मना होऊ इंद्रियांचा दास |
विषयांचा फांस दृढावेल ||१||
नको मना राहूं प्रपंची निमग्न |
होसील तूं खिन्न परिणामी ||२||
नको नको मना घन मान तृष्णा |
अंती विटंबना टळे कैसी ||३||
स्वामी म्हणे करीं हरीचें चिंतन |
नित्य समाधान पावसील ||४||
[२१०]
विश्वी विश्वंभर |
हरि-रूप चराचर ||१||
हरि पासी हरि दूर |
हरि अंतरी बाहेर ||२||
हरि सान हरि थोर |
हरि-रूप नारी-नर ||३||
हरि-रूप अहंकार |
स्वामी हरि चि साचार ||४||
Friday, June 10, 2011
[२०७]
घर दार अन्न वस्त्र-प्रावरण |
अधिक त्याहून काय हवे ||१||
दार सुत धन आप्त-इष्ट-जन |
अधिक त्याहून काय हवे ||२||
देह आणि मन आरोग्य-संपन्न |
अधिक त्याहून काय हवे ||3||
संतांचे पूजन ईश्वराचे ध्यान
अधिक त्याहून काय हवे ||4||
स्वामी म्हणे व्हावे विश्वाचे कल्याण
तेणें समाधान मज होय ||५||
[२०८]
जरी तो दर्दुर सर्प-मुखीं गेला|
तरी आस त्याला मासियेची ||१||
तैसे प्राणियासी न सोडवे तृष्णा |
लागलीसे प्राणा तांत जरी ||२||
घडी घडी काळ भक्षितो आयुष्य |
परी ह्याचें लक्ष प्रपंचात ||३||
स्वामी म्हणे जीव होईं गा सावध |
घेईं वेगें वेध माधवाचा ||४||
घर दार अन्न वस्त्र-प्रावरण |
अधिक त्याहून काय हवे ||१||
दार सुत धन आप्त-इष्ट-जन |
अधिक त्याहून काय हवे ||२||
देह आणि मन आरोग्य-संपन्न |
अधिक त्याहून काय हवे ||3||
संतांचे पूजन ईश्वराचे ध्यान
अधिक त्याहून काय हवे ||4||
स्वामी म्हणे व्हावे विश्वाचे कल्याण
तेणें समाधान मज होय ||५||
[२०८]
जरी तो दर्दुर सर्प-मुखीं गेला|
तरी आस त्याला मासियेची ||१||
तैसे प्राणियासी न सोडवे तृष्णा |
लागलीसे प्राणा तांत जरी ||२||
घडी घडी काळ भक्षितो आयुष्य |
परी ह्याचें लक्ष प्रपंचात ||३||
स्वामी म्हणे जीव होईं गा सावध |
घेईं वेगें वेध माधवाचा ||४||
Thursday, June 9, 2011
[२०५]
न होती ते भक्त उच्चारूनी नाम |
पोटीं क्रोध काम असे जरी ||१||
न होती ते भक्त करितां कीर्तन |
दंभ मोह मान वसे जरी ||२||
न होती ते भक्त घालोनियां माळा |
भक्तीचा जिव्हाळा नसे जरी ||३||
स्वामी म्हणे व्यर्थ पूजा घंटा-नाद |
भेटे ना गोविंद भक्तीविण ||४||
[२०६]
उच्चारिता नाम आनंदले मन |
दाटले लोचन प्रेमाश्रूंनी ||१||
घामेजली काय झाली रोमांचित |
थरारे कंपित होवोनिया ||२||
कंठ सद् गदित स्तब्ध झालें चित्त |
होती विगलित सर्व गात्रें ||३||
स्वामी म्हणे अंती गेले देह-भान |
प्रेमे होता लीन आत्म-रुपीं ||४||
न होती ते भक्त उच्चारूनी नाम |
पोटीं क्रोध काम असे जरी ||१||
न होती ते भक्त करितां कीर्तन |
दंभ मोह मान वसे जरी ||२||
न होती ते भक्त घालोनियां माळा |
भक्तीचा जिव्हाळा नसे जरी ||३||
स्वामी म्हणे व्यर्थ पूजा घंटा-नाद |
भेटे ना गोविंद भक्तीविण ||४||
[२०६]
उच्चारिता नाम आनंदले मन |
दाटले लोचन प्रेमाश्रूंनी ||१||
घामेजली काय झाली रोमांचित |
थरारे कंपित होवोनिया ||२||
कंठ सद् गदित स्तब्ध झालें चित्त |
होती विगलित सर्व गात्रें ||३||
स्वामी म्हणे अंती गेले देह-भान |
प्रेमे होता लीन आत्म-रुपीं ||४||
Wednesday, June 8, 2011
[२०३]
प्रपंच असावें उदास वर्तन |
आवरावे मन विवेकानें ||१||
असो घरदार कुटुंब संसार |
नये त्याचा भार वाटों देवों ||२||
सुखे वैराग्याचा करावा अभ्यास |
प्रपंचाचा त्रास मानूं नये ||३||
स्वामी म्हणे देही न जावें गुंतून |
हि चि असे खुण वैराग्याची ||४||
[२०४]
तो चि एक भक्त नव्हे जो विभक्त |
राहे योग-युक्त अखंडित ||१||
होऊनियां देव करी देव पूजा |
जरी तो सायुज्य पातला चि ||२||
साधिलें स्व-हित गाठिलें अद्वैत |
तरी भक्ती-पंथ सोडी चि ना ||३||
स्वामी म्हणे भक्त ईश्वराचा प्राण |
ईश्वर प्रमाण भक्तातें हि ||४||
प्रपंच असावें उदास वर्तन |
आवरावे मन विवेकानें ||१||
असो घरदार कुटुंब संसार |
नये त्याचा भार वाटों देवों ||२||
सुखे वैराग्याचा करावा अभ्यास |
प्रपंचाचा त्रास मानूं नये ||३||
स्वामी म्हणे देही न जावें गुंतून |
हि चि असे खुण वैराग्याची ||४||
[२०४]
तो चि एक भक्त नव्हे जो विभक्त |
राहे योग-युक्त अखंडित ||१||
होऊनियां देव करी देव पूजा |
जरी तो सायुज्य पातला चि ||२||
साधिलें स्व-हित गाठिलें अद्वैत |
तरी भक्ती-पंथ सोडी चि ना ||३||
स्वामी म्हणे भक्त ईश्वराचा प्राण |
ईश्वर प्रमाण भक्तातें हि ||४||
Tuesday, June 7, 2011
[२०१]
प्रपंचाचा त्रास न साहे जीवास |
नको येथें वास ऐसे वाटे ||१||
म्हणे रांडा पोरे मरती तरी बरें |
मज ह्या संसारे गांजिलेंसे ||२||
वैतागला प्राणी ऐसे मनीं आणी |
निघावें सोडोनी घर-दार ||३||
स्वामी म्हणे मन झालें पराधीन |
नव्हे हे लक्षण वैराग्याचें ||४||
[२०२]
क्षणोक्षणीं हा चि करावा विवेक |
काय तें मायिक काय सत्य ||१||
नाम रूप गुण मिथ्या नाशिवंत |
एक तें शाश्वत आत्म-पद ||२||
विषयांचें सुख नश्वर मायिक |
तेथें अरोचक असो द्यावें ||३||
स्वामी म्हणे माळ घालिते विरक्ती |
बळावतां प्रीती आत्म-रुपी ||४||
प्रपंचाचा त्रास न साहे जीवास |
नको येथें वास ऐसे वाटे ||१||
म्हणे रांडा पोरे मरती तरी बरें |
मज ह्या संसारे गांजिलेंसे ||२||
वैतागला प्राणी ऐसे मनीं आणी |
निघावें सोडोनी घर-दार ||३||
स्वामी म्हणे मन झालें पराधीन |
नव्हे हे लक्षण वैराग्याचें ||४||
[२०२]
क्षणोक्षणीं हा चि करावा विवेक |
काय तें मायिक काय सत्य ||१||
नाम रूप गुण मिथ्या नाशिवंत |
एक तें शाश्वत आत्म-पद ||२||
विषयांचें सुख नश्वर मायिक |
तेथें अरोचक असो द्यावें ||३||
स्वामी म्हणे माळ घालिते विरक्ती |
बळावतां प्रीती आत्म-रुपी ||४||
Monday, June 6, 2011
[१९९]
असो कोणी चोर असो कोणी साव |
तो ची दिसे देव मजलागी ||१||
उंच-नीच सान-थोर सुष्ट-दुष्ट |
ऐसा झाला नष्ट भेदभाव ||२||
नाम रूप वर्ण हारपली पूर्ण |
राहिलों लक्षून आत्म-रूप ||३||
स्वामी म्हणे आता कैचें जगद्भान |
रंगलेसे मन आत्मारामीं ||४||
[२००]
मज अंतरीचा जाणोनियां भाव |
पूर्ण करी देव मनोरथ ||१||
आता मजलागी काय उणें जगी |
आवडीने भोगीं शांति-सुख ||२||
झालें अंतर्बाह्य देवाचे दर्शन |
स्थिरावले मन देवापायी ||३||
स्वामी म्हणे सुख भोगितां अमूप |
झालो सुख-रूप आपेंआप ||४||
असो कोणी चोर असो कोणी साव |
तो ची दिसे देव मजलागी ||१||
उंच-नीच सान-थोर सुष्ट-दुष्ट |
ऐसा झाला नष्ट भेदभाव ||२||
नाम रूप वर्ण हारपली पूर्ण |
राहिलों लक्षून आत्म-रूप ||३||
स्वामी म्हणे आता कैचें जगद्भान |
रंगलेसे मन आत्मारामीं ||४||
[२००]
मज अंतरीचा जाणोनियां भाव |
पूर्ण करी देव मनोरथ ||१||
आता मजलागी काय उणें जगी |
आवडीने भोगीं शांति-सुख ||२||
झालें अंतर्बाह्य देवाचे दर्शन |
स्थिरावले मन देवापायी ||३||
स्वामी म्हणे सुख भोगितां अमूप |
झालो सुख-रूप आपेंआप ||४||
Sunday, June 5, 2011
[१९७]
विवेकाचा गांव वैराग्याचा ठाव |
योगाचें वैभव साधुसंत ||१||
भक्तीचें जिव्हार ज्ञानाचें भांडार |
शांतीचें माहेर साधू संत ||२||
चैतन्याचा प्राण सुखाचें निधान |
विश्रांतीचे स्थान साधूसंत ||३||
स्वामी म्हणे संत आनंदाची खाण |
मूर्तिमंत जाण परब्रह्म ||४||
[१९८]
सांपडलें मज अंतरी निधान |
सद् गुरु चरण उपासितां ||१|
अवघे त्रिभुवन झालें सच्चिदघन |
आनंदें परिपूर्ण आत्म-रूप ||२||
प्रकटला देव गेला देह-भाव |
हरपला ठाव लौकिकाचा ||३||
स्वामी म्हणे आतां देवाचे दर्शन |
नित्य घडे जाण आत्मरूपीं ||४||
विवेकाचा गांव वैराग्याचा ठाव |
योगाचें वैभव साधुसंत ||१||
भक्तीचें जिव्हार ज्ञानाचें भांडार |
शांतीचें माहेर साधू संत ||२||
चैतन्याचा प्राण सुखाचें निधान |
विश्रांतीचे स्थान साधूसंत ||३||
स्वामी म्हणे संत आनंदाची खाण |
मूर्तिमंत जाण परब्रह्म ||४||
[१९८]
सांपडलें मज अंतरी निधान |
सद् गुरु चरण उपासितां ||१|
अवघे त्रिभुवन झालें सच्चिदघन |
आनंदें परिपूर्ण आत्म-रूप ||२||
प्रकटला देव गेला देह-भाव |
हरपला ठाव लौकिकाचा ||३||
स्वामी म्हणे आतां देवाचे दर्शन |
नित्य घडे जाण आत्मरूपीं ||४||
Saturday, June 4, 2011
[१९५]
नको नको मना दुर्जन-संगति |
तेणे रमा-पति अंतरेल ||१||
नको नको मना पाखंड-दर्शन |
तेणे नारायण अंतरेल ||२||
नको नको मना अभक्तांच्या गोष्टी |
तेणे जगजेठी अंतरेल ||३||
स्वामी म्हणे मना धरीं संत-संग |
करी रमा-रंग आपुलासा ||४||
[१९६]
मागणे हे एक देई भक्ति-प्रेम |
देवा तुझें नाम गाईन मी ||१||
आवडीनें देवा गुण मी वर्णीन |
प्रेमें न्याहाळीन रूप तुझें ||२||
भक्ति-भावें तुझे करीन पूजन |
अंतरी चिंतन निरंतर ||३||
स्वामी म्हणे पायी ठेवीन मी माथा |
तेणें माझ्या चित्त समाधान ||४||
नको नको मना दुर्जन-संगति |
तेणे रमा-पति अंतरेल ||१||
नको नको मना पाखंड-दर्शन |
तेणे नारायण अंतरेल ||२||
नको नको मना अभक्तांच्या गोष्टी |
तेणे जगजेठी अंतरेल ||३||
स्वामी म्हणे मना धरीं संत-संग |
करी रमा-रंग आपुलासा ||४||
[१९६]
मागणे हे एक देई भक्ति-प्रेम |
देवा तुझें नाम गाईन मी ||१||
आवडीनें देवा गुण मी वर्णीन |
प्रेमें न्याहाळीन रूप तुझें ||२||
भक्ति-भावें तुझे करीन पूजन |
अंतरी चिंतन निरंतर ||३||
स्वामी म्हणे पायी ठेवीन मी माथा |
तेणें माझ्या चित्त समाधान ||४||
Friday, June 3, 2011
[१९३]
कामक्रोधादिक विकारांच्या उर्मी |
समर्पिल्या आम्ही हरिपायी ||१|
लौकिकाची लाज सांडिली सकळ |
ओलांडिली कुळ जाति वर्ण ||२||
अहंता लिगाड सारिले सहज |
वासनेचे बीज दग्ध केले ||३||
पिंड ब्रह्मांडाचा गिळोनिया घांस |
झालो हरिदास स्वामी म्हणे ||४||
[१९४]
घेतां भोग नव्हे कामनेची तृप्ति |
बळावे आसक्ती अमर्याद ||१||
अग्निलागीं शांत करावया धृत |
अर्पिता निभ्रांत प्रज्वाळे तो ||२||
आत्मारामी मन लावितां आवडी |
क्षीण होय गोडी भोग्य-जातीं ||३||
स्वामी म्हणे प्रेमें स्मरा आत्माराम |
तेणें पूर्ण-काम व्हाल तुम्ही ||४||
कामक्रोधादिक विकारांच्या उर्मी |
समर्पिल्या आम्ही हरिपायी ||१|
लौकिकाची लाज सांडिली सकळ |
ओलांडिली कुळ जाति वर्ण ||२||
अहंता लिगाड सारिले सहज |
वासनेचे बीज दग्ध केले ||३||
पिंड ब्रह्मांडाचा गिळोनिया घांस |
झालो हरिदास स्वामी म्हणे ||४||
[१९४]
घेतां भोग नव्हे कामनेची तृप्ति |
बळावे आसक्ती अमर्याद ||१||
अग्निलागीं शांत करावया धृत |
अर्पिता निभ्रांत प्रज्वाळे तो ||२||
आत्मारामी मन लावितां आवडी |
क्षीण होय गोडी भोग्य-जातीं ||३||
स्वामी म्हणे प्रेमें स्मरा आत्माराम |
तेणें पूर्ण-काम व्हाल तुम्ही ||४||
Thursday, June 2, 2011
[१९१]
जरी वाटे जीवा भेटावा श्रीपति |
तरी व्हावा पोटीं अनुताप ||१||
अनुतापाविण नाहीं चित्त-शुद्धि |
न राहे ती बुद्धि आत्म-निष्ठ ||२||
आत्म-निष्ठ बुद्धि राहतां अखंड |
मोडेल तें बंड प्रपंचाचे ||३||
प्रपंचाचें बंड मोडता चि अंतीं |
भेटतो श्री-पति स्वामी म्हणे ||४||
[१९२]
निर्वातीचा दीप तेवतो निवांत |
तैसें राहो चित्त सर्वकाळ ||१||
आला गेला मेघ उदास गगन |
तैसें राहो मन सुख-दु:खी ||२||
असोनियां जळीं अलिप्त राजीव |
राहो तैसा जीव उपाधीत ||३||
स्वामी म्हणे सदा असावें संतुष्ट |
स्व-रुपी प्रविष्ट होवोनियां ||४||
जरी वाटे जीवा भेटावा श्रीपति |
तरी व्हावा पोटीं अनुताप ||१||
अनुतापाविण नाहीं चित्त-शुद्धि |
न राहे ती बुद्धि आत्म-निष्ठ ||२||
आत्म-निष्ठ बुद्धि राहतां अखंड |
मोडेल तें बंड प्रपंचाचे ||३||
प्रपंचाचें बंड मोडता चि अंतीं |
भेटतो श्री-पति स्वामी म्हणे ||४||
[१९२]
निर्वातीचा दीप तेवतो निवांत |
तैसें राहो चित्त सर्वकाळ ||१||
आला गेला मेघ उदास गगन |
तैसें राहो मन सुख-दु:खी ||२||
असोनियां जळीं अलिप्त राजीव |
राहो तैसा जीव उपाधीत ||३||
स्वामी म्हणे सदा असावें संतुष्ट |
स्व-रुपी प्रविष्ट होवोनियां ||४||
Wednesday, June 1, 2011
[१८९]
राम-नाम येता कानीं |
होय पातकांची धुनी ||१||
राम-नाम घेता वाचे |
होय सार्थक देहाचें ||२||
राम-नामाचे स्मरण |
होता , चुके जन्म-मरण ||३||
उच्चारितां राम-नाम |
स्वामी झाला पूर्ण-काम ||४||
[१९०]
जों जों धरी प्रपंचाची आस |
तों तों त्याचा फांस दृढावतो ||१||
जों जों राहे जीवी प्रपंची उदास |
तों तों त्याचा फास ढिला होय ||२||
कां गा जासी वृथा प्रपंची गुंतून |
पाहे विचारून सारासार ||३||
स्वामी म्हणे देहीं उदास राहून |
करी सोडवण तुझी तूं ची ||४||
राम-नाम येता कानीं |
होय पातकांची धुनी ||१||
राम-नाम घेता वाचे |
होय सार्थक देहाचें ||२||
राम-नामाचे स्मरण |
होता , चुके जन्म-मरण ||३||
उच्चारितां राम-नाम |
स्वामी झाला पूर्ण-काम ||४||
[१९०]
जों जों धरी प्रपंचाची आस |
तों तों त्याचा फांस दृढावतो ||१||
जों जों राहे जीवी प्रपंची उदास |
तों तों त्याचा फास ढिला होय ||२||
कां गा जासी वृथा प्रपंची गुंतून |
पाहे विचारून सारासार ||३||
स्वामी म्हणे देहीं उदास राहून |
करी सोडवण तुझी तूं ची ||४||
Tuesday, May 31, 2011
[१८७]
झालो ब्रह्म ऐसें बोलतां अहंता |
स्पर्शे पाहे चित्ता म्हणोनियां ||१||
मन बुद्धीसहित समर्पिले चित्त |
राहिलों निवांत हरिपायीं ||२||
आतां अहं सोsहं मावळलें भान |
अवघें नारायण रूप झालें ||३||
स्वामी म्हणे ऐसें भक्तीचें महिमान |
ओळखावी खूण स्वानुभवें ||४||
[१८८]
नाम-जपे जाप जळोनियां पाप |
होय आपेआप आत्म-शुद्धी ||१||
नाम-जपें जाय काम क्रोध भय |
होय मनोजय अनायासें ||२||
जपा हरि-नाम जपा हरि-नाम |
मार्ग हा सुगम वैकुंठींचा ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही नामें चि सबळ |
कांपे कळिकाळ आम्हांपुढे ||४||
झालो ब्रह्म ऐसें बोलतां अहंता |
स्पर्शे पाहे चित्ता म्हणोनियां ||१||
मन बुद्धीसहित समर्पिले चित्त |
राहिलों निवांत हरिपायीं ||२||
आतां अहं सोsहं मावळलें भान |
अवघें नारायण रूप झालें ||३||
स्वामी म्हणे ऐसें भक्तीचें महिमान |
ओळखावी खूण स्वानुभवें ||४||
[१८८]
नाम-जपे जाप जळोनियां पाप |
होय आपेआप आत्म-शुद्धी ||१||
नाम-जपें जाय काम क्रोध भय |
होय मनोजय अनायासें ||२||
जपा हरि-नाम जपा हरि-नाम |
मार्ग हा सुगम वैकुंठींचा ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही नामें चि सबळ |
कांपे कळिकाळ आम्हांपुढे ||४||
Saturday, May 28, 2011
[१८५]
नका बोलों ऐसें झालो ब्रह्मज्ञानी |
ब्रह्म वोलांडुनि वेगळें चि ||१||
झोपलों मी म्हणे असे चि तो जागा |
कळों आले जगा आपेंआप ||२||
झालों म्हणे मुका तो चि तो बोलका |
कळों आलें लोका आपेंआप ||३||
आम्ही झालो म्हणे तें चि तया न्यून |
मौन हीं चि खूण स्वामी म्हणे ||४||
[१८६]
दीन मी अभागी होऊनी भिकारी |
कैसा दारोदारीं हिंडतसें ||१||
मी चि भाग्यवंत होऊनी सधन |
वाटीतसें अन्न याचीकांते ||२||
मी चि नर-नारी संन्यासी संसारी |
नाना वेषधारी मी चि एक ||३||
स्वामी म्हणे झालों मी चि चराचर
नांदतों साचार एकला चि ||४||
नका बोलों ऐसें झालो ब्रह्मज्ञानी |
ब्रह्म वोलांडुनि वेगळें चि ||१||
झोपलों मी म्हणे असे चि तो जागा |
कळों आले जगा आपेंआप ||२||
झालों म्हणे मुका तो चि तो बोलका |
कळों आलें लोका आपेंआप ||३||
आम्ही झालो म्हणे तें चि तया न्यून |
मौन हीं चि खूण स्वामी म्हणे ||४||
[१८६]
दीन मी अभागी होऊनी भिकारी |
कैसा दारोदारीं हिंडतसें ||१||
मी चि भाग्यवंत होऊनी सधन |
वाटीतसें अन्न याचीकांते ||२||
मी चि नर-नारी संन्यासी संसारी |
नाना वेषधारी मी चि एक ||३||
स्वामी म्हणे झालों मी चि चराचर
नांदतों साचार एकला चि ||४||
Friday, May 27, 2011
[१८३]
आघवा संसार झाला मोक्ष-मय |
होता ज्ञानोदय अंतर्यामी ||१||
लाधले सकल साधनांचे फळ |
भेटला गोपाल अखंडित ||२||
काम क्रोध लोभ निमाले संपूर्ण |
झाले समाधान अनिर्वाच्य ||३||
स्वामी म्हणे आता बैसलो निवांत |
हरिपायी चित्त लावोनिया ||४||
[१८४]
जगीं जो का बळी तो चि कान पिळी |
थोर मासा गिळी लहानतें ||१||
कां गा लुबाडावे दीन असहाय |
साजे का हा न्याय मानवतें ||२||
हे चि काय सांगें बुद्धीचें लक्षण |
करावे भक्षण दुर्बळांचें ||३||
स्वामी म्हणे ज्याचें ध्येय सर्वोदय |
धन्य तो चि होय मानवांत
आघवा संसार झाला मोक्ष-मय |
होता ज्ञानोदय अंतर्यामी ||१||
लाधले सकल साधनांचे फळ |
भेटला गोपाल अखंडित ||२||
काम क्रोध लोभ निमाले संपूर्ण |
झाले समाधान अनिर्वाच्य ||३||
स्वामी म्हणे आता बैसलो निवांत |
हरिपायी चित्त लावोनिया ||४||
[१८४]
जगीं जो का बळी तो चि कान पिळी |
थोर मासा गिळी लहानतें ||१||
कां गा लुबाडावे दीन असहाय |
साजे का हा न्याय मानवतें ||२||
हे चि काय सांगें बुद्धीचें लक्षण |
करावे भक्षण दुर्बळांचें ||३||
स्वामी म्हणे ज्याचें ध्येय सर्वोदय |
धन्य तो चि होय मानवांत
Thursday, May 26, 2011
[१८१]
होतां कृष्णार्पण सर्व हि व्यापार ||
देही अहंकार राहे कैचा ||१||
करता करविता एकला श्रीहरि |
भाव हा अंतरी दृढावला ||२||
होवो निंदा-स्तुति न धरूं ती चित्तीं |
आळवूं श्री-पति भक्ति-भावे ||३||
स्वामी म्हणे जाता भक्तीचिया वाटे |
बोंचती न काटे विकल्पाचे ||४||
[१८२]
नको नको मना धनाचा अभिमान |
तेणें जनार्दन रुष्ट होय ||१||
नको नको मना लौकिकाचा पाश |
तेणें जगदिश दुरावेल ||२||
नको नको मना संसारी आसक्ती |
तेणें तो श्री-पति अंतरेल ||३||
स्वामी म्हणे मना होई गा तूं भृंग |
नित्य रमा-रंग-पाद-पद्मी ||४||
होतां कृष्णार्पण सर्व हि व्यापार ||
देही अहंकार राहे कैचा ||१||
करता करविता एकला श्रीहरि |
भाव हा अंतरी दृढावला ||२||
होवो निंदा-स्तुति न धरूं ती चित्तीं |
आळवूं श्री-पति भक्ति-भावे ||३||
स्वामी म्हणे जाता भक्तीचिया वाटे |
बोंचती न काटे विकल्पाचे ||४||
[१८२]
नको नको मना धनाचा अभिमान |
तेणें जनार्दन रुष्ट होय ||१||
नको नको मना लौकिकाचा पाश |
तेणें जगदिश दुरावेल ||२||
नको नको मना संसारी आसक्ती |
तेणें तो श्री-पति अंतरेल ||३||
स्वामी म्हणे मना होई गा तूं भृंग |
नित्य रमा-रंग-पाद-पद्मी ||४||
Wednesday, May 25, 2011
[१७९]
सद् गुरु-चरण उपासिता जाण |
आंगवाले ज्ञान विज्ञानेंसी ||१||
आता कोठें काहीं राहिले ना न्यून |
अवघे परिपूर्ण एकलेंचिं ||२||
एक ना जे दुजें शून्य ना संपूर्ण |
देखयेली खुण महा-शून्यीं ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही न पडों संदेही |
देही चि विदेही आत्मरूप ||४||
[१८०]
अनाथांचा नाथ पतित पावन |
सज्जन-जीवन वासुदेव ||१||
दुर्बलांचा वाली सखा दीन-बंधू |
कारुण्याचा सिंधु वासुदेव ||२||
शरणागता हात देई सदोदित |
संतांचे दैवत वासुदेव ||३||
स्वामी म्हणे देव भाविका माउली |
कृपेची साउली करीतसे ||४||
सद् गुरु-चरण उपासिता जाण |
आंगवाले ज्ञान विज्ञानेंसी ||१||
आता कोठें काहीं राहिले ना न्यून |
अवघे परिपूर्ण एकलेंचिं ||२||
एक ना जे दुजें शून्य ना संपूर्ण |
देखयेली खुण महा-शून्यीं ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही न पडों संदेही |
देही चि विदेही आत्मरूप ||४||
[१८०]
अनाथांचा नाथ पतित पावन |
सज्जन-जीवन वासुदेव ||१||
दुर्बलांचा वाली सखा दीन-बंधू |
कारुण्याचा सिंधु वासुदेव ||२||
शरणागता हात देई सदोदित |
संतांचे दैवत वासुदेव ||३||
स्वामी म्हणे देव भाविका माउली |
कृपेची साउली करीतसे ||४||
Tuesday, May 24, 2011
[१७७]
सांगे प्राण्या कां गा होसी वेडा पिसा |
श्रीहरि कोंवसा भाविकांसी ||१||
हरिकृपेविण संसाराची व्यथा |
न फिटे सर्वथा ऐसें जाण ||२||
जाय मनोभावें हरीसी शरण |
तेणे उद्धरण होय तुझें ||३||
स्वामी म्हणे हा चि निर्धारिता पंथ |
संसारी परमार्थ जोडसील ||४||
[१७८]
संतांसी सद्भावे करोनी प्रणिपात |
कांहीं आत्महित विचारावे ||१||
काय ती विरक्ती कैसी आत्म-स्थिती |
ज्ञानाची प्रचीती कैसी होय ||२||
कैसी हरी-भक्ती कैसी शरणागती |
नामाची महती कैसी होय ||३||
स्वामी म्हणे संत दावितील खुण |
घ्यावी ओळखून ज्याची त्यानें ||४||
सांगे प्राण्या कां गा होसी वेडा पिसा |
श्रीहरि कोंवसा भाविकांसी ||१||
हरिकृपेविण संसाराची व्यथा |
न फिटे सर्वथा ऐसें जाण ||२||
जाय मनोभावें हरीसी शरण |
तेणे उद्धरण होय तुझें ||३||
स्वामी म्हणे हा चि निर्धारिता पंथ |
संसारी परमार्थ जोडसील ||४||
[१७८]
संतांसी सद्भावे करोनी प्रणिपात |
कांहीं आत्महित विचारावे ||१||
काय ती विरक्ती कैसी आत्म-स्थिती |
ज्ञानाची प्रचीती कैसी होय ||२||
कैसी हरी-भक्ती कैसी शरणागती |
नामाची महती कैसी होय ||३||
स्वामी म्हणे संत दावितील खुण |
घ्यावी ओळखून ज्याची त्यानें ||४||
Monday, May 23, 2011
[१७५]
गुरु तो ची देव ऐसा ठेवीं भाव |
सद् गुरू -गौरव काय वानूं ||१||
तो चि ज्ञान-मूर्ती ब्रह्मानंद-स्थिती |
देई परा शांती भाविकांते ||२||
भक्ती-भावें जातां तयासी शरण |
होते ओळखण स्व-रुपाची ||३||
स्वामी म्हणे वंदी सद् गुरु-पाऊलें |
भलें आकारले प्र-ब्रह्म ||४||
[१७६]
सोsहं सोsहं ध्यास लागता जीवास |
होतसे निरास संमोहाचा ||१||
त्रिगुणाचे भान हारपे मीपण |
होता सोsहं ध्यान निरंतर ||२||
अंती एकमय ध्याता ध्यान ध्येय |
होता ज्ञानोदय अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे मग स्वानंदाचा भोग
होय तो हि साड्ग सुखरूप ||४||
गुरु तो ची देव ऐसा ठेवीं भाव |
सद् गुरू -गौरव काय वानूं ||१||
तो चि ज्ञान-मूर्ती ब्रह्मानंद-स्थिती |
देई परा शांती भाविकांते ||२||
भक्ती-भावें जातां तयासी शरण |
होते ओळखण स्व-रुपाची ||३||
स्वामी म्हणे वंदी सद् गुरु-पाऊलें |
भलें आकारले प्र-ब्रह्म ||४||
[१७६]
सोsहं सोsहं ध्यास लागता जीवास |
होतसे निरास संमोहाचा ||१||
त्रिगुणाचे भान हारपे मीपण |
होता सोsहं ध्यान निरंतर ||२||
अंती एकमय ध्याता ध्यान ध्येय |
होता ज्ञानोदय अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे मग स्वानंदाचा भोग
होय तो हि साड्ग सुखरूप ||४||
Sunday, May 22, 2011
[१७३]
होता अंतर्यामी ज्ञानाची जागृती |
जीव-जगत्-भ्रांति दूर ठेली ||१||
कर्मजात आतां प्रकृतीच्या माथा |
लावुनी तत्वतां मुक्त झालों ||२||
जन्म-मरणाची लोपली ते वार्ता |
सुखें आलें हातां ब्रह्म-पद ||३||
स्वामी म्हणे चारी देहांते निरसून |
झालों आम्ही पूर्ण ब्रह्म-रूप ||४||
[१७४]
"सांगा का जावे संतांसी शरण |
काय संतांविण ज्ञान नाही ||१||
कशासाठीं व्हावी संतांची मध्यस्थी |
आम्ही ब्राह्मी-स्थिती स्वयें गाठूं" ||२||
नका बोलूं ऐसें पावाल पतन |
तुम्हा अभिमान नागवील ||३||
स्वामी म्हणे संत ब्रह्म मूर्तिमंत |
विश्व-कल्याणार्थ वावरती ||४||
होता अंतर्यामी ज्ञानाची जागृती |
जीव-जगत्-भ्रांति दूर ठेली ||१||
कर्मजात आतां प्रकृतीच्या माथा |
लावुनी तत्वतां मुक्त झालों ||२||
जन्म-मरणाची लोपली ते वार्ता |
सुखें आलें हातां ब्रह्म-पद ||३||
स्वामी म्हणे चारी देहांते निरसून |
झालों आम्ही पूर्ण ब्रह्म-रूप ||४||
[१७४]
"सांगा का जावे संतांसी शरण |
काय संतांविण ज्ञान नाही ||१||
कशासाठीं व्हावी संतांची मध्यस्थी |
आम्ही ब्राह्मी-स्थिती स्वयें गाठूं" ||२||
नका बोलूं ऐसें पावाल पतन |
तुम्हा अभिमान नागवील ||३||
स्वामी म्हणे संत ब्रह्म मूर्तिमंत |
विश्व-कल्याणार्थ वावरती ||४||
Saturday, May 21, 2011
[१७१]
अंतरी भजन चाले रांत्र-दिन |
तेणें समाधान अनिर्वाच्य ||१||
नित्य नाम-जप होतो आपेंआप |
तया सुख माप कोण करी ||२||
शब्दाविण ध्वनी करोनी श्रवण |
ठेवी अनुसंधान आत्म-रुपी ||३||
स्वामी म्हणे खूण घ्यवी ओळखून |
संतांसी शरण जावोनियां ||४||
[१७२]
पाहे ज्याची दृष्टी सर्वत्र श्रीहरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||१||
रामकृष्ण हरि उच्चारी वैखरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||२||
आठवी श्रीहरी नित्य ह्रदंतरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||३||
स्वामी म्हणे भक्तीपासी चारी मुक्ती |
भाग्य नाहीं मिती भक्ताचिया ||४||
अंतरी भजन चाले रांत्र-दिन |
तेणें समाधान अनिर्वाच्य ||१||
नित्य नाम-जप होतो आपेंआप |
तया सुख माप कोण करी ||२||
शब्दाविण ध्वनी करोनी श्रवण |
ठेवी अनुसंधान आत्म-रुपी ||३||
स्वामी म्हणे खूण घ्यवी ओळखून |
संतांसी शरण जावोनियां ||४||
[१७२]
पाहे ज्याची दृष्टी सर्वत्र श्रीहरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||१||
रामकृष्ण हरि उच्चारी वैखरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||२||
आठवी श्रीहरी नित्य ह्रदंतरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||३||
स्वामी म्हणे भक्तीपासी चारी मुक्ती |
भाग्य नाहीं मिती भक्ताचिया ||४||
Friday, May 20, 2011
[१७०]
एक झाला सत्ताधारी |
एक घालितो चाकरी ||१||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||२||
एक राजा एक रंक |
एक ज्ञाता एक मूर्ख ||३||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||४||
एक श्रेष्ठ एक हीन |
एक सुदृढ एक क्षीण ||५||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||६||
एक तृप्त एक भुकी |
एक सुखी एक दु:खी ||७|
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||८||
कृपा करी एकावरी |
देव एकाते अव्हेरी ||९||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||१०||
एक झाला सत्ताधारी |
एक घालितो चाकरी ||१||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||२||
एक राजा एक रंक |
एक ज्ञाता एक मूर्ख ||३||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||४||
एक श्रेष्ठ एक हीन |
एक सुदृढ एक क्षीण ||५||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||६||
एक तृप्त एक भुकी |
एक सुखी एक दु:खी ||७|
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||८||
कृपा करी एकावरी |
देव एकाते अव्हेरी ||९||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||१०||
Monday, May 16, 2011
[१६८]
हरि-रूप ध्याऊं हरि-रूप पाहूं |
अखंडित राहूं हरिपायीं ||१||
सेवू नामामृत होऊं या पुनीत |
गाऊ हरि-गीत आवडीने ||२||
तन-मन-धन हरिसी अर्पून |
घालूं लोटांगण भक्ती-भावें ||३||
स्वामी म्हणे लावूं सार्थकीं जीवन |
हरिसी शरण जावोनियां ||४||
[१६९]
सांगे कां गा जासी स्तुतीसी भाळून |
जगीं तुझ्यावीण दुजें कोण ||१||
एकोनिया निंदा कां गा होसी खिन्न |
जगीं तुझ्यावीण दुजें कोण ||२||
तूं ची तुझा बंधू तूं ची तुझा वैरी |
तुझा तूं विचारीं दुजें कोण ||३||
कोणाशीं गा द्वेष कोणावरी लोभ |
एकला स्वयंभ तुझा तूं चि ||४||
स्वामी म्हणे पाहे आपणा आपण |
विश्वीं दुजेपण राहे कैचें ||५||
हरि-रूप ध्याऊं हरि-रूप पाहूं |
अखंडित राहूं हरिपायीं ||१||
सेवू नामामृत होऊं या पुनीत |
गाऊ हरि-गीत आवडीने ||२||
तन-मन-धन हरिसी अर्पून |
घालूं लोटांगण भक्ती-भावें ||३||
स्वामी म्हणे लावूं सार्थकीं जीवन |
हरिसी शरण जावोनियां ||४||
[१६९]
सांगे कां गा जासी स्तुतीसी भाळून |
जगीं तुझ्यावीण दुजें कोण ||१||
एकोनिया निंदा कां गा होसी खिन्न |
जगीं तुझ्यावीण दुजें कोण ||२||
तूं ची तुझा बंधू तूं ची तुझा वैरी |
तुझा तूं विचारीं दुजें कोण ||३||
कोणाशीं गा द्वेष कोणावरी लोभ |
एकला स्वयंभ तुझा तूं चि ||४||
स्वामी म्हणे पाहे आपणा आपण |
विश्वीं दुजेपण राहे कैचें ||५||
Sunday, May 15, 2011
[१६६]
जनासी घरदार कुटुंब-संसार |
आम्ही दिगंबर ठायीचे चि ||१||
जनासी अधिकार वैभवाची हांव |
आम्हा रूप नांव ते हि नको ||२||
जन अपेक्शिती धन मान कीर्ती |
आम्हांलागीं क्षिती नाहीं त्याची ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही झालों कानफाटे |
चालों उफराटे जगामाजीं ||४||
[१६७]
नाथ-संप्रदायी आम्ही कानफाटे |
जाऊं नका वाटे आमुचिया ||१||
मन-पवनाची घालोनियां गांठ |
करूं वाताहत संसाराची ||२||
देहासवें पुसूं लौकीकाचे नांव |
नेदूं उरों ठाव जीवासी हि ||३||
स्वामी म्हणे तुम्हां बुडवू महा-शून्यीं |
गगनासी आटणी होये जेथे ||४||
जनासी घरदार कुटुंब-संसार |
आम्ही दिगंबर ठायीचे चि ||१||
जनासी अधिकार वैभवाची हांव |
आम्हा रूप नांव ते हि नको ||२||
जन अपेक्शिती धन मान कीर्ती |
आम्हांलागीं क्षिती नाहीं त्याची ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही झालों कानफाटे |
चालों उफराटे जगामाजीं ||४||
[१६७]
नाथ-संप्रदायी आम्ही कानफाटे |
जाऊं नका वाटे आमुचिया ||१||
मन-पवनाची घालोनियां गांठ |
करूं वाताहत संसाराची ||२||
देहासवें पुसूं लौकीकाचे नांव |
नेदूं उरों ठाव जीवासी हि ||३||
स्वामी म्हणे तुम्हां बुडवू महा-शून्यीं |
गगनासी आटणी होये जेथे ||४||
Saturday, May 14, 2011
[१६४]
साधकें सर्वदा असावे सावध |
यत्ने काम-क्रोध आवरावे ||१||
अंतरी जागृत ठेवावा विवेक |
लक्षूनियां एक आत्म-रूप ||२||
विश्वासें करावा हरिनामोच्चार |
होता अनावर काम-क्रोध ||३||
स्वामी म्हणे हा ची निर्वाणींचा बाण |
तेणे निर्दालन षड्रिपूंचें ||४||
[१६५]
घडे जे स्वभावें कर्म तें आघवें |
भावे समर्पावे हरिपायीं ||१||
देता घेता करता भोक्ता नारायण |
भाव परिपूर्ण असों द्यावा ||२||
तेणें शुभाशुभ-कर्माचें बंधन |
न लागता जाण मोक्ष-लाभ ||३||
स्वामी म्हणे भक्तीपासीं चारी मुक्ती |
ऐसी चि प्रचीती आली मज ||४||
साधकें सर्वदा असावे सावध |
यत्ने काम-क्रोध आवरावे ||१||
अंतरी जागृत ठेवावा विवेक |
लक्षूनियां एक आत्म-रूप ||२||
विश्वासें करावा हरिनामोच्चार |
होता अनावर काम-क्रोध ||३||
स्वामी म्हणे हा ची निर्वाणींचा बाण |
तेणे निर्दालन षड्रिपूंचें ||४||
[१६५]
घडे जे स्वभावें कर्म तें आघवें |
भावे समर्पावे हरिपायीं ||१||
देता घेता करता भोक्ता नारायण |
भाव परिपूर्ण असों द्यावा ||२||
तेणें शुभाशुभ-कर्माचें बंधन |
न लागता जाण मोक्ष-लाभ ||३||
स्वामी म्हणे भक्तीपासीं चारी मुक्ती |
ऐसी चि प्रचीती आली मज ||४||
[१६२]
आठ हि प्रहर संसार व्यवहार |
करी ना विचार दुजा कांही ||१||
नाठविता देव नाचरितां धर्म |
अर्थ आणि काम भोगूं पाहे ||२||
अर्थ अनर्थासी होवुनी कारण |
कामे केला दीन बापुडा तो ||३||
स्वामी म्हणे अंती साधिला ना स्वार्थ |
जिणे गेले व्यर्थ पामराचें ||४||
[१६३]
रामकृष्ण परमहंस |
थोर जगदंबेचा दास ||१||
कालीमातेचे चिंतन |
करी भावें रात्रं-दिन ||२||
जगन्माते संगे बोले |
माता सांगे तैसा चाले ||३||
कालीमातेचा प्रख्यात
भक्त योगी ज्ञानवंत ||४||
स्वामी म्हणे होता भेटी |
नेत्री प्रेमाश्रु दाटती ||५||
आठ हि प्रहर संसार व्यवहार |
करी ना विचार दुजा कांही ||१||
नाठविता देव नाचरितां धर्म |
अर्थ आणि काम भोगूं पाहे ||२||
अर्थ अनर्थासी होवुनी कारण |
कामे केला दीन बापुडा तो ||३||
स्वामी म्हणे अंती साधिला ना स्वार्थ |
जिणे गेले व्यर्थ पामराचें ||४||
[१६३]
रामकृष्ण परमहंस |
थोर जगदंबेचा दास ||१||
कालीमातेचे चिंतन |
करी भावें रात्रं-दिन ||२||
जगन्माते संगे बोले |
माता सांगे तैसा चाले ||३||
कालीमातेचा प्रख्यात
भक्त योगी ज्ञानवंत ||४||
स्वामी म्हणे होता भेटी |
नेत्री प्रेमाश्रु दाटती ||५||
Thursday, May 12, 2011
[१६०]
वासुदेवमय विश्व हें आघवें |
भ्रांतीचे निनांवें शून्याकार ||१||
नाम-स्वरूपातीत वसे वासुदेव |
विश्वी स्वयमेव एकला चि ||२||
प्रभा आणि भानू एक चि संपूर्ण |
पट तंतुहून भिन्न काई ||३||
सगुण निर्गुण तैसा नारायण |
भूतांसी अभिन्न स्वामी म्हणे ||४||
[१६१]
एक चि तत्वतां आत्म-रूप-सत्ता |
भूतांसी भिन्नता उरे कोठे ||१||
काय काळोखातें ओळखितो सूर्य |
तेजें लोक-त्रय प्रकाशी जो ||२||
अमृत तें जाणे काइ मृत्यू वार्ता |
चंद्रा दाहकता असे ठावी ? ||३||
स्वामी म्हणे होतां स्वरूपी तद्रूप |
लोपे आपेआप द्वैताभास ||४||
वासुदेवमय विश्व हें आघवें |
भ्रांतीचे निनांवें शून्याकार ||१||
नाम-स्वरूपातीत वसे वासुदेव |
विश्वी स्वयमेव एकला चि ||२||
प्रभा आणि भानू एक चि संपूर्ण |
पट तंतुहून भिन्न काई ||३||
सगुण निर्गुण तैसा नारायण |
भूतांसी अभिन्न स्वामी म्हणे ||४||
[१६१]
एक चि तत्वतां आत्म-रूप-सत्ता |
भूतांसी भिन्नता उरे कोठे ||१||
काय काळोखातें ओळखितो सूर्य |
तेजें लोक-त्रय प्रकाशी जो ||२||
अमृत तें जाणे काइ मृत्यू वार्ता |
चंद्रा दाहकता असे ठावी ? ||३||
स्वामी म्हणे होतां स्वरूपी तद्रूप |
लोपे आपेआप द्वैताभास ||४||
Wednesday, May 11, 2011
[१५८]
तीन पाउलांत व्यापिला त्रि-लोक |
काय तें कौतुक वामनाचें ||१||
झाला द्वार-पाळ बळीचा पाताळीं |
भक्तातें सांभाळी सर्वकाळ ||२||
वामनाचे पायीं ठेवोनियां डोई |
भक्ती-भावे होई लीन आतां ||३||
सर्वस्वाचे दान देतां वामनातें |
उरे न मनातें चिंता कांही ||४||
स्वामी म्हणे दान मागतो वामन |
त्यासी मीपण समर्पिले ||५||
[१५९]
वासुदेवविण न देखे दर्शन |
वासुदेवी मन स्थिरावले ||१||
आता अंतर्बाह्य वसे वासुदेव |
नसे रिता ठाव अणुमात्र ||२||
काय विश्व कोठें गेले मीतूंपण |
हारपलें भान एकाएकी ||३||
देवभक्तपण करोनी निर्माण |
आपुला आपण खेळतसे ||४||
स्वामी म्हणे झालो वासुदेवी लीन |
भावें लोटांगण घालोनिया ||५||
तीन पाउलांत व्यापिला त्रि-लोक |
काय तें कौतुक वामनाचें ||१||
झाला द्वार-पाळ बळीचा पाताळीं |
भक्तातें सांभाळी सर्वकाळ ||२||
वामनाचे पायीं ठेवोनियां डोई |
भक्ती-भावे होई लीन आतां ||३||
सर्वस्वाचे दान देतां वामनातें |
उरे न मनातें चिंता कांही ||४||
स्वामी म्हणे दान मागतो वामन |
त्यासी मीपण समर्पिले ||५||
[१५९]
वासुदेवविण न देखे दर्शन |
वासुदेवी मन स्थिरावले ||१||
आता अंतर्बाह्य वसे वासुदेव |
नसे रिता ठाव अणुमात्र ||२||
काय विश्व कोठें गेले मीतूंपण |
हारपलें भान एकाएकी ||३||
देवभक्तपण करोनी निर्माण |
आपुला आपण खेळतसे ||४||
स्वामी म्हणे झालो वासुदेवी लीन |
भावें लोटांगण घालोनिया ||५||
Tuesday, May 10, 2011
[१५७]
एकशे छप्पन अभंग रचोन |
पहाया म्हणोन दिले संतां ||१||
संती संतोषून डोलाविली मान |
परी एक न्यून दाखविलें ||२||
"अनिर्दिष्टनाम काव्य गमे उणें |
केली मिठाविणे पाक-सिद्धी ||३||
अभंगाशेवटीं नामाचा निर्देश |
करणे सुयश जोडावया " ||४||
संतांहातीं ऐसा पाठवी निरोप |
माझा माय-बाप वासुदेव ||५||
संतांचे वचन मानुनी प्रमाण |
न्यून केले पूर्ण हरि-कृपें ||६||
लक्षुनी भावार्थ अभंग समस्त |
पुनरपि साद्दन्त संशोधिले ||७||
अभंगाशेवटी नामाची योजना |
केली जनार्दना तोषवाया ||८||
स्वामी म्हणे माझा सखा नारायण |
कोठें काहीं न्यून पडों नेदी ||९||
एकशे छप्पन अभंग रचोन |
पहाया म्हणोन दिले संतां ||१||
संती संतोषून डोलाविली मान |
परी एक न्यून दाखविलें ||२||
"अनिर्दिष्टनाम काव्य गमे उणें |
केली मिठाविणे पाक-सिद्धी ||३||
अभंगाशेवटीं नामाचा निर्देश |
करणे सुयश जोडावया " ||४||
संतांहातीं ऐसा पाठवी निरोप |
माझा माय-बाप वासुदेव ||५||
संतांचे वचन मानुनी प्रमाण |
न्यून केले पूर्ण हरि-कृपें ||६||
लक्षुनी भावार्थ अभंग समस्त |
पुनरपि साद्दन्त संशोधिले ||७||
अभंगाशेवटी नामाची योजना |
केली जनार्दना तोषवाया ||८||
स्वामी म्हणे माझा सखा नारायण |
कोठें काहीं न्यून पडों नेदी ||९||
Monday, May 9, 2011
[१५५]
मना तुजप्रती एक ची विनंती |
आळवी श्रीपती आवडीनें ||१||
हरि पदाबुंजीं होवुनी भ्रमर |
करी निरंतर गुंजराव ||२||
श्रीहरि चंद्रमा होई तूं चकोर |
सेवी गा मधुर सुधा-रस ||३||
श्रीहरि माउली बाळ तूं होवून
करी स्तन-पान स्वामी म्हणे ||४||
[१५६]
तुजलागीं मना ऐसा विज्ञापना |
भावे जनार्दना आठवावें ||१||
विषयांची भीड येवो नेदीं आड |
करी गा अखंड हरी-ध्यान ||२||
तोडी देह-बंध लौकिक -संबंध |
जोडी सौख्य-कंद वासुदेव ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं काळाचे हि भय |
होतां चि तन्मय वासुदेवीं ||४||
मना तुजप्रती एक ची विनंती |
आळवी श्रीपती आवडीनें ||१||
हरि पदाबुंजीं होवुनी भ्रमर |
करी निरंतर गुंजराव ||२||
श्रीहरि चंद्रमा होई तूं चकोर |
सेवी गा मधुर सुधा-रस ||३||
श्रीहरि माउली बाळ तूं होवून
करी स्तन-पान स्वामी म्हणे ||४||
[१५६]
तुजलागीं मना ऐसा विज्ञापना |
भावे जनार्दना आठवावें ||१||
विषयांची भीड येवो नेदीं आड |
करी गा अखंड हरी-ध्यान ||२||
तोडी देह-बंध लौकिक -संबंध |
जोडी सौख्य-कंद वासुदेव ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं काळाचे हि भय |
होतां चि तन्मय वासुदेवीं ||४||
Saturday, May 7, 2011
[१५३]
सखा माझा नारायण |
करी चिंता निवारण ||१||
मज सांवरितां हरि |
आलीं विघ्नें दूर करी ||२||
दोष जाळूनी समस्त |
शुद्ध करी माझें चित्त ||३||
तो ची लक्षी माझें हित |
स्वामी म्हणे मी निश्चिंत ||४||
[१५४]
भासे मृगजळ तैसें चि केवळ |
विश्व हे सकळ भ्रांतिरूप ||१||
रज्जूवरी व्हावा सर्पाचा आभास |
तैसा विश्वाभास आत्मरूपीं ||२||
वांझेची संतति तैसी भूतसृष्टी |
व्हावी जैसी वृष्टी खपुष्पांची ||३||
स्वामी म्हणे वश्व नश्वर मायिक |
अविनाशी एक आत्म-रूप ||४||
सखा माझा नारायण |
करी चिंता निवारण ||१||
मज सांवरितां हरि |
आलीं विघ्नें दूर करी ||२||
दोष जाळूनी समस्त |
शुद्ध करी माझें चित्त ||३||
तो ची लक्षी माझें हित |
स्वामी म्हणे मी निश्चिंत ||४||
[१५४]
भासे मृगजळ तैसें चि केवळ |
विश्व हे सकळ भ्रांतिरूप ||१||
रज्जूवरी व्हावा सर्पाचा आभास |
तैसा विश्वाभास आत्मरूपीं ||२||
वांझेची संतति तैसी भूतसृष्टी |
व्हावी जैसी वृष्टी खपुष्पांची ||३||
स्वामी म्हणे वश्व नश्वर मायिक |
अविनाशी एक आत्म-रूप ||४||
Friday, May 6, 2011
[१५१]
एक वासुदेव नांदे चराचारी |
त्याविण दुसरी वस्तु नाही ||१||
वासुदेव येथें वासुदेव तेथे |
व्यापितो सर्वातें वासुदेव ||२||
व्याप्त तो व्यापक सर्व सर्वात्मक |
सर्वातीत एक वासुदेव ||३||
ध्याता ध्यान ध्येय वासुदेवमय |
एक तो अद्वय स्वामी म्हणे ||४||
[१५२]
अंतरी विरक्ती नाहीं भाव-भक्ति |
तया अधोगती चुके चि ना ||१||
लोळती शेणांत सुखें शेणकिडे |
तैसे ते बापुडे प्रपंचांत ||२||
गुंतुनिया देहीं बुडाले संदेही |
अंती तयां नाही समाधान ||३||
भाव-भक्ती हीन कोरडे कठीण |
जळो तें जीवन स्वामी म्हणे ||४||
एक वासुदेव नांदे चराचारी |
त्याविण दुसरी वस्तु नाही ||१||
वासुदेव येथें वासुदेव तेथे |
व्यापितो सर्वातें वासुदेव ||२||
व्याप्त तो व्यापक सर्व सर्वात्मक |
सर्वातीत एक वासुदेव ||३||
ध्याता ध्यान ध्येय वासुदेवमय |
एक तो अद्वय स्वामी म्हणे ||४||
[१५२]
अंतरी विरक्ती नाहीं भाव-भक्ति |
तया अधोगती चुके चि ना ||१||
लोळती शेणांत सुखें शेणकिडे |
तैसे ते बापुडे प्रपंचांत ||२||
गुंतुनिया देहीं बुडाले संदेही |
अंती तयां नाही समाधान ||३||
भाव-भक्ती हीन कोरडे कठीण |
जळो तें जीवन स्वामी म्हणे ||४||
Thursday, May 5, 2011
[१४९]
करीं गा निष्काम स्वकर्माचरण |
नामसंकीर्तन विठ्ठलाचें ||१||
आत्म-निरीक्षण किंवा धरीं ध्यान |
स्वीकारी साधन आवडे तें ||२||
साधनी निमग्न राहें रांत्र-दिन |
तेणे होय जान चित्त-शुद्धी ||३||
होता चित्त-शुद्धी लाभे आत्म-ज्ञान |
ज्ञानें समाधान स्वामी म्हणे ||४||
[१५०]
अंतरी संतत करीं सोsहं ध्यान |
न जाई गुंतून संसारांत ||१||
धन सुत दर असूं दे पसारा
नको देऊं थारा आसक्तीतें ||२||
होवो हानि-लाभ पावो सुख-दु:ख |
न सोडीं विवेक साक्षित्वाचा ||३||
स्वामी म्हणे राहे देही उदासीन |
पाहे रांत्र-दिन आत्म-रूप ||४||
करीं गा निष्काम स्वकर्माचरण |
नामसंकीर्तन विठ्ठलाचें ||१||
आत्म-निरीक्षण किंवा धरीं ध्यान |
स्वीकारी साधन आवडे तें ||२||
साधनी निमग्न राहें रांत्र-दिन |
तेणे होय जान चित्त-शुद्धी ||३||
होता चित्त-शुद्धी लाभे आत्म-ज्ञान |
ज्ञानें समाधान स्वामी म्हणे ||४||
[१५०]
अंतरी संतत करीं सोsहं ध्यान |
न जाई गुंतून संसारांत ||१||
धन सुत दर असूं दे पसारा
नको देऊं थारा आसक्तीतें ||२||
होवो हानि-लाभ पावो सुख-दु:ख |
न सोडीं विवेक साक्षित्वाचा ||३||
स्वामी म्हणे राहे देही उदासीन |
पाहे रांत्र-दिन आत्म-रूप ||४||
Wednesday, May 4, 2011
[१४७]
निवडावे जैसे हंसे क्षीर-नीर |
तैसे सारासार विचारावे ||१||
नामरूपात्मक जग हे मायिक |
अविनाश एक आत्म-पद ||२||
आत्म-पदीं द्यावी बुडी निश्चयाची |
आसक्ती देहाची सांडोनिया ||३||
असोनि संसारी घ्यावे आत्म-सुख
तरी चि सार्थक स्वामी म्हणे |४||
[१४८]
सगुण निर्गुण कासया हा भेद |
एकला अभेद वासुदेव ||१||
वासुदेवावीण विश्वीं नाही दुजे |
नांदतो सहजे एकला चि ||२||
अणूअणूंतून राहिला भरून |
सकळ संपूर्ण वासुदेव ||३||
आत्मा बुद्धी मन इंद्रियें विषय |
वासुदेवमय स्वामी म्हणे ||४||
निवडावे जैसे हंसे क्षीर-नीर |
तैसे सारासार विचारावे ||१||
नामरूपात्मक जग हे मायिक |
अविनाश एक आत्म-पद ||२||
आत्म-पदीं द्यावी बुडी निश्चयाची |
आसक्ती देहाची सांडोनिया ||३||
असोनि संसारी घ्यावे आत्म-सुख
तरी चि सार्थक स्वामी म्हणे |४||
[१४८]
सगुण निर्गुण कासया हा भेद |
एकला अभेद वासुदेव ||१||
वासुदेवावीण विश्वीं नाही दुजे |
नांदतो सहजे एकला चि ||२||
अणूअणूंतून राहिला भरून |
सकळ संपूर्ण वासुदेव ||३||
आत्मा बुद्धी मन इंद्रियें विषय |
वासुदेवमय स्वामी म्हणे ||४||
Tuesday, May 3, 2011
[१४५]
देह पराधीन नाशिवंत जाण |
वाया अभिमान वाहसी कां ||१||
गुंतुनी संसारी मानिसी मी-माझे |
बाळगिसी ओझे भ्रांतीचे चि ||२||
होई सावधान विचारीं कल्याण |
जेणे समाधान पावसील ||३||
स्वामी म्हणे मोह झुगारुनी दूर |
सदा राहें स्थिर आत्म-रुपी ||४||
[१४६]
आता मज एक विठ्ठलाचा छंद |
लौकिक-संबंध दूर केला ||१||
विठ्ठलावांचून न बोले वचन |
न देखे नयन दुजें काही ||२||
मज रात्र-दिन विठ्ठलाचें ध्यान |
वाटे जीव प्राण विठ्ठल चि ||३||
स्वामी म्हणे मज विठ्ठल प्रमाण |
वाहतसे आण विठ्ठलाची ||४||
देह पराधीन नाशिवंत जाण |
वाया अभिमान वाहसी कां ||१||
गुंतुनी संसारी मानिसी मी-माझे |
बाळगिसी ओझे भ्रांतीचे चि ||२||
होई सावधान विचारीं कल्याण |
जेणे समाधान पावसील ||३||
स्वामी म्हणे मोह झुगारुनी दूर |
सदा राहें स्थिर आत्म-रुपी ||४||
[१४६]
आता मज एक विठ्ठलाचा छंद |
लौकिक-संबंध दूर केला ||१||
विठ्ठलावांचून न बोले वचन |
न देखे नयन दुजें काही ||२||
मज रात्र-दिन विठ्ठलाचें ध्यान |
वाटे जीव प्राण विठ्ठल चि ||३||
स्वामी म्हणे मज विठ्ठल प्रमाण |
वाहतसे आण विठ्ठलाची ||४||
Monday, May 2, 2011
[१४३]
संतांचा सहवास आवडे जीवास |
दुणावे उल्हास अंतर्यामी ||१||
होता संत भेटी तयांचे संगती |
कराव्या एकांती गुज गोष्टी ||२||
भक्ती-सुधा-रस सेवुनी यथेष्ट |
असावें संतुष्ट आत्म-रंगी ||३||
स्वामी म्हणे मज ही चि एक आस |
संतांचा सहवास नित्य घडो ||४||
[१४४]
नेणे मी वेदात न जाणें सिद्धांत |
जाणे भगवंत सर्व काही ||१||
नेणें वज्रासन नेणें प्राणायाम |
जाणे आत्माराम सर्व काहीं ||२||
न जाणें भजन न जाणे पूजन |
जाणे जनार्दन सर्व काही ||३||
नेणें धर्माधर्म नेणें कर्माकर्म |
जाणे पुरुषोत्तम सर्व काही ||४||
स्वामी म्हणे तुज येतसें शरण
जाण मी अजाण वासुदेवा ||५||
संतांचा सहवास आवडे जीवास |
दुणावे उल्हास अंतर्यामी ||१||
होता संत भेटी तयांचे संगती |
कराव्या एकांती गुज गोष्टी ||२||
भक्ती-सुधा-रस सेवुनी यथेष्ट |
असावें संतुष्ट आत्म-रंगी ||३||
स्वामी म्हणे मज ही चि एक आस |
संतांचा सहवास नित्य घडो ||४||
[१४४]
नेणे मी वेदात न जाणें सिद्धांत |
जाणे भगवंत सर्व काही ||१||
नेणें वज्रासन नेणें प्राणायाम |
जाणे आत्माराम सर्व काहीं ||२||
न जाणें भजन न जाणे पूजन |
जाणे जनार्दन सर्व काही ||३||
नेणें धर्माधर्म नेणें कर्माकर्म |
जाणे पुरुषोत्तम सर्व काही ||४||
स्वामी म्हणे तुज येतसें शरण
जाण मी अजाण वासुदेवा ||५||
Sunday, May 1, 2011
[१४१]
पाहे कोण कोणा तारी |
कोण कोणते संहारी ||१||
हरिविण चराचरीं |
वस्तु आहे का दुसरी ||२||
कोण सुष्ट कोण दुष्ट |
पुण्यवंत वा पापिष्ट ||३||
स्वामी म्हणे हरि-रूप |
विश्व झालें आपेंआप ||४||
[१४२]
भला देवा तुझ्या रूपासी भाळलो |
वृथा होतों मेलो संसारात ||१||
तुझे पाय मज एक चि विषय |
आतां काय भय प्रपंचाचे ||२||
विश्व चराचर तुझा चि अवतार |
ऐसा साक्षात्कार झाला जीव ||३||
स्वामी म्हणे होय तुझी नित्य भेटी |
पडे पायीं मिठी अखंडित ||४||
पाहे कोण कोणा तारी |
कोण कोणते संहारी ||१||
हरिविण चराचरीं |
वस्तु आहे का दुसरी ||२||
कोण सुष्ट कोण दुष्ट |
पुण्यवंत वा पापिष्ट ||३||
स्वामी म्हणे हरि-रूप |
विश्व झालें आपेंआप ||४||
[१४२]
भला देवा तुझ्या रूपासी भाळलो |
वृथा होतों मेलो संसारात ||१||
तुझे पाय मज एक चि विषय |
आतां काय भय प्रपंचाचे ||२||
विश्व चराचर तुझा चि अवतार |
ऐसा साक्षात्कार झाला जीव ||३||
स्वामी म्हणे होय तुझी नित्य भेटी |
पडे पायीं मिठी अखंडित ||४||
Saturday, April 30, 2011
[१३९]
वस्तु सनातन शाश्वत पुराण |
सकळ संपूर्ण सर्वाधार ||१||
नित्य शुद्ध बुद्ध स्वयंसिद्ध |
नांदते स्वच्छंद सर्व ठायी ||२||
स्थिर एकरूप सत्य सर्वात्मक |
व्याप्य ती व्यापक आत्मपणे ||३||
स्वामी म्हणे काय सांगो महिमान |
जाणती ते खुण अंतर्निष्ठ ||४||
[१४०]
नाथिला अभिमान देहीं बाळगून |
कां जासी गुंतून सुख-दु:खीं ||१||
सुख-दु:खातीत राहे तूं अलिप्त |
देहीं साक्षीभूत होवोनियां ||२||
काय दिन-रात्र जाणतो आदित्य |
प्रकाशे तो नित्य जियापरी ||३||
स्वामी म्हणे तैसे वर्तता संसारी |
एक तू निर्धारीं आत्म-सुख ||४||
वस्तु सनातन शाश्वत पुराण |
सकळ संपूर्ण सर्वाधार ||१||
नित्य शुद्ध बुद्ध स्वयंसिद्ध |
नांदते स्वच्छंद सर्व ठायी ||२||
स्थिर एकरूप सत्य सर्वात्मक |
व्याप्य ती व्यापक आत्मपणे ||३||
स्वामी म्हणे काय सांगो महिमान |
जाणती ते खुण अंतर्निष्ठ ||४||
[१४०]
नाथिला अभिमान देहीं बाळगून |
कां जासी गुंतून सुख-दु:खीं ||१||
सुख-दु:खातीत राहे तूं अलिप्त |
देहीं साक्षीभूत होवोनियां ||२||
काय दिन-रात्र जाणतो आदित्य |
प्रकाशे तो नित्य जियापरी ||३||
स्वामी म्हणे तैसे वर्तता संसारी |
एक तू निर्धारीं आत्म-सुख ||४||
Friday, April 29, 2011
[१३७]
एक चि हरि-रूप सर्वत्र संचले |
व्यापुनी राहिले त्रैलोक्यासी ||१||
एक हरिविण दुजें नाही कांही |
जीव-जगत् पाहीं मायाजन्य ||२||
मिथ्या माया जाण मिथ्या नाम रूपें |
एकला स्वरूपें हरि नांदे ||३||
व्याप्त न व्यापक वाच्य ना वाचक |
एक तें नि:शंक स्वामी म्हणे ||४||
[१३८]
सद्वस्तु अव्यक्त अनादि अनंत |
अचळ अचुत्य अद्वितीय ||१||
निष्क्रिय निर्लिप्त अज अविकार |
अक्षय्य अपार निरालंब ||२||
अरूप अरंग अवीट अभंग |
निर्गुण नि:संग निर्विशेष ||३||
स्वामी म्हणे कैसें करावे वर्णन |
स्वीकारावे मौन हें चि भले ||४||
एक चि हरि-रूप सर्वत्र संचले |
व्यापुनी राहिले त्रैलोक्यासी ||१||
एक हरिविण दुजें नाही कांही |
जीव-जगत् पाहीं मायाजन्य ||२||
मिथ्या माया जाण मिथ्या नाम रूपें |
एकला स्वरूपें हरि नांदे ||३||
व्याप्त न व्यापक वाच्य ना वाचक |
एक तें नि:शंक स्वामी म्हणे ||४||
[१३८]
सद्वस्तु अव्यक्त अनादि अनंत |
अचळ अचुत्य अद्वितीय ||१||
निष्क्रिय निर्लिप्त अज अविकार |
अक्षय्य अपार निरालंब ||२||
अरूप अरंग अवीट अभंग |
निर्गुण नि:संग निर्विशेष ||३||
स्वामी म्हणे कैसें करावे वर्णन |
स्वीकारावे मौन हें चि भले ||४||
Monday, April 25, 2011
[१३५]
बोलेन तें होवो तुझें चि स्तवन |
चिंतीन ते ध्यान होवो तुझें ||१||
देखेन तें होवो तुझेची दर्शन |
त्वद्रुण-श्रवण ऐकेन ते ||२||
हिंडेन ती होवो तुझ प्रदक्षिणा |
करीन भोजना नैवद्य तो ||३||
घडे जो व्यापार ती चि तुझी पूजा |
होवो केशवराजा स्वामी म्हणे ||४||
[१३६]
निरोगी निर्मळ असावे शरीर |
जाण तें मंदिर देवाजीचे ||१||
मन बुद्धी शुद्ध असों देई नित्य |
ते पूजा-साहित्य देवाजीचें ||२||
सर्वकाळ चित्त ठेवावे पवित्र |
तें चि पूजा-पात्र देवाजीचे ||३||
सोsहं भावें जीव पूजी नारायणा |
सांडूनी मीपणा स्वामी म्हणे ||४||
बोलेन तें होवो तुझें चि स्तवन |
चिंतीन ते ध्यान होवो तुझें ||१||
देखेन तें होवो तुझेची दर्शन |
त्वद्रुण-श्रवण ऐकेन ते ||२||
हिंडेन ती होवो तुझ प्रदक्षिणा |
करीन भोजना नैवद्य तो ||३||
घडे जो व्यापार ती चि तुझी पूजा |
होवो केशवराजा स्वामी म्हणे ||४||
[१३६]
निरोगी निर्मळ असावे शरीर |
जाण तें मंदिर देवाजीचे ||१||
मन बुद्धी शुद्ध असों देई नित्य |
ते पूजा-साहित्य देवाजीचें ||२||
सर्वकाळ चित्त ठेवावे पवित्र |
तें चि पूजा-पात्र देवाजीचे ||३||
सोsहं भावें जीव पूजी नारायणा |
सांडूनी मीपणा स्वामी म्हणे ||४||
Sunday, April 24, 2011
[१३३]
नमो जय जय सद्गुरुराव
देहीं दाखविला देव ||१||
पाजळुनी ज्ञान-ज्योती |
दूर केली भव-भ्रांति ||२||
होवोनियां गुणातीत |
जगीं वर्ते साक्षीभूत ||३||
स्वामी म्हणे नि:संदेह |
झालो देहीं चि विदेह ||४||
[१३४]
मनासी प्रसन्न ठेवीं रात्रं-दिन |
कदा काळी खिन्न होवों नेदी ||१||
ते चि घाली जान जीवासी बंधन |
मोक्षासी कारण ते चि होय ||२||
युक्ती-प्रयुक्तीनें तया गोंजारून |
दाखवावी खून स्वरूपाची ||३||
स्वामी म्हणे मन सारोनिया मागे
व्हावें गा निजांगें शांति-रूप ||४||
नमो जय जय सद्गुरुराव
देहीं दाखविला देव ||१||
पाजळुनी ज्ञान-ज्योती |
दूर केली भव-भ्रांति ||२||
होवोनियां गुणातीत |
जगीं वर्ते साक्षीभूत ||३||
स्वामी म्हणे नि:संदेह |
झालो देहीं चि विदेह ||४||
[१३४]
मनासी प्रसन्न ठेवीं रात्रं-दिन |
कदा काळी खिन्न होवों नेदी ||१||
ते चि घाली जान जीवासी बंधन |
मोक्षासी कारण ते चि होय ||२||
युक्ती-प्रयुक्तीनें तया गोंजारून |
दाखवावी खून स्वरूपाची ||३||
स्वामी म्हणे मन सारोनिया मागे
व्हावें गा निजांगें शांति-रूप ||४||
Saturday, April 23, 2011
[१३१]
आम्हा रांत्र-दिन हरीचें चिंतन |
हरि-पायी मन स्थिरावलें ||१||
आतां अंतर्बाह्य हरीचें दर्शन |
झाले त्रि-भुवन हरि-रूप ||२||
देखता चरण गेले मी-तूं-पण |
संसाराचे भान हारपलें ||३||
ध्येय-ध्याता -ध्यान होवुनी आपण |
खेळे नारायण स्वामी म्हणे ||४||
[१३२]
भक्त तो प्रेमळ अर्पितो केवळ |
पान फूल फळ भक्ति-भावें ||१||
भक्ताची ती भेट आवडे अनंता |
भुलोनी देखतां मुखी घाली ||२||
षोडशोपचार पूजेचा संभार |
भार तो साचार भावाविण ||३||
येर फुल पान भक्तीची ती खूण |
भाव चि प्रमाण स्वामी म्हणे ||४||
आम्हा रांत्र-दिन हरीचें चिंतन |
हरि-पायी मन स्थिरावलें ||१||
आतां अंतर्बाह्य हरीचें दर्शन |
झाले त्रि-भुवन हरि-रूप ||२||
देखता चरण गेले मी-तूं-पण |
संसाराचे भान हारपलें ||३||
ध्येय-ध्याता -ध्यान होवुनी आपण |
खेळे नारायण स्वामी म्हणे ||४||
[१३२]
भक्त तो प्रेमळ अर्पितो केवळ |
पान फूल फळ भक्ति-भावें ||१||
भक्ताची ती भेट आवडे अनंता |
भुलोनी देखतां मुखी घाली ||२||
षोडशोपचार पूजेचा संभार |
भार तो साचार भावाविण ||३||
येर फुल पान भक्तीची ती खूण |
भाव चि प्रमाण स्वामी म्हणे ||४||
Friday, April 22, 2011
[१२९]
काय सांगू संत-कृपेचा नवलाव |
प्रकटला देव अंतर्यामीं ||१||
सोsहं सोsहं ऐसा नित्य निदिध्यास |
लागला जीवास आपेंआप ||२||
लिहिता वाचितां बोलता बैसतां |
देतां घेतां खातां हिंडता हि ||३||
तिन्ही अवस्थांचा झालो साक्षीभूत |
राहिलो निवांत स्वामी म्हणे ||४||
[१३०]
भाग्य हें उदेलें धन्य झाले डोळे |
देखिले सांवळे हरि-रूप ||१||
सौंगडी सकळ मेळवुनी मेळ |
खेळे नंद-बाळ गोकुळात ||२||
तो चि कुंज-वनीं चारितसे धेनु |
वाजवूनी वेणू वेध लावी ||३||
दहीं दुध लोणी भक्षितो चोरुनी |
तो चि ध्यानीं मनीं स्वामी म्हणे ||४||
काय सांगू संत-कृपेचा नवलाव |
प्रकटला देव अंतर्यामीं ||१||
सोsहं सोsहं ऐसा नित्य निदिध्यास |
लागला जीवास आपेंआप ||२||
लिहिता वाचितां बोलता बैसतां |
देतां घेतां खातां हिंडता हि ||३||
तिन्ही अवस्थांचा झालो साक्षीभूत |
राहिलो निवांत स्वामी म्हणे ||४||
[१३०]
भाग्य हें उदेलें धन्य झाले डोळे |
देखिले सांवळे हरि-रूप ||१||
सौंगडी सकळ मेळवुनी मेळ |
खेळे नंद-बाळ गोकुळात ||२||
तो चि कुंज-वनीं चारितसे धेनु |
वाजवूनी वेणू वेध लावी ||३||
दहीं दुध लोणी भक्षितो चोरुनी |
तो चि ध्यानीं मनीं स्वामी म्हणे ||४||
Thursday, April 21, 2011
[१२७]
जन्मोनिया नाही साधिलें स्व-हित |
त्याचे जीवित मातीमोल ||१||
कासया जन्मला आला तैसा गेला |
वायां कष्टविला निज-देह ||२||
सुखासाठी केला संसाराचा धंदा |
भोगिली आपदा नानापरी ||३||
स्वामी म्हणे त्यासी कैचें समाधान |
अंती नागवण सर्वस्वाची ||४||
[१२८]
भाव अंतरी यथार्थ |
देव देणार समर्थ ||१||
करूं धंदा व्यवहार |
स्मरूं सदा सर्वाधार ||२||
कर्ता करविता तो चि |
ऐसी प्रचीती आमुची ||३||
स्वामी म्हणे साक्षीभूत |
सुखे राहूं संसारात ||४||
जन्मोनिया नाही साधिलें स्व-हित |
त्याचे जीवित मातीमोल ||१||
कासया जन्मला आला तैसा गेला |
वायां कष्टविला निज-देह ||२||
सुखासाठी केला संसाराचा धंदा |
भोगिली आपदा नानापरी ||३||
स्वामी म्हणे त्यासी कैचें समाधान |
अंती नागवण सर्वस्वाची ||४||
[१२८]
भाव अंतरी यथार्थ |
देव देणार समर्थ ||१||
करूं धंदा व्यवहार |
स्मरूं सदा सर्वाधार ||२||
कर्ता करविता तो चि |
ऐसी प्रचीती आमुची ||३||
स्वामी म्हणे साक्षीभूत |
सुखे राहूं संसारात ||४||
Wednesday, April 20, 2011
[१२६]
नाहीं पोटीं भूत-दया |
काय झाले शास्त्रे घोकोनियां ||१||
नाहीं अंगी नम्र-पण |
काय विद्या धन मान ||२||
नाहीं नीति न आचार |
काय केला बडिवार ||३||
नाहीं परोपकार -वृत्ति |
काय करावी संपत्ति ||४||
नाहीं क्षमेचा आधार |
काय सत्ता-अधिकार ||५||
नाहीं दुर्बळ-सांभाळ |
काय करावे तें बळ ||६||
नाहीं आत्म-समाधान |
काय करावें तें ज्ञान ||७||
जरी आठवेना देव |
काय संसार-गौरव ||८||
स्वामी म्हणे भाक्तीविणे |
वृथा मानवाचें जिणें
नाहीं पोटीं भूत-दया |
काय झाले शास्त्रे घोकोनियां ||१||
नाहीं अंगी नम्र-पण |
काय विद्या धन मान ||२||
नाहीं नीति न आचार |
काय केला बडिवार ||३||
नाहीं परोपकार -वृत्ति |
काय करावी संपत्ति ||४||
नाहीं क्षमेचा आधार |
काय सत्ता-अधिकार ||५||
नाहीं दुर्बळ-सांभाळ |
काय करावे तें बळ ||६||
नाहीं आत्म-समाधान |
काय करावें तें ज्ञान ||७||
जरी आठवेना देव |
काय संसार-गौरव ||८||
स्वामी म्हणे भाक्तीविणे |
वृथा मानवाचें जिणें
Tuesday, April 19, 2011
[१२४]
स्वरूप महिमा वर्णवे ना वाचे |
पुरे न शब्दाचें बळ तेथे ||१||
विचाराचा डोळा होतसे आंधळा |
तर्क तो पांगळा ठरे जेथें ||२||
मना इंद्रियांचा काय तेथें पाड |
शास्त्रांसी निवड होये चि ना ||३||
'नेती' वेद बोले ते चि म्यां देखिले |
गुरु-कृपा-बळें स्वामी म्हणे ||४||
[१२५]
शास्त्रे विद्या कला काय तीं शिकोन |
इच्छी ना कल्याण जगताचें ||१||
यत्ने संपादिलें व्यवहार चातुर्य |
कराया सत्कार्य योजी ना तें ||२||
जळो ते चातुर्य जालो त्याची कला |
जी दीनां दुर्बळां संरक्षी ना ||३||
जळो ती संपत्ति जळो त्याचा मान |
जळो त्याचें ज्ञान स्वामी म्हणे ||४||
स्वरूप महिमा वर्णवे ना वाचे |
पुरे न शब्दाचें बळ तेथे ||१||
विचाराचा डोळा होतसे आंधळा |
तर्क तो पांगळा ठरे जेथें ||२||
मना इंद्रियांचा काय तेथें पाड |
शास्त्रांसी निवड होये चि ना ||३||
'नेती' वेद बोले ते चि म्यां देखिले |
गुरु-कृपा-बळें स्वामी म्हणे ||४||
[१२५]
शास्त्रे विद्या कला काय तीं शिकोन |
इच्छी ना कल्याण जगताचें ||१||
यत्ने संपादिलें व्यवहार चातुर्य |
कराया सत्कार्य योजी ना तें ||२||
जळो ते चातुर्य जालो त्याची कला |
जी दीनां दुर्बळां संरक्षी ना ||३||
जळो ती संपत्ति जळो त्याचा मान |
जळो त्याचें ज्ञान स्वामी म्हणे ||४||
Monday, April 18, 2011
[१२२]
कृपावंत थोर सद्गुरू उदार |
तेणें योग-सार दिलें मज ||१||
मन-पवनाची दाखवोनी वाट |
गगनाशीं गाठ बांधियेली ||२||
शून्य-नि:शून्याचे बीज महाशून्य |
भेटविलें धन्य हरि-रूप ||३||
स्वामी म्हणे माझा नाथ-संप्रदाय |
अवघे हरीमय योग-बळे ||४||
[१२३]
चढो पालखींत पडो वा आगींत |
देह नाशिवंत मातीमोल ||१||
काया कदा काळीं जाणार जाईल |
सांभाळावे शील जीवें भावे ||२||
देहाची आसक्ती असों नये चित्ती |
वसों द्यावी प्रीती हरिपायी ||३||
स्वामी म्हणे ऐसी करावी प्रार्थना |
देवा नारायणा धांव पाव ||४||
कृपावंत थोर सद्गुरू उदार |
तेणें योग-सार दिलें मज ||१||
मन-पवनाची दाखवोनी वाट |
गगनाशीं गाठ बांधियेली ||२||
शून्य-नि:शून्याचे बीज महाशून्य |
भेटविलें धन्य हरि-रूप ||३||
स्वामी म्हणे माझा नाथ-संप्रदाय |
अवघे हरीमय योग-बळे ||४||
[१२३]
चढो पालखींत पडो वा आगींत |
देह नाशिवंत मातीमोल ||१||
काया कदा काळीं जाणार जाईल |
सांभाळावे शील जीवें भावे ||२||
देहाची आसक्ती असों नये चित्ती |
वसों द्यावी प्रीती हरिपायी ||३||
स्वामी म्हणे ऐसी करावी प्रार्थना |
देवा नारायणा धांव पाव ||४||
Sunday, April 17, 2011
[१२०]
ध्येयासाठी जगूं सोसूं सुख-दु:खें |
ध्येयासाठीं सुखे वेचूं प्राण ||१||
सत्यासाठीं मारूं स्वार्थावारी लाथ |
लौकिकाची मात दूर ठेवूं ||२||
हरीसाठीं करूं सर्वस्वाचे दान |
झुगारुं बंधन अहंतेचे ||३||
स्वामी म्हणे मन ध्येयीं समर्पून |
होऊं चि आपण ध्येरूप ||४||
[१२१]
धर्म अर्थ काम |
आम्हा एक आत्माराम ||१||
आत्मारामीं मन |
रंगलेंसे रात्रं-दिन ||२||
भक्ती सुखापुढे |
मोक्ष-सुख ते नावडे ||३||
भक्ती लाभता अद्वय |
स्वामी झाला सुखमय ||४||
ध्येयासाठी जगूं सोसूं सुख-दु:खें |
ध्येयासाठीं सुखे वेचूं प्राण ||१||
सत्यासाठीं मारूं स्वार्थावारी लाथ |
लौकिकाची मात दूर ठेवूं ||२||
हरीसाठीं करूं सर्वस्वाचे दान |
झुगारुं बंधन अहंतेचे ||३||
स्वामी म्हणे मन ध्येयीं समर्पून |
होऊं चि आपण ध्येरूप ||४||
[१२१]
धर्म अर्थ काम |
आम्हा एक आत्माराम ||१||
आत्मारामीं मन |
रंगलेंसे रात्रं-दिन ||२||
भक्ती सुखापुढे |
मोक्ष-सुख ते नावडे ||३||
भक्ती लाभता अद्वय |
स्वामी झाला सुखमय ||४||
Saturday, April 16, 2011
[११८]
आता काय मज काळाचे भय |
श्रीगुरुचे पाय देखियले ||१||
राहे कैसा देहाचा संबंध |
होता आत्म-बोध अंतर्यामी ||२||
देहाचे व्यापार चालता अलिप्त |
राहे साक्षीभूत सर्वकाळ ||३||
राहो किंवा जावो देह नाशिवंत |
मी तो देहातीत स्वामी म्हणे ||४||
[११९]
सर्व सुखे आली धावत सामोरी |
अंतरी श्रीहरी प्रकटता ||१||
राजे महा-राजे रंक ते बापुडे |
होती आम्हांपुढे सत्ताहीन ||२||
शास्त्र्वेत्ते भले पंडित आगळे |
मीपणे बुडाले सुख-दु:खातीत ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही सुख-दु:खातीत |
अंतरी उदित नित्य-सुख ||४||
आता काय मज काळाचे भय |
श्रीगुरुचे पाय देखियले ||१||
राहे कैसा देहाचा संबंध |
होता आत्म-बोध अंतर्यामी ||२||
देहाचे व्यापार चालता अलिप्त |
राहे साक्षीभूत सर्वकाळ ||३||
राहो किंवा जावो देह नाशिवंत |
मी तो देहातीत स्वामी म्हणे ||४||
[११९]
सर्व सुखे आली धावत सामोरी |
अंतरी श्रीहरी प्रकटता ||१||
राजे महा-राजे रंक ते बापुडे |
होती आम्हांपुढे सत्ताहीन ||२||
शास्त्र्वेत्ते भले पंडित आगळे |
मीपणे बुडाले सुख-दु:खातीत ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही सुख-दु:खातीत |
अंतरी उदित नित्य-सुख ||४||
Saturday, April 9, 2011
[११६]
नको निराहार नको सेवूं फार
सदा मिताहार असों द्द्यावा १
नको अति झोंप नको जागरण
असावें प्रमाण निद्रेमाजीं २
नको बोलूं फार नको धरुं मौन
करावें भाषण परिमित ३
संयमी जीवन बाणतां सहज
स्वामी म्हणे तुज योग-सिद्धि ४
[११७]
घेई ना जे भावें हरीचें दर्शन
काय तें नयन असोनियां १
हरि-नामोच्चार गर्जे ना जी वाणी
असोनी नसोनी सारखी ची २
होय ना श्रवण हरि-गुण-गान
काय तरी कान असोनियां ३
हरिपायी मन होय ना तल्लीन
जळो ते जीवन स्वामी म्हणे ४
नको निराहार नको सेवूं फार
सदा मिताहार असों द्द्यावा १
नको अति झोंप नको जागरण
असावें प्रमाण निद्रेमाजीं २
नको बोलूं फार नको धरुं मौन
करावें भाषण परिमित ३
संयमी जीवन बाणतां सहज
स्वामी म्हणे तुज योग-सिद्धि ४
[११७]
घेई ना जे भावें हरीचें दर्शन
काय तें नयन असोनियां १
हरि-नामोच्चार गर्जे ना जी वाणी
असोनी नसोनी सारखी ची २
होय ना श्रवण हरि-गुण-गान
काय तरी कान असोनियां ३
हरिपायी मन होय ना तल्लीन
जळो ते जीवन स्वामी म्हणे ४
Friday, April 8, 2011
[११४]
जनलोक मज हांसो उपहासें |
लागलेंसे पिसें गोपालाचें ||१||
लौकिकाची लाज वाटे ना मनातें |
जोडिलें मी नातें गोपालाशीं ||२||
जनीं वनीं मनीं आप्त इष्ट कोणी |
गोपालावांचोनी नाहीं मज ||३||
आता सर्वकाळ गोपाळाची भेटी |
बोलूं गुजगोष्टी स्वामी म्हणे ||४||
[११५]
कां गा मना होसी दु:खी कशी खिन्न |
तुज काय न्यून सांगे मज ||१||
दु:खाचें कारण पाहें विचारून |
बुद्धीसी शरण जावोनियां ||२||
विषयांचा संग देई सुखदु:ख |
अनित्य ते देख होती जाती ||३||
स्वामी म्हणे व्हावें नित्य समाधान |
तरी करीं ध्यान स्व-रूपाचे ||४||
जनलोक मज हांसो उपहासें |
लागलेंसे पिसें गोपालाचें ||१||
लौकिकाची लाज वाटे ना मनातें |
जोडिलें मी नातें गोपालाशीं ||२||
जनीं वनीं मनीं आप्त इष्ट कोणी |
गोपालावांचोनी नाहीं मज ||३||
आता सर्वकाळ गोपाळाची भेटी |
बोलूं गुजगोष्टी स्वामी म्हणे ||४||
[११५]
कां गा मना होसी दु:खी कशी खिन्न |
तुज काय न्यून सांगे मज ||१||
दु:खाचें कारण पाहें विचारून |
बुद्धीसी शरण जावोनियां ||२||
विषयांचा संग देई सुखदु:ख |
अनित्य ते देख होती जाती ||३||
स्वामी म्हणे व्हावें नित्य समाधान |
तरी करीं ध्यान स्व-रूपाचे ||४||
Thursday, April 7, 2011
[११२]
भावें राम कृष्ण बोलूं |
प्रेमे कीर्तनांत डोलूं ||१||
मन करोनी तल्लीन |
ध्याऊं हरीचे चरण ||२||
करूं नामाचा गजर |
सुखे होऊं भव-पार ||३||
स्वामी म्हणे रात्रं-दिन |
घेऊं देवाचें दर्शन ||४||
[११३]
खेळविसी तैसा खेळेन साचार |
तूं चि सूत्र-धार बाहुलें मी ||१||
देवा तूं चि धनी मी तुझा चाकर |
तुझा चि आधार मजलागी ||२||
बोलविसी तैसें बोलेन वचन |
मज अभिमान कासयाचा ||३||
काय वाचा मन तुझ्या चि आधीन |
तुझ्या पायीं लीन स्वामी म्हणे ||४||
भावें राम कृष्ण बोलूं |
प्रेमे कीर्तनांत डोलूं ||१||
मन करोनी तल्लीन |
ध्याऊं हरीचे चरण ||२||
करूं नामाचा गजर |
सुखे होऊं भव-पार ||३||
स्वामी म्हणे रात्रं-दिन |
घेऊं देवाचें दर्शन ||४||
[११३]
खेळविसी तैसा खेळेन साचार |
तूं चि सूत्र-धार बाहुलें मी ||१||
देवा तूं चि धनी मी तुझा चाकर |
तुझा चि आधार मजलागी ||२||
बोलविसी तैसें बोलेन वचन |
मज अभिमान कासयाचा ||३||
काय वाचा मन तुझ्या चि आधीन |
तुझ्या पायीं लीन स्वामी म्हणे ||४||
Wednesday, April 6, 2011
[११०]
अंतरीं सन्निध राहे श्रीगोविंद |
परि मति-मंद पाहे चि ना ||१||
नाभींत कस्तुरी असतां जवळी |
हिंडे रानोमाळी मृग जैसा ||२||
विषयांचा छंद घेउनियां वायां |
आनंद सेवया धांवतसे ||३||
स्वामी म्हणे मोहें झालासे आंधळा |
स्वानंद-सोहळा भोगी चि ना ||४||
[१११]
झाला तरी होवो लौकिक सन्मान |
पोटीं अभिमान धरूं नये ||१||
आहे तरी असो दारा पुत्र धन |
संसारीं गुंतून जाऊं नये ||२||
भुकेल्यासी अन्न सत्पात्रीं तें दान |
भावें दिल्याविण राहूं नये ||३||
स्वामी म्हणे जावो गेला तरी प्राण |
ईश्वराचें ध्यान सोडूं नये ||४||
अंतरीं सन्निध राहे श्रीगोविंद |
परि मति-मंद पाहे चि ना ||१||
नाभींत कस्तुरी असतां जवळी |
हिंडे रानोमाळी मृग जैसा ||२||
विषयांचा छंद घेउनियां वायां |
आनंद सेवया धांवतसे ||३||
स्वामी म्हणे मोहें झालासे आंधळा |
स्वानंद-सोहळा भोगी चि ना ||४||
[१११]
झाला तरी होवो लौकिक सन्मान |
पोटीं अभिमान धरूं नये ||१||
आहे तरी असो दारा पुत्र धन |
संसारीं गुंतून जाऊं नये ||२||
भुकेल्यासी अन्न सत्पात्रीं तें दान |
भावें दिल्याविण राहूं नये ||३||
स्वामी म्हणे जावो गेला तरी प्राण |
ईश्वराचें ध्यान सोडूं नये ||४||
Tuesday, April 5, 2011
[१०८]
संत ते उदार कृपेचे सागर |
त्यांचे उपकार काय वानूं ||१||
इच्छिती कल्याण देती आत्म-धन |
मज रांत्र-दिन सांभाळिती ||२||
स्व-रुपीं जागृत ठेविती संतत |
ठायीं ची भगवंत भेटविती ||३||
स्वामी म्हणे ऋण न फिटे म्हणोन |
भावे लोटांगण घालितसें ||४||
[१०९]
नांदतो एकला विश्वीं माझा मीच |
मज उंच नीच नाही कोणी ||१||
विश्वी नाही दुजे ह्यास्तव सहजें |
मत्सर नुपजे चित्तामाजीं ||२||
सांडोनियां मज गेले काम क्रोध |
होतां निज बोध अंतर्यामीं ||३||
स्वामी म्हणे मन जाहलें तल्लीन |
आतां नारायण अंतर्बाह्य ||४||
संत ते उदार कृपेचे सागर |
त्यांचे उपकार काय वानूं ||१||
इच्छिती कल्याण देती आत्म-धन |
मज रांत्र-दिन सांभाळिती ||२||
स्व-रुपीं जागृत ठेविती संतत |
ठायीं ची भगवंत भेटविती ||३||
स्वामी म्हणे ऋण न फिटे म्हणोन |
भावे लोटांगण घालितसें ||४||
[१०९]
नांदतो एकला विश्वीं माझा मीच |
मज उंच नीच नाही कोणी ||१||
विश्वी नाही दुजे ह्यास्तव सहजें |
मत्सर नुपजे चित्तामाजीं ||२||
सांडोनियां मज गेले काम क्रोध |
होतां निज बोध अंतर्यामीं ||३||
स्वामी म्हणे मन जाहलें तल्लीन |
आतां नारायण अंतर्बाह्य ||४||
Monday, April 4, 2011
[१०६]
संतांची संगती घडो सर्वकाळ |
आवडो गोपाळ अंतर्यामीं ||१||
काम क्रोध लोभ निमोत आघवे |
रमो चित्त भावें हरिपायी ||२||
जालो तो मत्सर गळो मोह मद |
लागो मना छंद गोविंदाचा ||३||
विषयांची गोडी न वाटो जीवास |
लागो हरी-ध्यास स्वामी म्हणे ||४||
[१०७]
देही उदासीन असो माझें मन |
राहो सावधान अंतर्यामी ||१||
संसारी निर्लिप्त असो माझें चित्त |
राहो साक्षीभूत होवोनियां ||२||
न हो माझी बुद्धी संमोह भ्रमिष्ट |
राहो एकनिष्ठ आत्म-रुपीं ||३||
स्वामी म्हणे माझा जावो अहंकार |
होवो साक्षात्कार स्वरूपाचा ||४|
संतांची संगती घडो सर्वकाळ |
आवडो गोपाळ अंतर्यामीं ||१||
काम क्रोध लोभ निमोत आघवे |
रमो चित्त भावें हरिपायी ||२||
जालो तो मत्सर गळो मोह मद |
लागो मना छंद गोविंदाचा ||३||
विषयांची गोडी न वाटो जीवास |
लागो हरी-ध्यास स्वामी म्हणे ||४||
[१०७]
देही उदासीन असो माझें मन |
राहो सावधान अंतर्यामी ||१||
संसारी निर्लिप्त असो माझें चित्त |
राहो साक्षीभूत होवोनियां ||२||
न हो माझी बुद्धी संमोह भ्रमिष्ट |
राहो एकनिष्ठ आत्म-रुपीं ||३||
स्वामी म्हणे माझा जावो अहंकार |
होवो साक्षात्कार स्वरूपाचा ||४|
Sunday, April 3, 2011
[१०४]
जन्मोनिया काय साधिलें स्व-हित |
केली यातायात प्रपंचाची ||१||
केलें घर-दार मांडीला संसार |
लोकी लोकाचार चालविला ||२||
सुखासाठी वृथा केली धडपड |
यातना उदंड भोगियेल्या ||३||
स्वामी म्हणे तरी सरे चि ना हांव |
आठवेना देव पामरते ||४||
[१०५]
जाय जाय वेगें हरीसी शरण |
भक्तिभावे लीन होवोनियां ||१||
तो चि दया-घन होवोनि प्रसन्न |
कृपामृतें पूर्ण शांतवील ||२||
विषयांचें भय पावोनी विलय |
तेणे ताप-त्रय हारपेल ||३||
स्वामी म्हणे चित्त स्वानंद -निर्भर |
होईल संसार सुख-मय ||४||
जन्मोनिया काय साधिलें स्व-हित |
केली यातायात प्रपंचाची ||१||
केलें घर-दार मांडीला संसार |
लोकी लोकाचार चालविला ||२||
सुखासाठी वृथा केली धडपड |
यातना उदंड भोगियेल्या ||३||
स्वामी म्हणे तरी सरे चि ना हांव |
आठवेना देव पामरते ||४||
[१०५]
जाय जाय वेगें हरीसी शरण |
भक्तिभावे लीन होवोनियां ||१||
तो चि दया-घन होवोनि प्रसन्न |
कृपामृतें पूर्ण शांतवील ||२||
विषयांचें भय पावोनी विलय |
तेणे ताप-त्रय हारपेल ||३||
स्वामी म्हणे चित्त स्वानंद -निर्भर |
होईल संसार सुख-मय ||४||
Saturday, April 2, 2011
[१०२]
नारायणीं लय लागतां अक्षय |
विषयांचे भय काय करी ||१||
साधे मनोजय बुद्धीचा निश्चय |
विषय तो होय मोक्षलागीं ||२||
वाउगे ते काय करावे उपाय |
घ्यावे हरिपाय भक्ति-भावें ||३||
स्वामी म्हणे हरि येतसे धांवोन |
बाधो नेदी विघ्न सेवकाते ||४||
[१०३]
भाविकाची चिंता वाहे भगवंत |
पाहे हिताहित तो चि त्यांचें ||१||
आड येता विघ्न घेतसे धावणे |
रक्षायाकारणें भाविकातें ||२||
जे जे वांछि मन ते तया देऊन |
न्यून करी पूर्ण भाविकांचें ||३||
स्वामी म्हणे कैसा स्पर्शौ शके काळ |
सांभाळी गोपाळ भाविकातें ||४||
नारायणीं लय लागतां अक्षय |
विषयांचे भय काय करी ||१||
साधे मनोजय बुद्धीचा निश्चय |
विषय तो होय मोक्षलागीं ||२||
वाउगे ते काय करावे उपाय |
घ्यावे हरिपाय भक्ति-भावें ||३||
स्वामी म्हणे हरि येतसे धांवोन |
बाधो नेदी विघ्न सेवकाते ||४||
[१०३]
भाविकाची चिंता वाहे भगवंत |
पाहे हिताहित तो चि त्यांचें ||१||
आड येता विघ्न घेतसे धावणे |
रक्षायाकारणें भाविकातें ||२||
जे जे वांछि मन ते तया देऊन |
न्यून करी पूर्ण भाविकांचें ||३||
स्वामी म्हणे कैसा स्पर्शौ शके काळ |
सांभाळी गोपाळ भाविकातें ||४||
Friday, April 1, 2011
सद्गुरू गणनाथ दयाळ समर्थ |
भेटतां कृतार्थ झाला जीव ||१||
अविद्या-निद्रेंत होता भव-भ्रांत |
सुख:दुख भोगीत स्वप्नामाजीं ||२||
आत्म-ज्ञानें आली अखंड जागृती |
गेली भव भ्रांती हारपोनी ||३||
धन्य ते पावन सद्गुरू दर्शन |
वंदिले चरण स्वामी म्हणे ||४||
असो याति-हीन असो मति-हीन |
सर्वांसी तारण हरि-नाम ||१||
असो हरिजन कीं असो ब्राह्मण |
जाय उध्दरून हरि-नामें ||२||
असो नारी-नर असो सान-थोर |
होतसे उद्धार हरि-नामें ||३||
स्वामी म्हणे कुळ वर्ण अकारण |
हरिसी प्रमाण भाव एक ||४||
भेटतां कृतार्थ झाला जीव ||१||
अविद्या-निद्रेंत होता भव-भ्रांत |
सुख:दुख भोगीत स्वप्नामाजीं ||२||
आत्म-ज्ञानें आली अखंड जागृती |
गेली भव भ्रांती हारपोनी ||३||
धन्य ते पावन सद्गुरू दर्शन |
वंदिले चरण स्वामी म्हणे ||४||
असो याति-हीन असो मति-हीन |
सर्वांसी तारण हरि-नाम ||१||
असो हरिजन कीं असो ब्राह्मण |
जाय उध्दरून हरि-नामें ||२||
असो नारी-नर असो सान-थोर |
होतसे उद्धार हरि-नामें ||३||
स्वामी म्हणे कुळ वर्ण अकारण |
हरिसी प्रमाण भाव एक ||४||
Thursday, March 31, 2011
[९८]
अखंड एकांत आवडे जीवास |
लौकिकाचा त्रास वाटतसे ||१||
लावोनियां मन देवाचें चिंतन |
वाटे रात्रं-दिन करावेंसें ||२||
देहाचा अभिमान गळवा संपूर्ण |
भावें व्हावें लीन हरि-पायीं ||३||
स्वामी म्हणे घ्यावें हरिचें दर्शन |
नावडे त्याविण दुजें काहीं ||
[९९]
देतसे व्याख्यान सांगे ब्रह्मज्ञान |
पोटी अभिमान पांडित्याचा ||१||
स्वानुभवविण डोलावुनी मान |
वंचितो आपण आपणातें ||२||
वाउगा तो शीण वृथा शब्द-ज्ञान |
नाही समाधान अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं बाणली विरक्ती |
तरी आत्म-प्राप्ति कैसी होय ||४||
अखंड एकांत आवडे जीवास |
लौकिकाचा त्रास वाटतसे ||१||
लावोनियां मन देवाचें चिंतन |
वाटे रात्रं-दिन करावेंसें ||२||
देहाचा अभिमान गळवा संपूर्ण |
भावें व्हावें लीन हरि-पायीं ||३||
स्वामी म्हणे घ्यावें हरिचें दर्शन |
नावडे त्याविण दुजें काहीं ||
[९९]
देतसे व्याख्यान सांगे ब्रह्मज्ञान |
पोटी अभिमान पांडित्याचा ||१||
स्वानुभवविण डोलावुनी मान |
वंचितो आपण आपणातें ||२||
वाउगा तो शीण वृथा शब्द-ज्ञान |
नाही समाधान अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं बाणली विरक्ती |
तरी आत्म-प्राप्ति कैसी होय ||४||
Wednesday, March 30, 2011
[९६]
देवा तूं सागर मी तुझी लहरी |
दोघांसी अंतरी भेद नाही ||१||
देवा तूं सुवर्ण मी तुझें भूषण |
दोघां एकपण ठाईचें चि ||२||
देवा तू चंद्रमा मी तुझी चंद्रिका |
आम्हां एकमेकां अभिन्नत्व ||३||
देवा तूं प्रदीप मी तुझा प्रकाश |
नांदूं सावकाश स्वामी म्हणे ||४||
[९७]
सांडुनी फलाशा स्व-कर्म आदरीं |
गीतेमाजीं हरि उपदेशी ||१||
साधितां स्व-कर्म होते चित्त-शुद्धी |
तेणे मोक्ष-सिद्धी लाभतसे ||२||
जोवरी अंतरी नाहीं आत्म-ज्ञान |
तोंवरी साधन कर्म हें चि ||३||
स्वामी म्हणे जाण होता आत्मज्ञान |
कर्माचे बंधन राहे चि ना ||४||
देवा तूं सागर मी तुझी लहरी |
दोघांसी अंतरी भेद नाही ||१||
देवा तूं सुवर्ण मी तुझें भूषण |
दोघां एकपण ठाईचें चि ||२||
देवा तू चंद्रमा मी तुझी चंद्रिका |
आम्हां एकमेकां अभिन्नत्व ||३||
देवा तूं प्रदीप मी तुझा प्रकाश |
नांदूं सावकाश स्वामी म्हणे ||४||
[९७]
सांडुनी फलाशा स्व-कर्म आदरीं |
गीतेमाजीं हरि उपदेशी ||१||
साधितां स्व-कर्म होते चित्त-शुद्धी |
तेणे मोक्ष-सिद्धी लाभतसे ||२||
जोवरी अंतरी नाहीं आत्म-ज्ञान |
तोंवरी साधन कर्म हें चि ||३||
स्वामी म्हणे जाण होता आत्मज्ञान |
कर्माचे बंधन राहे चि ना ||४||
Tuesday, March 29, 2011
[९४]
कां गा माझा तुज न ये कळवळा |
उदार दयाळा पांडुरंगा ||१||
दर्शनाची आस लागली जीवास |
झालों कासावीस तुजविण ||२||
दाटला हा गळा लागे न तो डोळा |
वाहे घळघळां अश्रुधारा ||३||
उतावीळ मन सुटूं पाहे भान |
दाखवीं चरण स्वामी म्हणे ||४||
[९५]
रूप चतुर्भुज सुंदर सावळे |
आजि म्यां देखिलें श्रीहरीचें ||१||
चरण सुकुमार कांसे पितांबर |
वैजयंती-हार कंठीं साजे ||२||
सुहास्य-वदन राजीव-लोचन |
मस्तकीं भूषण मुकुटाचें ||३||
शंख चक्र गदा पद्म करीं शोभे |
सन्मुख हें उभें स्वामी म्हणे ||४||
अभंग क्रं ९२,९३,९४ - स्वामीजींना सगुण दर्शनाचा १ ते १.५ वर्षे जो ध्यास लागला होता त्या काळात हे अभंग रचले गेले , त्या नंतर त्यांच्या जीवन चरित्रात जो सगुण साक्षात्काराचा प्रसंग आहे त्या नंतर अभंग क्रं ९५ रचला गेला .
कां गा माझा तुज न ये कळवळा |
उदार दयाळा पांडुरंगा ||१||
दर्शनाची आस लागली जीवास |
झालों कासावीस तुजविण ||२||
दाटला हा गळा लागे न तो डोळा |
वाहे घळघळां अश्रुधारा ||३||
उतावीळ मन सुटूं पाहे भान |
दाखवीं चरण स्वामी म्हणे ||४||
[९५]
रूप चतुर्भुज सुंदर सावळे |
आजि म्यां देखिलें श्रीहरीचें ||१||
चरण सुकुमार कांसे पितांबर |
वैजयंती-हार कंठीं साजे ||२||
सुहास्य-वदन राजीव-लोचन |
मस्तकीं भूषण मुकुटाचें ||३||
शंख चक्र गदा पद्म करीं शोभे |
सन्मुख हें उभें स्वामी म्हणे ||४||
अभंग क्रं ९२,९३,९४ - स्वामीजींना सगुण दर्शनाचा १ ते १.५ वर्षे जो ध्यास लागला होता त्या काळात हे अभंग रचले गेले , त्या नंतर त्यांच्या जीवन चरित्रात जो सगुण साक्षात्काराचा प्रसंग आहे त्या नंतर अभंग क्रं ९५ रचला गेला .
Monday, March 28, 2011
[९२]
रूप चतुर्भुज तुवां चक्र-पाणि |
ध्रुव मधु-वनीं दाविले जे ||१||
तें चि देखावया भुकेले हे डोळे |
काय सांगो झाले उतावीळ ||२||
लडिवाळपणें घेतलीसे आळी |
बाळ मी माउली तूं चि माझी ||३||
तुजपासी आता काय धरूं भीड |
पुरवीं माझे लाड स्वामी म्हणे ||४||
[९३]
रूप तुझे देवा दाखवीं केशवा |
मुकुंद माधवा नारायणा ||१||
अच्युता अनंता कृष्ण दामोदरा |
गोविंदा श्रीधरा ह्रषीकेशा ||२||
हरि-जनार्दना रुक्मिणी-रमणा |
देवकी-नंदना वासुदेवा ||३||
स्वामी म्हणे मज हा चि निदिध्यास |
पूर्ण करीं आस दर्शनाची ||४||
रूप चतुर्भुज तुवां चक्र-पाणि |
ध्रुव मधु-वनीं दाविले जे ||१||
तें चि देखावया भुकेले हे डोळे |
काय सांगो झाले उतावीळ ||२||
लडिवाळपणें घेतलीसे आळी |
बाळ मी माउली तूं चि माझी ||३||
तुजपासी आता काय धरूं भीड |
पुरवीं माझे लाड स्वामी म्हणे ||४||
[९३]
रूप तुझे देवा दाखवीं केशवा |
मुकुंद माधवा नारायणा ||१||
अच्युता अनंता कृष्ण दामोदरा |
गोविंदा श्रीधरा ह्रषीकेशा ||२||
हरि-जनार्दना रुक्मिणी-रमणा |
देवकी-नंदना वासुदेवा ||३||
स्वामी म्हणे मज हा चि निदिध्यास |
पूर्ण करीं आस दर्शनाची ||४||
Sunday, March 27, 2011
[९०]
करावा विचार आपुला आपण |
कोण मी कोठून जन्मा आलों ||१||
जन्मोनिया काय करावें उचित |
बरवे हिताहित विचारावे ||२||
देहातीं मागुतें कोठें जाणें असे |
काय विश्व कैसें होय जाय ||३||
स्वामी म्हणे यत्नें ऐसा घेतां शोध |
होतसे प्रबोध अंतर्यामी ||४||
[९१]
स्वच्छंद निर्मल वाहतो निर्झर |
आम्हां साक्षात्कार गोविंदाचा ||१||
करी गुंजारव पंकजीं भ्रमर |
आम्हांसी गजर हरि-नामाचा ||२||
उद्यानी कोकिळ गातसे संगीत |
आम्हां हरि-गीत आवडे तें ||३||
अखंड गंभीर गर्जतो सागर |
आम्हां सोsहं-स्वर स्वामी म्हणे ||४||
करावा विचार आपुला आपण |
कोण मी कोठून जन्मा आलों ||१||
जन्मोनिया काय करावें उचित |
बरवे हिताहित विचारावे ||२||
देहातीं मागुतें कोठें जाणें असे |
काय विश्व कैसें होय जाय ||३||
स्वामी म्हणे यत्नें ऐसा घेतां शोध |
होतसे प्रबोध अंतर्यामी ||४||
[९१]
स्वच्छंद निर्मल वाहतो निर्झर |
आम्हां साक्षात्कार गोविंदाचा ||१||
करी गुंजारव पंकजीं भ्रमर |
आम्हांसी गजर हरि-नामाचा ||२||
उद्यानी कोकिळ गातसे संगीत |
आम्हां हरि-गीत आवडे तें ||३||
अखंड गंभीर गर्जतो सागर |
आम्हां सोsहं-स्वर स्वामी म्हणे ||४||
Saturday, March 26, 2011
[८८]
माझें मजपाशी सापडलें धन |
आनंदले मन आत्म-रंगी ||१||
सोडवेना मज नित्य नवी गोष्ट ||२||
सेवितों आवडी ब्रह्म-रस |
सन्निध तें परी होतें दुरावले |
गुरु-कृपा-बळे आंगवलें ||३||
प्राणाचा प्रणव मनाचें उन्मन |
होता समाधान स्वामी म्हणे ||४||
[८९]
मन हें चंचळ धावे वाऱ्यावरी |
तयासी आवरी अभ्यासानें ||१||
विषयांचे सुख नाशिवंत देख |
अविनाशी एक आत्म-रूप ||२||
ऐसा सारासार करावा विचार |
सार तें साचार दाखवावें ||३||
स्वामी म्हणे मना आत्म-सुखी गोडी |
लावितां आवडी स्थिरावेल ||४||
माझें मजपाशी सापडलें धन |
आनंदले मन आत्म-रंगी ||१||
सोडवेना मज नित्य नवी गोष्ट ||२||
सेवितों आवडी ब्रह्म-रस |
सन्निध तें परी होतें दुरावले |
गुरु-कृपा-बळे आंगवलें ||३||
प्राणाचा प्रणव मनाचें उन्मन |
होता समाधान स्वामी म्हणे ||४||
[८९]
मन हें चंचळ धावे वाऱ्यावरी |
तयासी आवरी अभ्यासानें ||१||
विषयांचे सुख नाशिवंत देख |
अविनाशी एक आत्म-रूप ||२||
ऐसा सारासार करावा विचार |
सार तें साचार दाखवावें ||३||
स्वामी म्हणे मना आत्म-सुखी गोडी |
लावितां आवडी स्थिरावेल ||४||
Friday, March 25, 2011
[८६]
आणिकांचे सुख देखोनि जो सुखी |
होय धन्य लोकी तो चि संत ||१||
आणिकांचे दु:ख देखोनियां डोळां |
येई कळवळा तो चि संत ||२||
आणिकांचे दोष आणी न जो मनीं |
गुणातें वाखाणी तो चि संत ||३||
लोककल्याणार्थ वेंची जो जीवित |
संत तो महंत स्वामी म्हणे ||४||
[८७]
दु:खाचा डोंगर आदळो कां शिरीं |
जयासी अंतरी खेद नाही ||१||
प्राप्त झाली सिद्धी पावला समृद्धी |
तरी आत्म-बुद्धी भंग नाही ||२||
नेणे निंदा-स्तुती नेणे भव-भ्रांती |
राहे-आत्म स्थिती अखंडित ||३||
नित्य आत्म-तृप्त निर्भय निश्चिंत |
तो चि प्रज्ञावंत स्वामी म्हणे ||४||
आणिकांचे सुख देखोनि जो सुखी |
होय धन्य लोकी तो चि संत ||१||
आणिकांचे दु:ख देखोनियां डोळां |
येई कळवळा तो चि संत ||२||
आणिकांचे दोष आणी न जो मनीं |
गुणातें वाखाणी तो चि संत ||३||
लोककल्याणार्थ वेंची जो जीवित |
संत तो महंत स्वामी म्हणे ||४||
[८७]
दु:खाचा डोंगर आदळो कां शिरीं |
जयासी अंतरी खेद नाही ||१||
प्राप्त झाली सिद्धी पावला समृद्धी |
तरी आत्म-बुद्धी भंग नाही ||२||
नेणे निंदा-स्तुती नेणे भव-भ्रांती |
राहे-आत्म स्थिती अखंडित ||३||
नित्य आत्म-तृप्त निर्भय निश्चिंत |
तो चि प्रज्ञावंत स्वामी म्हणे ||४||
Thursday, March 24, 2011
[८४]
बळावतां रजोवृत्ती |
होय कर्माची प्रवृत्ती ||१||
उठावती काम क्रोध |
जीव होतेसे मदांध ||२||
पोटीं लोभ अनिवार |
न देखे तो सारासार ||३||
मांडी कर्माचा पसारा |
नसे सुख-संतोषा थारा ||४||
स्वामी म्हणे रजोगुण |
दु:ख देतसे दारूण ||५||
[८५]
अंगी वाढे तमोगुण |
तदा फांकते अज्ञान ||१||
जीव होय मोह-ग्रस्त |
लक्ष नाहीं राहे सुस्त ||२||
मंद आळशी खादाड |
सदा निद्रेची झांपड ||३||
कर्म करी तैं प्रमाद |
किती होती नाहीं शुद्ध ||४||
स्फूर्तिहीन अंत:करण |
स्वामी म्हणे तो पाषाण ||५||
बळावतां रजोवृत्ती |
होय कर्माची प्रवृत्ती ||१||
उठावती काम क्रोध |
जीव होतेसे मदांध ||२||
पोटीं लोभ अनिवार |
न देखे तो सारासार ||३||
मांडी कर्माचा पसारा |
नसे सुख-संतोषा थारा ||४||
स्वामी म्हणे रजोगुण |
दु:ख देतसे दारूण ||५||
[८५]
अंगी वाढे तमोगुण |
तदा फांकते अज्ञान ||१||
जीव होय मोह-ग्रस्त |
लक्ष नाहीं राहे सुस्त ||२||
मंद आळशी खादाड |
सदा निद्रेची झांपड ||३||
कर्म करी तैं प्रमाद |
किती होती नाहीं शुद्ध ||४||
स्फूर्तिहीन अंत:करण |
स्वामी म्हणे तो पाषाण ||५||
Wednesday, March 23, 2011
[८२]
असो अश्म-युग असो यंत्र-युग |
आम्हां नित्य योग हरिपायीं ||१||
हरि हा प्राचीन हरि हा अर्वाचीन |
हरि चिरंतन एकला चि ||२||
हरि तळीं वरी हरि मागें पुढे |
हरि चोहींकडे अंतर्बाह्य ||३||
अमूर्ताची मूर्ति आदि-मध्य-अंती |
हरि सर्व भूतीं स्वामी म्हणे ||४||
[८३]
अंगी सत्व बळावतां |
देव-दर्शनी उत्कंठा ||१||
होय ज्ञानाची जागृती |
होय सद्भावाची स्फूर्ती ||२||
विषय-भोग नावडती |
रुचे संतांची संगति ||३||
लौकिकाचा वाटे त्रास |
सुख एकांती जीवास ||४||
सहज बाणे सदाचार |
अंती आत्म-साक्षात्कार ||५||
सत्व गुणांची लक्षणे |
ऐसी जाण स्वामी म्हणे ||६||
असो अश्म-युग असो यंत्र-युग |
आम्हां नित्य योग हरिपायीं ||१||
हरि हा प्राचीन हरि हा अर्वाचीन |
हरि चिरंतन एकला चि ||२||
हरि तळीं वरी हरि मागें पुढे |
हरि चोहींकडे अंतर्बाह्य ||३||
अमूर्ताची मूर्ति आदि-मध्य-अंती |
हरि सर्व भूतीं स्वामी म्हणे ||४||
[८३]
अंगी सत्व बळावतां |
देव-दर्शनी उत्कंठा ||१||
होय ज्ञानाची जागृती |
होय सद्भावाची स्फूर्ती ||२||
विषय-भोग नावडती |
रुचे संतांची संगति ||३||
लौकिकाचा वाटे त्रास |
सुख एकांती जीवास ||४||
सहज बाणे सदाचार |
अंती आत्म-साक्षात्कार ||५||
सत्व गुणांची लक्षणे |
ऐसी जाण स्वामी म्हणे ||६||
Tuesday, March 22, 2011
[८०]
पोटी एक ओठी दुजें |
हें तों घातक सहजे ||१||
जरी वाटे लाभ झाला
नव्हे तो परिणामीं भला ||२||
सत्य बोलाया कारणे |
मनोधैर्य संपादणे ||३||
तुज कशाचे गा भय |
कोण नेते तुझे काय ||४||
करी बुद्धीचा निश्चय |
अंती सत्याचा निश्चय ||५||
स्वामी म्हणे सत्याचरण |
देई आत्म-समाधान ||६||
[८१]
बैसुनी विमानीं आकाशी उड्डाण |
करूं येतें जन यंत्र युगी ||१||
हिंडविती नौका सागराच्या पोटीं |
विद्दुत् द्वारा देती संदेश ते ||२||
साधाया कल्याण नाना शोध जाण |
लाविती विज्ञान शास्त्रवेत्ते ||३||
अंतरी सद्भाव असेल जागृत |
तरी यंत्रे हित स्वामी म्हणे ||४||
पोटी एक ओठी दुजें |
हें तों घातक सहजे ||१||
जरी वाटे लाभ झाला
नव्हे तो परिणामीं भला ||२||
सत्य बोलाया कारणे |
मनोधैर्य संपादणे ||३||
तुज कशाचे गा भय |
कोण नेते तुझे काय ||४||
करी बुद्धीचा निश्चय |
अंती सत्याचा निश्चय ||५||
स्वामी म्हणे सत्याचरण |
देई आत्म-समाधान ||६||
[८१]
बैसुनी विमानीं आकाशी उड्डाण |
करूं येतें जन यंत्र युगी ||१||
हिंडविती नौका सागराच्या पोटीं |
विद्दुत् द्वारा देती संदेश ते ||२||
साधाया कल्याण नाना शोध जाण |
लाविती विज्ञान शास्त्रवेत्ते ||३||
अंतरी सद्भाव असेल जागृत |
तरी यंत्रे हित स्वामी म्हणे ||४||
Monday, March 21, 2011
[७८]
आम्ही हरी-दास प्रपंचीं उदास |
आम्हां निदिध्यास श्रीहरिचा ||१||
जनीं मनीं एक हरी-रूप पाहूं |
हरि-गुण गाऊं आवडीनें ||२||
नाम-संकीर्तानीं हरीसंगे डोलूं |
भाव-बळें बोलूं गुज-गोष्टी ||३||
एकू हरि-गीत सेवू नामामृत |
भेटूं अखंडित स्वामी म्हणे ||४||
[७९]
हरि-रूप सान हरि-रूप थोर |
नाही पारावर हरि-रूपा ||१||
हरि-रूप येथें हरि-रूप तेथें |
व्यापुनी सर्वातें हरि राहे ||२||
स्वरूपीं अरूप असे हरि-रूप |
विश्वीं विश्वरूप हरि दिसे ||३||
सगुण-निर्गुण हरि-रूप जाण |
एक चि परिपूर्ण स्वामी म्हणे ||४||
आम्ही हरी-दास प्रपंचीं उदास |
आम्हां निदिध्यास श्रीहरिचा ||१||
जनीं मनीं एक हरी-रूप पाहूं |
हरि-गुण गाऊं आवडीनें ||२||
नाम-संकीर्तानीं हरीसंगे डोलूं |
भाव-बळें बोलूं गुज-गोष्टी ||३||
एकू हरि-गीत सेवू नामामृत |
भेटूं अखंडित स्वामी म्हणे ||४||
[७९]
हरि-रूप सान हरि-रूप थोर |
नाही पारावर हरि-रूपा ||१||
हरि-रूप येथें हरि-रूप तेथें |
व्यापुनी सर्वातें हरि राहे ||२||
स्वरूपीं अरूप असे हरि-रूप |
विश्वीं विश्वरूप हरि दिसे ||३||
सगुण-निर्गुण हरि-रूप जाण |
एक चि परिपूर्ण स्वामी म्हणे ||४||
Sunday, March 20, 2011
[७६]
आणिकांते वाटे संसाराचें भय |
आम्हांसी तो होय सुख-रूप ||१||
संतत अंतरी राहे श्रीगोपाळ |
बापुडा तो काळ आम्हांपुढे ||२||
सेवेसाठी सुखे साहूं गर्भवास |
होऊ हरि-दास जन्मोजन्मी ||३||
स्वामी म्हणे भावें करूं संकीर्तन |
सवें थोर-सान घेवोनियां ||४||
[७७]
प्रपंची विचार करीं सारासार |
राहें निरंतर सावधान ||१||
स्वभावतां पावे जे जे सुख-दु:ख |
त्याचा हर्ष शोक मानू नको ||२||
प्रसंगी असावें अंगी धैर्य-बळ |
लोभें उतावीळ होऊं नको ||३||
स्वधर्मानुसार वर्तोनी साचार |
होई भव-पार स्वामी म्हणे ||४||
आणिकांते वाटे संसाराचें भय |
आम्हांसी तो होय सुख-रूप ||१||
संतत अंतरी राहे श्रीगोपाळ |
बापुडा तो काळ आम्हांपुढे ||२||
सेवेसाठी सुखे साहूं गर्भवास |
होऊ हरि-दास जन्मोजन्मी ||३||
स्वामी म्हणे भावें करूं संकीर्तन |
सवें थोर-सान घेवोनियां ||४||
[७७]
प्रपंची विचार करीं सारासार |
राहें निरंतर सावधान ||१||
स्वभावतां पावे जे जे सुख-दु:ख |
त्याचा हर्ष शोक मानू नको ||२||
प्रसंगी असावें अंगी धैर्य-बळ |
लोभें उतावीळ होऊं नको ||३||
स्वधर्मानुसार वर्तोनी साचार |
होई भव-पार स्वामी म्हणे ||४||
Saturday, March 19, 2011
[७४]
पडे त्यासी पडो विश्वाचें हें कोडें |
आम्हांसी उघडें आत्म-रूप ||१||
एक आत्म-रूप सर्वत्र संचले |
नाही त्यावेगळें दुजे काहीं ||२||
जळीं स्थळीं काष्ठी पाषाणीं संपूर्ण |
आत्म-रूप जन प्रकटले ||३||
आत्म-रूप दृष्टी आत्म-रूप सृष्टी |
आत्मा पाठी-पोटी स्वामी म्हणे ||४||
[७५]
वेदांताचे सार सांगतों साचार |
नका वारंवार पुसो आता ||१||
सत्य एक आत्मा नित्य निर्विकार |
जाणा चराचर मायाभास ||२||
दिसे जें लोचना भासे जें जें मना |
तें तें मिथ्या जाणा माया-रूप ||३||
विश्व आणि माया एक चि अभिन्न |
जाणा ही चि खूण स्वामी म्हणे ||४||
पडे त्यासी पडो विश्वाचें हें कोडें |
आम्हांसी उघडें आत्म-रूप ||१||
एक आत्म-रूप सर्वत्र संचले |
नाही त्यावेगळें दुजे काहीं ||२||
जळीं स्थळीं काष्ठी पाषाणीं संपूर्ण |
आत्म-रूप जन प्रकटले ||३||
आत्म-रूप दृष्टी आत्म-रूप सृष्टी |
आत्मा पाठी-पोटी स्वामी म्हणे ||४||
[७५]
वेदांताचे सार सांगतों साचार |
नका वारंवार पुसो आता ||१||
सत्य एक आत्मा नित्य निर्विकार |
जाणा चराचर मायाभास ||२||
दिसे जें लोचना भासे जें जें मना |
तें तें मिथ्या जाणा माया-रूप ||३||
विश्व आणि माया एक चि अभिन्न |
जाणा ही चि खूण स्वामी म्हणे ||४||
Friday, March 18, 2011
[७२]
अंतरी स्वानंद असे स्वयंसिद्ध |
परी मति-मंद भोगी चि ना ||१||
समाधी-निधन असता सन्निध |
झालासे मोहांध पाहे चि ना ||२||
अखंड भजन चाले रांत्र -दिन |
तेथे सावधान राहे चि ना ||३||
सद् गुरु वाचून नाही आत्म-ज्ञान |
जाईना शरण स्वामी म्हणे ||४||
[७३]
प्रपंचाकारणे केली आटापीट |
परी यातायात चुके चि ना ||१||
माझें माझें म्हणुनी बांधियलें गांठी |
परी ते शेवटी कामा नये ||२||
कन्या पुत्र वित्त आप्त गण-गोत |
सांडुनी समस्त जावें लागे ||३||
हरि-नाम एक येईल सांगाती |
तारील तें अंती स्वामी म्हणे ||४||
अंतरी स्वानंद असे स्वयंसिद्ध |
परी मति-मंद भोगी चि ना ||१||
समाधी-निधन असता सन्निध |
झालासे मोहांध पाहे चि ना ||२||
अखंड भजन चाले रांत्र -दिन |
तेथे सावधान राहे चि ना ||३||
सद् गुरु वाचून नाही आत्म-ज्ञान |
जाईना शरण स्वामी म्हणे ||४||
[७३]
प्रपंचाकारणे केली आटापीट |
परी यातायात चुके चि ना ||१||
माझें माझें म्हणुनी बांधियलें गांठी |
परी ते शेवटी कामा नये ||२||
कन्या पुत्र वित्त आप्त गण-गोत |
सांडुनी समस्त जावें लागे ||३||
हरि-नाम एक येईल सांगाती |
तारील तें अंती स्वामी म्हणे ||४||
Thursday, March 17, 2011
[७०]
चित्त-शुद्धीचा उपाय |
सदा चिंतावे हरि-पाय ||१||
पोटी व्ह्वावा अनुताप |
मुखें हरि-नाम जप ||२||
हरि-नाम गातां गीती |
होय पापाची निष्कृती ||३||
चित्ती उपजे सद्भाव |
स्वामी म्हणे भेटे देव |४||
[७१]
नको वेदाभ्यास करावा सायास |
उपास-तापास देह-दंड ||१||
नको धुम्र-पान पंचाग्नी-साधन |
नको तीर्थाटन काशी गया ||२||
नको मंत्र-तंत्र जप-जाप्य अर्चा |
वेदान्ताची चर्चा करावया ||३||
अखंड अंतरी सहज-स्फुरण |
तेथे ठेवीं मन स्वामी म्हणे ||४||
चित्त-शुद्धीचा उपाय |
सदा चिंतावे हरि-पाय ||१||
पोटी व्ह्वावा अनुताप |
मुखें हरि-नाम जप ||२||
हरि-नाम गातां गीती |
होय पापाची निष्कृती ||३||
चित्ती उपजे सद्भाव |
स्वामी म्हणे भेटे देव |४||
[७१]
नको वेदाभ्यास करावा सायास |
उपास-तापास देह-दंड ||१||
नको धुम्र-पान पंचाग्नी-साधन |
नको तीर्थाटन काशी गया ||२||
नको मंत्र-तंत्र जप-जाप्य अर्चा |
वेदान्ताची चर्चा करावया ||३||
अखंड अंतरी सहज-स्फुरण |
तेथे ठेवीं मन स्वामी म्हणे ||४||
Wednesday, March 16, 2011
[६८]
आवडीने भावे हरि-नाम गावे |
निर्लज्ज नाचावे संकीर्तनीं ||१||
रंगतां कीर्तनीं लागते समाधी |
होते योग-सिद्धी अनायासें ||२||
नसे तरी नसो वेदांताचें ज्ञान |
नाम संकीर्तन सोडूं नये ||३||
स्वामी म्हणे भावें आकळे वेदांत |
भेटे मूर्तिमंत पर-ब्रह्म ||४||
[६९]
नाम-संकीर्तन जीवासी आवडे |
मन-बुद्धी जडे हरि-पायीं ||१||
हरि नामापुढें अमृत थोकडें |
तुच्छ तें बापुडें स्वर्ग-सुख ||२||
नको कर्म-कांड नको ब्रह्म-ज्ञान |
नको न्यावा प्राण ब्रह्मांडाते ||३||
भाव-बळे आम्हा हरिचें दर्शन |
नित्य समाधान स्वामी म्हणे ||४||
आवडीने भावे हरि-नाम गावे |
निर्लज्ज नाचावे संकीर्तनीं ||१||
रंगतां कीर्तनीं लागते समाधी |
होते योग-सिद्धी अनायासें ||२||
नसे तरी नसो वेदांताचें ज्ञान |
नाम संकीर्तन सोडूं नये ||३||
स्वामी म्हणे भावें आकळे वेदांत |
भेटे मूर्तिमंत पर-ब्रह्म ||४||
[६९]
नाम-संकीर्तन जीवासी आवडे |
मन-बुद्धी जडे हरि-पायीं ||१||
हरि नामापुढें अमृत थोकडें |
तुच्छ तें बापुडें स्वर्ग-सुख ||२||
नको कर्म-कांड नको ब्रह्म-ज्ञान |
नको न्यावा प्राण ब्रह्मांडाते ||३||
भाव-बळे आम्हा हरिचें दर्शन |
नित्य समाधान स्वामी म्हणे ||४||
Tuesday, March 15, 2011
[६६]
नेणे विधी ना निषेध |
नेणे पाप-पुण्य-बंध ||१||
नेणे लौकिक-संबंध |
जगीं वागतो स्वच्छंद ||२||
घर दार ना संसार
सदा राहे निराधार ||३||
स्वामी म्हणे संत-जन
तया कैचें जगद्भान ||४||
[६७]
सगुण निर्गुण एकरूप जाण |
ओळखावी खूण स्वानुभवें ||१||
नित्य निराकार निर्गुण एकलें |
तें चि प्रकटलें विश्व-रूपें ||२||
बीजीं सामावला वृक्षाचा विस्तार |
तैसें चराचर निराकारीं ||३||
स्वामी म्हणे ज्वाळा वन्हीसी अभिन्न |
सगुण-निर्गुण तैसें मानी ||४|
नेणे विधी ना निषेध |
नेणे पाप-पुण्य-बंध ||१||
नेणे लौकिक-संबंध |
जगीं वागतो स्वच्छंद ||२||
घर दार ना संसार
सदा राहे निराधार ||३||
स्वामी म्हणे संत-जन
तया कैचें जगद्भान ||४||
[६७]
सगुण निर्गुण एकरूप जाण |
ओळखावी खूण स्वानुभवें ||१||
नित्य निराकार निर्गुण एकलें |
तें चि प्रकटलें विश्व-रूपें ||२||
बीजीं सामावला वृक्षाचा विस्तार |
तैसें चराचर निराकारीं ||३||
स्वामी म्हणे ज्वाळा वन्हीसी अभिन्न |
सगुण-निर्गुण तैसें मानी ||४|
Monday, March 14, 2011
[६४]
मूळ नाभि-स्थानीं जन्म पावे ध्वनि |
ती चि परा वाणी ओळखावी ||१||
हृदयी ची जाण पश्यन्तीचे स्थान |
कंठीं ओळखण मध्यमेची ||२||
मुखें जो उच्चार वैखरी साचार |
ऐशा वाणी चार जाणोनियां ||३||
परेहुनी पर राहे परात्पर |
पाहे निरंतर स्वामी म्हणे ||४||
[६५]
गुरुकृपेवीण नाहीं आत्म-ज्ञान |
वाउगा तो शीण साधनांचा ||१||
सहज साधन गुरु-कृपा जाण |
जीवाचें कल्याण तेणें होय ||२||
गुरु माता -पिता गुरु चि देवता |
गुरु मुक्ती-दाट ऐसें मानी ||३||
गुरु सेवेविण जावों नेदीं क्षण |
तेणे तो प्रसन्न स्वामी म्हणे ||४||
मूळ नाभि-स्थानीं जन्म पावे ध्वनि |
ती चि परा वाणी ओळखावी ||१||
हृदयी ची जाण पश्यन्तीचे स्थान |
कंठीं ओळखण मध्यमेची ||२||
मुखें जो उच्चार वैखरी साचार |
ऐशा वाणी चार जाणोनियां ||३||
परेहुनी पर राहे परात्पर |
पाहे निरंतर स्वामी म्हणे ||४||
[६५]
गुरुकृपेवीण नाहीं आत्म-ज्ञान |
वाउगा तो शीण साधनांचा ||१||
सहज साधन गुरु-कृपा जाण |
जीवाचें कल्याण तेणें होय ||२||
गुरु माता -पिता गुरु चि देवता |
गुरु मुक्ती-दाट ऐसें मानी ||३||
गुरु सेवेविण जावों नेदीं क्षण |
तेणे तो प्रसन्न स्वामी म्हणे ||४||
Sunday, March 13, 2011
[६२]
सत्याचे दर्शन घडावे संपूर्ण |
ध्येय हे लक्षून जीवनाचे ||१||
प्रेम-अहिंसेचे घेवोनिया व्रत |
लोक-सेवा-रत राहे सदा ||२||
शस्त्रविण करी दुष्टाचा प्रतिकार |
न घेई माघार प्राणांतीं हि ||३||
स्वामी म्हणे त्या होउनी प्रसन्न |
देई जनार्दन शांति-सुख ||४||
[६३]
स्वरूपीं तल्लीन साधु-संत-जन |
अंतरी प्रसन्न अखंडित ||१||
निंदा आणि स्तुति समान लेखिती |
सोनें आणि माती एकरूप ||२||
नाही माया पाश नाहीं राग-द्वेष |
नाहीं तयां क्लेश संसाराचा ||३||
स्वामी म्हणे विश्वीं नाही दुजेपण |
सर्वत्र संपूर्ण आत्म-रूप ||४||
सत्याचे दर्शन घडावे संपूर्ण |
ध्येय हे लक्षून जीवनाचे ||१||
प्रेम-अहिंसेचे घेवोनिया व्रत |
लोक-सेवा-रत राहे सदा ||२||
शस्त्रविण करी दुष्टाचा प्रतिकार |
न घेई माघार प्राणांतीं हि ||३||
स्वामी म्हणे त्या होउनी प्रसन्न |
देई जनार्दन शांति-सुख ||४||
[६३]
स्वरूपीं तल्लीन साधु-संत-जन |
अंतरी प्रसन्न अखंडित ||१||
निंदा आणि स्तुति समान लेखिती |
सोनें आणि माती एकरूप ||२||
नाही माया पाश नाहीं राग-द्वेष |
नाहीं तयां क्लेश संसाराचा ||३||
स्वामी म्हणे विश्वीं नाही दुजेपण |
सर्वत्र संपूर्ण आत्म-रूप ||४||
Saturday, March 12, 2011
[६०]
नको व्रत नेम नको तीर्थाटन |
हरिसी शरण जय वेगें ||१||
नको योग-याग नको भोग-त्याग
हरि-नाम चांग दृढ धरीं ||२||
नको मंत्र-तंत्र नको कर्म-धर्म |
घेई हरि-नाम भक्तिभावें ||३||
स्वामी म्हणे नको नाना देह-दंड |
चालवी अखंड नाम-घोष ||४||
[६१]
लोक-सेवा व्रत आचरिती भावें |
तयांतें मानावें भाग्यवंत ||१||
लोक-सेवेसाठी सत्यातें स्मरून |
करिती ते दान सर्वस्वाचें ||२||
त्या चि सेवा-व्रतें तोषे जगन्नाथ |
शुद्ध करी चित्त सेवकाचे ||३||
स्वामी म्हणे तेणे लाभे आत्म-ज्ञान |
जनी जनार्दन प्रकटतो ||४||
नको व्रत नेम नको तीर्थाटन |
हरिसी शरण जय वेगें ||१||
नको योग-याग नको भोग-त्याग
हरि-नाम चांग दृढ धरीं ||२||
नको मंत्र-तंत्र नको कर्म-धर्म |
घेई हरि-नाम भक्तिभावें ||३||
स्वामी म्हणे नको नाना देह-दंड |
चालवी अखंड नाम-घोष ||४||
[६१]
लोक-सेवा व्रत आचरिती भावें |
तयांतें मानावें भाग्यवंत ||१||
लोक-सेवेसाठी सत्यातें स्मरून |
करिती ते दान सर्वस्वाचें ||२||
त्या चि सेवा-व्रतें तोषे जगन्नाथ |
शुद्ध करी चित्त सेवकाचे ||३||
स्वामी म्हणे तेणे लाभे आत्म-ज्ञान |
जनी जनार्दन प्रकटतो ||४||
Friday, March 11, 2011
[५८]
बाळपणीं खेळ यौवनी विलास |
वार्धक्यीं जीवास व्याधी चिंता ||१||
बाळपणीं शाळा तारुण्यीं संसार |
वार्धक्यीं जोजार तयाचा चि ||२||
जन्मुनियां वायां कष्टविली काया |
स्व-हित साधाया वेळ नाही ||३||
स्वामी म्हणे मोहें विसरला देव |
तयासी विसावा कैंचा अंती ||३||
[५९]
बाळकाची भूक कळे माउलीतें |
बोलावुनी देते स्तन-पान ||१||
तैसें माझें हित जाने जगन्नाथ |
तेणे मी निश्चिंत सर्वकाळ ||२||
भाव-बळें देव आपुलासा केला |
कृपाळु तो भला सांभाळितो ||३||
स्वामी म्हणे खेळ खेळतो लडिवाळ |
खेळवी गोपाळ प्रेम-भरें ||४||
बाळपणीं खेळ यौवनी विलास |
वार्धक्यीं जीवास व्याधी चिंता ||१||
बाळपणीं शाळा तारुण्यीं संसार |
वार्धक्यीं जोजार तयाचा चि ||२||
जन्मुनियां वायां कष्टविली काया |
स्व-हित साधाया वेळ नाही ||३||
स्वामी म्हणे मोहें विसरला देव |
तयासी विसावा कैंचा अंती ||३||
[५९]
बाळकाची भूक कळे माउलीतें |
बोलावुनी देते स्तन-पान ||१||
तैसें माझें हित जाने जगन्नाथ |
तेणे मी निश्चिंत सर्वकाळ ||२||
भाव-बळें देव आपुलासा केला |
कृपाळु तो भला सांभाळितो ||३||
स्वामी म्हणे खेळ खेळतो लडिवाळ |
खेळवी गोपाळ प्रेम-भरें ||४||
Thursday, March 10, 2011
[५६]
काम-क्रोधलोभ-दार हें तिहेरी |
घोर यम-पुरी पाववितें ||१||
तेणें आत्म-नाश होतसे निभ्रांत |
सांगतो श्री-कांत गीतेमाजीं ||२||
सोडी आडवाट धरी जो सत्पंथ |
दृढ-भावें चित्त देवोनियां ||३||
आत्म्याचें कल्याण साधुनी तो जाण |
पावतो निर्वाण स्वामी म्हणे ||४||
[५७]
कधीं खाई तूप-रोटी
कधी राहे अर्धपोटी ||१||
कधीं झोपे गादीवरी |
कधीं घोंगडी अंथरी ||२||
कधीं लोकरीची शाल |
कधीं पांघरी वाकळ ||३||
कधीं हवेली सुंदर |
कधीं चंद्र -मौळी घर ||४||
कधीं सज्जनांची भेट |
कधीं नाठाळाशीं गाठीं ||५||
कधीं गळा पुष्प-हार |
कधीं निंदेचा भडिमार ||६||
कधीं सुखाचा संसार |
कधीं हिंडे दारोदार ||७||
स्वामी म्हणे आत्म-स्थित |
संत सुख दु:खातीत ||८||
काम-क्रोधलोभ-दार हें तिहेरी |
घोर यम-पुरी पाववितें ||१||
तेणें आत्म-नाश होतसे निभ्रांत |
सांगतो श्री-कांत गीतेमाजीं ||२||
सोडी आडवाट धरी जो सत्पंथ |
दृढ-भावें चित्त देवोनियां ||३||
आत्म्याचें कल्याण साधुनी तो जाण |
पावतो निर्वाण स्वामी म्हणे ||४||
[५७]
कधीं खाई तूप-रोटी
कधी राहे अर्धपोटी ||१||
कधीं झोपे गादीवरी |
कधीं घोंगडी अंथरी ||२||
कधीं लोकरीची शाल |
कधीं पांघरी वाकळ ||३||
कधीं हवेली सुंदर |
कधीं चंद्र -मौळी घर ||४||
कधीं सज्जनांची भेट |
कधीं नाठाळाशीं गाठीं ||५||
कधीं गळा पुष्प-हार |
कधीं निंदेचा भडिमार ||६||
कधीं सुखाचा संसार |
कधीं हिंडे दारोदार ||७||
स्वामी म्हणे आत्म-स्थित |
संत सुख दु:खातीत ||८||
Wednesday, March 9, 2011
[५४]
बैसे अधांतरी उभा अग्नीवरी |
सांगे देशांतरी काय चाले ||१||
बोले तें तें घडे ऐसे चि रोकडे |
दावी लोकांपुढे चमत्कार ||२||
वश केल्या सिद्धी पावला प्रसिद्धी |
लागली उपाधी लौकिकाची ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं आत्म-साक्षात्कार |
काय चमत्कार दावोनियां ||४||
[५५]
दावी चमत्कार त्यासी नमस्कार |
लोक-व्यवहार ऐसा असे ||१||
स्वभावें साचार रची चराचर |
त्याचा जयजयकार कोण करी ||२||
स्व-रूपीं विलीन साधू-संत-जन |
तयांचे चरण कोण धरी ||३||
स्वामी म्हणे जना कृत्रिमाची गोडी |
नसे चि आवडी स्वाभाविकीं ||४||
बैसे अधांतरी उभा अग्नीवरी |
सांगे देशांतरी काय चाले ||१||
बोले तें तें घडे ऐसे चि रोकडे |
दावी लोकांपुढे चमत्कार ||२||
वश केल्या सिद्धी पावला प्रसिद्धी |
लागली उपाधी लौकिकाची ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं आत्म-साक्षात्कार |
काय चमत्कार दावोनियां ||४||
[५५]
दावी चमत्कार त्यासी नमस्कार |
लोक-व्यवहार ऐसा असे ||१||
स्वभावें साचार रची चराचर |
त्याचा जयजयकार कोण करी ||२||
स्व-रूपीं विलीन साधू-संत-जन |
तयांचे चरण कोण धरी ||३||
स्वामी म्हणे जना कृत्रिमाची गोडी |
नसे चि आवडी स्वाभाविकीं ||४||
Tuesday, March 8, 2011
[५२]
भावे हरी-नाम धरिसील कंठीं |
तरी चि वैकुंठीं वास घडे ||१||
एक वेळ पडे हरि-नाम कानीं |
पातकांची खाणी दग्ध होय ||२||
हरि-नाम सार हरि-नाम सार |
तेणें चि भव-पार पावसील ||३||
स्वामी म्हणे अंतीं हरि-नाम एक |
तारील नि:शंक तुजलागीं ||४||
[५३]
वेद-वेदांताचे संपादुनी ज्ञान |
देतसे व्याख्यान लोकांपुढे ||१||
अद्वैत-वेदांत मांडितो सिद्धांत |
देउनी दृष्टांत नानाविध ||२||
भला थोर ज्ञाता ऐसी कीर्ति होतां |
आला स्वर्ग हात ऐसें वाटे ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं आत्म-समाधान |
व्यर्थ अभिमान पांडित्याचा ||४||
भावे हरी-नाम धरिसील कंठीं |
तरी चि वैकुंठीं वास घडे ||१||
एक वेळ पडे हरि-नाम कानीं |
पातकांची खाणी दग्ध होय ||२||
हरि-नाम सार हरि-नाम सार |
तेणें चि भव-पार पावसील ||३||
स्वामी म्हणे अंतीं हरि-नाम एक |
तारील नि:शंक तुजलागीं ||४||
[५३]
वेद-वेदांताचे संपादुनी ज्ञान |
देतसे व्याख्यान लोकांपुढे ||१||
अद्वैत-वेदांत मांडितो सिद्धांत |
देउनी दृष्टांत नानाविध ||२||
भला थोर ज्ञाता ऐसी कीर्ति होतां |
आला स्वर्ग हात ऐसें वाटे ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं आत्म-समाधान |
व्यर्थ अभिमान पांडित्याचा ||४||
Monday, March 7, 2011
[५०]
हरि-नामाचे पवाडे |
गातां सनकादिक वेडे ||१||
तेथे मी एक बापुडें |
किती गाऊं वाडेंकोडें ||२||
हरि-नामाची महती |
गातां वेद मौनावती ||३||
तेथे काय माझी मति |
स्वामी म्हणे वर्णूं किती ||४||
[५१]
आता काय मज संन्यासाचे काज |
निजांतरीं गुज प्रकटले ||१||
प्रकटतां घडे सहज-संन्यास |
नैष कर्म्य-पदास गांठियेले ||२||
करोनि अकर्ता भोगोनी अभोक्ता |
विश्वीं आत्म-सत्ता नांदतसे ||३||
स्वामी म्हणे आता जाहलों नि:संग |
त्याग आणि भोग दूर ठेले ||४||
हरि-नामाचे पवाडे |
गातां सनकादिक वेडे ||१||
तेथे मी एक बापुडें |
किती गाऊं वाडेंकोडें ||२||
हरि-नामाची महती |
गातां वेद मौनावती ||३||
तेथे काय माझी मति |
स्वामी म्हणे वर्णूं किती ||४||
[५१]
आता काय मज संन्यासाचे काज |
निजांतरीं गुज प्रकटले ||१||
प्रकटतां घडे सहज-संन्यास |
नैष कर्म्य-पदास गांठियेले ||२||
करोनि अकर्ता भोगोनी अभोक्ता |
विश्वीं आत्म-सत्ता नांदतसे ||३||
स्वामी म्हणे आता जाहलों नि:संग |
त्याग आणि भोग दूर ठेले ||४||
Sunday, March 6, 2011
[४८]
सेवावा एकांत सुखे वारंवार |
जन संगे फार बोलो नये ||१||
आणिकांची निंदा नायकावी कानी |
पर-द्रव्य मनीं आणों नये ||३||
पर-स्त्री चे ठायीं सदा मातृ-भाव |
असों द्यावा ठाव दयेलागीं ||३||
स्वामी म्हणे दक्ष रहावें साधनी |
सद्भावें लक्षोनी हरिपाय ||४||
[४९]
भावें हरि-नाम उच्चारितां वाचे |
कोटि कल्मषांचे भस्म होय ||१||
हरीनाम मंत्र जपा अहोरात्र |
अंतरी पवित्र तेणें तुम्हीं ||२||
सानंद सोल्हास करा नाम-घोष |
तेणे भव-पाश दूर होय ||३||
चुके अधोगति लाभे चिर-शांति |
जिवासी विश्रांती स्वामी म्हणे ||४||
सेवावा एकांत सुखे वारंवार |
जन संगे फार बोलो नये ||१||
आणिकांची निंदा नायकावी कानी |
पर-द्रव्य मनीं आणों नये ||३||
पर-स्त्री चे ठायीं सदा मातृ-भाव |
असों द्यावा ठाव दयेलागीं ||३||
स्वामी म्हणे दक्ष रहावें साधनी |
सद्भावें लक्षोनी हरिपाय ||४||
[४९]
भावें हरि-नाम उच्चारितां वाचे |
कोटि कल्मषांचे भस्म होय ||१||
हरीनाम मंत्र जपा अहोरात्र |
अंतरी पवित्र तेणें तुम्हीं ||२||
सानंद सोल्हास करा नाम-घोष |
तेणे भव-पाश दूर होय ||३||
चुके अधोगति लाभे चिर-शांति |
जिवासी विश्रांती स्वामी म्हणे ||४||
Saturday, March 5, 2011
[४६]
सोडिला संसार जोडिला संन्यास |
पालटिला वेष बाह्यात्कारीं ||१||
अंतरी मी-माझे बाळगिले ओझें |
तरी ती सहजे विटंबना ||२||
वाटला संन्यास घ्यावा ज्या कारणे |
तेथें लक्ष उणे कामा नये ||३||
स्वामी म्हणे मन होतां कृष्णार्पण
संसारी असोन संन्यासी तो ||४||
[४७]
करी थोडे बोले फार
त्याचा बुडाला संसार ||१||
वस्तु विकी जो उधार |
त्याचा बुडाला व्यापार ||२||
विचारी ना सारासार |
त्याचा बुडाला आचार ||३||
स्वामी म्हणे अहंकार |
तेथे कैंचा आत्मोद्धार ||४||
सोडिला संसार जोडिला संन्यास |
पालटिला वेष बाह्यात्कारीं ||१||
अंतरी मी-माझे बाळगिले ओझें |
तरी ती सहजे विटंबना ||२||
वाटला संन्यास घ्यावा ज्या कारणे |
तेथें लक्ष उणे कामा नये ||३||
स्वामी म्हणे मन होतां कृष्णार्पण
संसारी असोन संन्यासी तो ||४||
[४७]
करी थोडे बोले फार
त्याचा बुडाला संसार ||१||
वस्तु विकी जो उधार |
त्याचा बुडाला व्यापार ||२||
विचारी ना सारासार |
त्याचा बुडाला आचार ||३||
स्वामी म्हणे अहंकार |
तेथे कैंचा आत्मोद्धार ||४||
Friday, March 4, 2011
[४४]
ज्ञानदेव एकनाथ |
आले स्वामी रामतीर्थ ||१||
तुकाराम रामदास |
रामकृष्ण परमहंस ||२||
माता शारदा तापसी |
आली जगदबांदासी ||३||
स्वामी विवेकानंद हे |
आले मथुरबाबू पाहें ||४||
मेहेर बाबा उपासनी |
आले भक्त योगी मुनी ||५||
आला ख्रिस्त आला बुध्द |
आला महात्मा प्रसिद्ध ||६||
जगद् गुरु कृष्णमुर्ति |
प्रभू गौरांग प्रभृति ||७||
साधु संत भक्त यती |
नित्यनेमें येथें येती ||८||
प्रेमें पासीं बैसवितों
आप्त मित्र पाचारितों ||९||
आणि तयाचे संगतीं |
गुरु सांगती त्या रीतीं ||१०||
ठेवोनियां भाव-भक्ति |
हरिपाय ध्यातो चित्तीं ||११||
गेले गेले देह-भान |
हरिपायी झालो लीन ||१२||
स्वामी म्हणे ध्याता ध्यान |
हरि-रूप परिपूर्ण ||१३||
[४५]
मन हे चंचळ स्वभावें ओढाळ |
धांवे रानोमाळ आवरे ना ||१||
गांजितो संसार सोशितो जोजार |
परि अहंकार वोसरे ना ||२||
स्व-रुपीं आनंद असे स्वयं-सिद्ध |
धुंडाळी मोहांध आढळे ना ||३||
गुरु-कृपेविण आकळे ना खुण |
व्हावें सावधान स्वामी म्हणे ||४||
ज्ञानदेव एकनाथ |
आले स्वामी रामतीर्थ ||१||
तुकाराम रामदास |
रामकृष्ण परमहंस ||२||
माता शारदा तापसी |
आली जगदबांदासी ||३||
स्वामी विवेकानंद हे |
आले मथुरबाबू पाहें ||४||
मेहेर बाबा उपासनी |
आले भक्त योगी मुनी ||५||
आला ख्रिस्त आला बुध्द |
आला महात्मा प्रसिद्ध ||६||
जगद् गुरु कृष्णमुर्ति |
प्रभू गौरांग प्रभृति ||७||
साधु संत भक्त यती |
नित्यनेमें येथें येती ||८||
प्रेमें पासीं बैसवितों
आप्त मित्र पाचारितों ||९||
आणि तयाचे संगतीं |
गुरु सांगती त्या रीतीं ||१०||
ठेवोनियां भाव-भक्ति |
हरिपाय ध्यातो चित्तीं ||११||
गेले गेले देह-भान |
हरिपायी झालो लीन ||१२||
स्वामी म्हणे ध्याता ध्यान |
हरि-रूप परिपूर्ण ||१३||
[४५]
मन हे चंचळ स्वभावें ओढाळ |
धांवे रानोमाळ आवरे ना ||१||
गांजितो संसार सोशितो जोजार |
परि अहंकार वोसरे ना ||२||
स्व-रुपीं आनंद असे स्वयं-सिद्ध |
धुंडाळी मोहांध आढळे ना ||३||
गुरु-कृपेविण आकळे ना खुण |
व्हावें सावधान स्वामी म्हणे ||४||
Thursday, March 3, 2011
[४२]
सोनें आणि लेणें एक चि तत्वतां |
तैसी आत्मसत्ता विश्वरूप ||१||
तरंग आणि सागर एक चि साचार
तैसा विश्वाकार आत्म-मय||२||
ज्वाला आणि अग्न एक चि संपूर्ण |
भूतांसी अभिन्न आत्मतत्व ||३||
स्वामी म्हणे जैसा कापुरीं सुवास |
तैसा श्रीनिवास विश्वीं वसे ||४||
[४३]
प्रपंच-विटाळापासुनी मोकळा |
झालो मी सोवळा आत्म-रूप ||१||
नाम रूप कुळ सांडोनी सकळ |
झालों मी केवळ आत्म-रूप ||२||
भेद-भाव मळ गेला अमंगळ |
झालों मी निर्मळ आत्म-रूप ||३||
जळांत कमळ तैसा उपाधींत |
राहतो अलिप्त स्वामी म्हणे ||४||
सोनें आणि लेणें एक चि तत्वतां |
तैसी आत्मसत्ता विश्वरूप ||१||
तरंग आणि सागर एक चि साचार
तैसा विश्वाकार आत्म-मय||२||
ज्वाला आणि अग्न एक चि संपूर्ण |
भूतांसी अभिन्न आत्मतत्व ||३||
स्वामी म्हणे जैसा कापुरीं सुवास |
तैसा श्रीनिवास विश्वीं वसे ||४||
[४३]
प्रपंच-विटाळापासुनी मोकळा |
झालो मी सोवळा आत्म-रूप ||१||
नाम रूप कुळ सांडोनी सकळ |
झालों मी केवळ आत्म-रूप ||२||
भेद-भाव मळ गेला अमंगळ |
झालों मी निर्मळ आत्म-रूप ||३||
जळांत कमळ तैसा उपाधींत |
राहतो अलिप्त स्वामी म्हणे ||४||
Wednesday, March 2, 2011
[४०]
वेदांती तो बोले सृष्टी मिथ्या ऐसें |
भक्ता ती चि दिसे हरि-रूप ||१||
वेदांती ओळखे मिथ्या मायाभास |
हरीचा विलास भक्त म्हणे ||२||
दोहीचा भावार्थ सारिखा तत्वतां |
एक चि हरि-सत्ता सर्वां ठायीं ||३||
भक्ती तो चि ज्ञानी ज्ञानी तो चि भक्त |
जाणावा सिद्धान्त स्वामी म्हणे ||४||
[ ४१]
हरिपायी धांव घेतां उठाउठी |
आड उभे ठाती कामक्रोध ||१||
असों द्यावा चित्तीं एकनिष्ठ भाव |
भक्तालागीं देव सांभाळितो ||२||
स्वयें जगन्नाथ साधकाचा हात |
धरोनियां नीट चालवितो ||३||
साधकाकारणें घडे हें बोलणे |
ज्याचें तोचि जाणे स्वामी म्हणे ||४||
वेदांती तो बोले सृष्टी मिथ्या ऐसें |
भक्ता ती चि दिसे हरि-रूप ||१||
वेदांती ओळखे मिथ्या मायाभास |
हरीचा विलास भक्त म्हणे ||२||
दोहीचा भावार्थ सारिखा तत्वतां |
एक चि हरि-सत्ता सर्वां ठायीं ||३||
भक्ती तो चि ज्ञानी ज्ञानी तो चि भक्त |
जाणावा सिद्धान्त स्वामी म्हणे ||४||
[ ४१]
हरिपायी धांव घेतां उठाउठी |
आड उभे ठाती कामक्रोध ||१||
असों द्यावा चित्तीं एकनिष्ठ भाव |
भक्तालागीं देव सांभाळितो ||२||
स्वयें जगन्नाथ साधकाचा हात |
धरोनियां नीट चालवितो ||३||
साधकाकारणें घडे हें बोलणे |
ज्याचें तोचि जाणे स्वामी म्हणे ||४||
Tuesday, March 1, 2011
[३८]
चित्त असों द्यावें निवांत प्रसन्न |
कल्पांती हि खिन्न होऊं नये ||१||
अंतरी असावा अखंड उल्हास |
आपत्तीचा त्रास मानूं नये ||२||
संसारी रहावे अलिप्त उदास |
मोहे माया-पाश जोडूं नये ||३||
स्वामी म्हणे व्हावा ईश्वरी विश्वास |
संतांचा सहवास सोडूं नये ||४||
[३९]
'नेति' 'नेति' ऐसें बोलती ते वेद |
जाहले नि:शब्द पर-तत्वीं ||१||
मोकळें न बध्द एकलें न दुजें
नांदतें सहजें आत्म-पणे ||२||
शून्य ना संपूर्ण मूर्त न अमूर्त |
भावाsभावातीत महाशून्य ||३||
ते चि आम्हा भलें अंतरी लाभले |
गुरु-कृपा-बळें स्वामी म्हणे ||४||
चित्त असों द्यावें निवांत प्रसन्न |
कल्पांती हि खिन्न होऊं नये ||१||
अंतरी असावा अखंड उल्हास |
आपत्तीचा त्रास मानूं नये ||२||
संसारी रहावे अलिप्त उदास |
मोहे माया-पाश जोडूं नये ||३||
स्वामी म्हणे व्हावा ईश्वरी विश्वास |
संतांचा सहवास सोडूं नये ||४||
[३९]
'नेति' 'नेति' ऐसें बोलती ते वेद |
जाहले नि:शब्द पर-तत्वीं ||१||
मोकळें न बध्द एकलें न दुजें
नांदतें सहजें आत्म-पणे ||२||
शून्य ना संपूर्ण मूर्त न अमूर्त |
भावाsभावातीत महाशून्य ||३||
ते चि आम्हा भलें अंतरी लाभले |
गुरु-कृपा-बळें स्वामी म्हणे ||४||
Monday, February 28, 2011
[३६]
राम-नाम धरा कंठी |
पाप जाय उठाउठीं ||१||
नामें पाषाण तारिले |
नामें पापी उद्धारिले ||२||
नाम जपे वाल्या कोळी |
धन्य झाला भू-मंडळी ||३||
नामे तारिली पिंगला
अजामीळ मुक्त केला ||४||
राम-नाम बीज-मंत्र |
स्वामी जपे अहोरात्र ||५||
[ ३७ ]
कोणी भेटो सुष्ट दुष्ट |
सदा असावें संतुष्ट ||१||
मान तैसा अपमान |
मनी लेखावा समान ||२||
प्राप्त होतां सुख-दु:ख
नये मानूं हर्ष-शोक ||३||
उठावतां काम-क्रोध |
चित्त न व्हावें प्रक्षुब्ध ||४||
स्वामी म्हणे प्रतिक्षण |
आत्मरूपी अनुसंधान
राम-नाम धरा कंठी |
पाप जाय उठाउठीं ||१||
नामें पाषाण तारिले |
नामें पापी उद्धारिले ||२||
नाम जपे वाल्या कोळी |
धन्य झाला भू-मंडळी ||३||
नामे तारिली पिंगला
अजामीळ मुक्त केला ||४||
राम-नाम बीज-मंत्र |
स्वामी जपे अहोरात्र ||५||
[ ३७ ]
कोणी भेटो सुष्ट दुष्ट |
सदा असावें संतुष्ट ||१||
मान तैसा अपमान |
मनी लेखावा समान ||२||
प्राप्त होतां सुख-दु:ख
नये मानूं हर्ष-शोक ||३||
उठावतां काम-क्रोध |
चित्त न व्हावें प्रक्षुब्ध ||४||
स्वामी म्हणे प्रतिक्षण |
आत्मरूपी अनुसंधान
Sunday, February 27, 2011
[३४]
पूर्ण हरि-कृपा-बळे |
विश्व-रूप म्यां देखिले ||१||
आता ठेवूं कुठें पाय
हरि-रूप लोक-त्रय ||२||
रिता नाही कोठें ठाव
जेथे पाहें तेथें देव ||३||
स्वामी हरिसी अभिन्न |
अवघा हरि परिपूर्ण ||४||
[३५]
कर्म तैसें फळ लाभतें केवळ |
आणिकातें बोल लावूं नये ||१||
पेरोनियां साळी गव्हाचें तें पीक |
घ्यावया नि:शंक धावूं नये ||२||
उत्तरासारखे येते प्रतुत्तर |
करावा विचार आपणापाशी ||३||
पहावें तें दिसे दर्पणीं साचार |
आपुला आचार ओळखावा ||४||
स्वामी म्हणे होसी सर्वथैव जाण
तुझा तूं कारण सुख-दु:खा ||५||
पूर्ण हरि-कृपा-बळे |
विश्व-रूप म्यां देखिले ||१||
आता ठेवूं कुठें पाय
हरि-रूप लोक-त्रय ||२||
रिता नाही कोठें ठाव
जेथे पाहें तेथें देव ||३||
स्वामी हरिसी अभिन्न |
अवघा हरि परिपूर्ण ||४||
[३५]
कर्म तैसें फळ लाभतें केवळ |
आणिकातें बोल लावूं नये ||१||
पेरोनियां साळी गव्हाचें तें पीक |
घ्यावया नि:शंक धावूं नये ||२||
उत्तरासारखे येते प्रतुत्तर |
करावा विचार आपणापाशी ||३||
पहावें तें दिसे दर्पणीं साचार |
आपुला आचार ओळखावा ||४||
स्वामी म्हणे होसी सर्वथैव जाण
तुझा तूं कारण सुख-दु:खा ||५||
Saturday, February 26, 2011
[३२]
हरि-नाम हरि नाम
संतीं सांगितले वर्म ||१||
हरि गावा हरि घ्यावा
हि चि माझी लोक-सेवा ||२||
नित्य हरीचे दर्शन
ते चि आत्म-पर -कल्याण ||३||
स्वामी म्हणे चराचरी |
हरि अंतरी बाहेरी
[३३]
हरि-ध्यान हरि-ध्यान |
ते चि माझे संध्या स्नान
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे योगासन
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे पंचीकरण
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे वेन्दांत-श्रवण
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे तत्व-ज्ञान
स्वामी म्हणे हरि-ध्यान
तेणे नित्य समाधान
हरि-नाम हरि नाम
संतीं सांगितले वर्म ||१||
हरि गावा हरि घ्यावा
हि चि माझी लोक-सेवा ||२||
नित्य हरीचे दर्शन
ते चि आत्म-पर -कल्याण ||३||
स्वामी म्हणे चराचरी |
हरि अंतरी बाहेरी
[३३]
हरि-ध्यान हरि-ध्यान |
ते चि माझे संध्या स्नान
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे योगासन
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे पंचीकरण
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे वेन्दांत-श्रवण
हरि-ध्यान हरि-ध्यान
ते चि माझे तत्व-ज्ञान
स्वामी म्हणे हरि-ध्यान
तेणे नित्य समाधान
[ ३० ]
अनंत ब्रह्मांडे सांठविसी पोटीं |
तो तूं भक्तिसाठीं विकलासी ||१||
काय नेणों तुज भक्ति कां आवडे |
अर्जुनाचे घोडे खाजविसी ||२||
कां गा तूं बळीचा होसी द्वारपाळ |
रानीं ध्रुव बाळ सांभाळीसी ||३||
होसी विठु धेड फेडिसी तूं देणें |
दामाजीकारणें धावं घेसी ||४|
एकनाथाघरी वाहसी कां पाणी |
शेले कोण विणी कबिराचे ||५||
चोख्यामेळ्यासंगे कोण गुरें ओढी |
डेरे कोण घडी गोरोबाचे ||६||
जनाबाईसंगे कोण दळूं लागे |
आवडीनें सांगे गुज-गोष्टी ||७||
स्वामी म्हणे देवा तूं चि विश्वंभर |
भक्तांचा चाकर स्वयें होसी ||८||
[ ३१ ]
हरि-नाम हरि-नाम |
हा चि वर्णाश्रमधर्म ||१||
हरि-नाम हरि-नाम |
हा चि माझा व्रतनेम ||२||
हरि-नाम हरि-नाम |
हा चि माझा प्राणायाम ||३||
हरि-नाम हरि-नाम |
हें चि माझे नित्य-कर्म ||४||
हरि-नाम हरि-नाम |
हें चि माझे परंधाम ||५||
स्वामी जपे हरि-नाम |
तेणे अंतरी विश्राम ||६||
अनंत ब्रह्मांडे सांठविसी पोटीं |
तो तूं भक्तिसाठीं विकलासी ||१||
काय नेणों तुज भक्ति कां आवडे |
अर्जुनाचे घोडे खाजविसी ||२||
कां गा तूं बळीचा होसी द्वारपाळ |
रानीं ध्रुव बाळ सांभाळीसी ||३||
होसी विठु धेड फेडिसी तूं देणें |
दामाजीकारणें धावं घेसी ||४|
एकनाथाघरी वाहसी कां पाणी |
शेले कोण विणी कबिराचे ||५||
चोख्यामेळ्यासंगे कोण गुरें ओढी |
डेरे कोण घडी गोरोबाचे ||६||
जनाबाईसंगे कोण दळूं लागे |
आवडीनें सांगे गुज-गोष्टी ||७||
स्वामी म्हणे देवा तूं चि विश्वंभर |
भक्तांचा चाकर स्वयें होसी ||८||
[ ३१ ]
हरि-नाम हरि-नाम |
हा चि वर्णाश्रमधर्म ||१||
हरि-नाम हरि-नाम |
हा चि माझा व्रतनेम ||२||
हरि-नाम हरि-नाम |
हा चि माझा प्राणायाम ||३||
हरि-नाम हरि-नाम |
हें चि माझे नित्य-कर्म ||४||
हरि-नाम हरि-नाम |
हें चि माझे परंधाम ||५||
स्वामी जपे हरि-नाम |
तेणे अंतरी विश्राम ||६||
Thursday, February 24, 2011
[ २८ ]
जन्मासंगे मृत्युसंगें जन्म |
चक्रनेमिक्रम ऐसा चाले ||१||
दिनमागें रात्र रात्रीपाठीं दिन |
घटिकायंत्र जाण निसर्गाचें ||२||
सुखापाठीं दु:ख दु:खापाठीं सुख |
रहाटी ही देख जगताची ||३||
स्वामी म्हणे स्थिर हरि-पद एक |
तेथें ची नि:शंक राहें सदा ||४||
[ २९ ]
आतां हा ची एक आम्हां व्यवसाय |
घ्यावे हरिपाय अंतर्यामी ||१||
संतत सन्मुख असावें श्रीमुख |
नित्य नवें सुख दर्शनाचें ||२||
सेवावें आकंठ हरिनामामृत |
भावें व्हावें रत संकीर्तनीं ||३||
प्रेमें हरिसवें बोलावें डोलावें |
अखंड भेटावें स्वामी म्हणे ||४||
जन्मासंगे मृत्युसंगें जन्म |
चक्रनेमिक्रम ऐसा चाले ||१||
दिनमागें रात्र रात्रीपाठीं दिन |
घटिकायंत्र जाण निसर्गाचें ||२||
सुखापाठीं दु:ख दु:खापाठीं सुख |
रहाटी ही देख जगताची ||३||
स्वामी म्हणे स्थिर हरि-पद एक |
तेथें ची नि:शंक राहें सदा ||४||
[ २९ ]
आतां हा ची एक आम्हां व्यवसाय |
घ्यावे हरिपाय अंतर्यामी ||१||
संतत सन्मुख असावें श्रीमुख |
नित्य नवें सुख दर्शनाचें ||२||
सेवावें आकंठ हरिनामामृत |
भावें व्हावें रत संकीर्तनीं ||३||
प्रेमें हरिसवें बोलावें डोलावें |
अखंड भेटावें स्वामी म्हणे ||४||
Wednesday, February 23, 2011
[ २६ ]
विश्वासे आपणां मानिसील थोर |
तरी तूं सत्वर थोर होसी ||१||
लेखिसील जरी आपणासी क्षुद्र |
तरी ते अभद्र पाठीं लागे ||२||
जो जो मनोभावें करिसील जप
ते ते आपेआप तुज प्राप्त ||३||
म्हणोनिया करी हरींचे चिंतन |
तेणे समाधान स्वामी म्हणे ||४||
[ २७ ]
प्रारब्ध संचित आणि क्रियमाण |
हरीसी अर्पण करोनियां ||१||
सुखे हरिपायीं राहिलो निवांत |
जाहलों निश्चिंत कर्माकर्मी ||२||
हरी-ध्यान हा ची वर्णाश्रम-धर्म |
तीर्थ व्रत नेम हरी-नाम ||३||
स्वयें आत्माराम वाहे योग-क्षेम |
ऐसें भक्त-प्रेम स्वामी म्हणे ||४||
विश्वासे आपणां मानिसील थोर |
तरी तूं सत्वर थोर होसी ||१||
लेखिसील जरी आपणासी क्षुद्र |
तरी ते अभद्र पाठीं लागे ||२||
जो जो मनोभावें करिसील जप
ते ते आपेआप तुज प्राप्त ||३||
म्हणोनिया करी हरींचे चिंतन |
तेणे समाधान स्वामी म्हणे ||४||
[ २७ ]
प्रारब्ध संचित आणि क्रियमाण |
हरीसी अर्पण करोनियां ||१||
सुखे हरिपायीं राहिलो निवांत |
जाहलों निश्चिंत कर्माकर्मी ||२||
हरी-ध्यान हा ची वर्णाश्रम-धर्म |
तीर्थ व्रत नेम हरी-नाम ||३||
स्वयें आत्माराम वाहे योग-क्षेम |
ऐसें भक्त-प्रेम स्वामी म्हणे ||४||
Tuesday, February 22, 2011
[ २४ ]
धरिसील जरी हरीसी अंतरी |
तरी चि संसारीं सुखी होसी ||१||
होता लाभ-हानि प्रियाप्रिय दोन्ही |
समान मानुनी वर्तें बापा ||२||
पुत्र-वित्त-गोत लौकिकीं समस्त |
असों दे अलिप्त चित्त सदा ||३||
पाळुनी स्वधर्म भोगीं अर्थ-काम |
गांठीं मोक्ष-धाम स्वामी म्हणे ||४||
[ २५ ]
प्रकटतां नारायण |
विश्व एकरूप जाण ||१||
द्विज गज गाय श्वान |
हीन चांडालादि वर्ण ||२||
नर-नारी सखे वैरी |
भेद-भाव ठेला दूरी ||३||
सोनें मृतिका पाषाण
सर्व जाहलें समान ||४||
स्वामी म्हणे वासुदेवें
विश्व व्यापिले स्वभावे ||५||
धरिसील जरी हरीसी अंतरी |
तरी चि संसारीं सुखी होसी ||१||
होता लाभ-हानि प्रियाप्रिय दोन्ही |
समान मानुनी वर्तें बापा ||२||
पुत्र-वित्त-गोत लौकिकीं समस्त |
असों दे अलिप्त चित्त सदा ||३||
पाळुनी स्वधर्म भोगीं अर्थ-काम |
गांठीं मोक्ष-धाम स्वामी म्हणे ||४||
[ २५ ]
प्रकटतां नारायण |
विश्व एकरूप जाण ||१||
द्विज गज गाय श्वान |
हीन चांडालादि वर्ण ||२||
नर-नारी सखे वैरी |
भेद-भाव ठेला दूरी ||३||
सोनें मृतिका पाषाण
सर्व जाहलें समान ||४||
स्वामी म्हणे वासुदेवें
विश्व व्यापिले स्वभावे ||५||
Monday, February 21, 2011
[ २२ ]
हरींचे चिंतन करीं रात्रं-दिन |
वाउगा तो क्षण जावों नेदीं ||१||
चालतां बोलतां जेवण जेवितां |
सदा देतां घेतां, हरि ध्यान ||२||
आसनीं शयनीं एकांती लोकांतीं |
आठवीं श्री-पती अखंडित ||३||
स्वामी म्हणे नित्य हरीचें दर्शन |
तेणे समाधान परिपूर्ण ||४||
[ २३ ]
लाभतां अभेद -भक्तीचें निधान |
एक चि आसन जिवा-शिवा ||१||
न होती विभक्त देव आणि भक्त |
अंतरी एकांत एकमेकां ||२||
स्व-रूपीं अभिन्न तन आणि मन |
जगीं दुजेपण उरे चि ना ||३||
अपार अभेद-भक्तीचें महिमान |
स्वामी म्हणे खूण ओळखावी ||४||
हरींचे चिंतन करीं रात्रं-दिन |
वाउगा तो क्षण जावों नेदीं ||१||
चालतां बोलतां जेवण जेवितां |
सदा देतां घेतां, हरि ध्यान ||२||
आसनीं शयनीं एकांती लोकांतीं |
आठवीं श्री-पती अखंडित ||३||
स्वामी म्हणे नित्य हरीचें दर्शन |
तेणे समाधान परिपूर्ण ||४||
[ २३ ]
लाभतां अभेद -भक्तीचें निधान |
एक चि आसन जिवा-शिवा ||१||
न होती विभक्त देव आणि भक्त |
अंतरी एकांत एकमेकां ||२||
स्व-रूपीं अभिन्न तन आणि मन |
जगीं दुजेपण उरे चि ना ||३||
अपार अभेद-भक्तीचें महिमान |
स्वामी म्हणे खूण ओळखावी ||४||
Friday, February 18, 2011
[ २१ ]
विश्वीं विश्वंभर जनीं जनार्दन |
मानिले वचन संतांचे हें||१||
सांडोनिया स्वार्थ लोक-सेवा-व्रत
आदरिलें येथ आवडींने ||२||
तों चि अवचित भेटला समर्थ |
स्वामी गणनाथ कृपार्णव ||३||
पूर्णकृपादृष्टी मातें अवलोकी |
ठेवुनी मस्तकीं कृपा-हस्त ||४|
सोsहम मंत्र गुज सांगितले कानीं |
शब्दाविण ध्वनि ऐकविला ||५||
'तत्वमसि' महावाक्य विवरुन |
ॐ काराची खुण दाखविली ||६||
पाहतां पाहतां गेलें देहभान |
झाली ओळखण स्व-रूपाची ||७||
स्वरूपीं लागली अखंड समाधि |
आटली उपाधी अविद्देची ||८||
मनाचे उन्मन होता ध्याता-ध्यान
ध्येयीं चि संपूर्ण मिसळली ||९||
गेले मी-तूं-पण एकला अभिन्न
जनी जनार्दन प्रकटला ||१०||
स्वामी म्हणे मज ऐसा साक्षात्कार
विश्वी विश्वंभर कोंदटला ||११||
विश्वीं विश्वंभर जनीं जनार्दन |
मानिले वचन संतांचे हें||१||
सांडोनिया स्वार्थ लोक-सेवा-व्रत
आदरिलें येथ आवडींने ||२||
तों चि अवचित भेटला समर्थ |
स्वामी गणनाथ कृपार्णव ||३||
पूर्णकृपादृष्टी मातें अवलोकी |
ठेवुनी मस्तकीं कृपा-हस्त ||४|
सोsहम मंत्र गुज सांगितले कानीं |
शब्दाविण ध्वनि ऐकविला ||५||
'तत्वमसि' महावाक्य विवरुन |
ॐ काराची खुण दाखविली ||६||
पाहतां पाहतां गेलें देहभान |
झाली ओळखण स्व-रूपाची ||७||
स्वरूपीं लागली अखंड समाधि |
आटली उपाधी अविद्देची ||८||
मनाचे उन्मन होता ध्याता-ध्यान
ध्येयीं चि संपूर्ण मिसळली ||९||
गेले मी-तूं-पण एकला अभिन्न
जनी जनार्दन प्रकटला ||१०||
स्वामी म्हणे मज ऐसा साक्षात्कार
विश्वी विश्वंभर कोंदटला ||११||
Thursday, February 17, 2011
[ १९ ]
देव भक्त आणि नाम |
झाला त्रिवेणी संगम ||१|
करूं भक्ती-भावें स्नान |
धन्य पावन जीवन ||२||
भेद-भाव अमंगळ |
दूर सारूं या सकळ ||३||
राम-कृष्ण-हरि मंत्र |
उच्चारू या अहोरात्र ||४||
भक्त नामीं आनंदाला |
देव अंतरीं तोषला ||५||
देव-भक्तांसी एकांती |
स्वामी म्हणे पडे मिठी ||६||
[ २० ]
हरि-रूप ध्यातां हरि-नाम गातां |
हरि चि तत्वतां झालों आम्ही ||१||
आत्मरूप आतां आघवा संसार |
ठेंली येरझार एकसरां ||२|
पावलों नैष्कर्म्य देहीं विदेहत्व |
डोळां पर-तत्व देखियेलें ||३||
स्वामी म्हणे राहूं भक्ती-सुखीं लीन |
हरिसी अर्पून भोग-मोक्ष ||४||
देव भक्त आणि नाम |
झाला त्रिवेणी संगम ||१|
करूं भक्ती-भावें स्नान |
धन्य पावन जीवन ||२||
भेद-भाव अमंगळ |
दूर सारूं या सकळ ||३||
राम-कृष्ण-हरि मंत्र |
उच्चारू या अहोरात्र ||४||
भक्त नामीं आनंदाला |
देव अंतरीं तोषला ||५||
देव-भक्तांसी एकांती |
स्वामी म्हणे पडे मिठी ||६||
[ २० ]
हरि-रूप ध्यातां हरि-नाम गातां |
हरि चि तत्वतां झालों आम्ही ||१||
आत्मरूप आतां आघवा संसार |
ठेंली येरझार एकसरां ||२|
पावलों नैष्कर्म्य देहीं विदेहत्व |
डोळां पर-तत्व देखियेलें ||३||
स्वामी म्हणे राहूं भक्ती-सुखीं लीन |
हरिसी अर्पून भोग-मोक्ष ||४||
Wednesday, February 16, 2011
[ १७ ]
कृपावंत भला सद् गुरु लाभला |
अंगीकार केला तेणे माझा ||१||
अंतरींची खुण दाखवोनी मज |
सोsहं -मंत्र गुज सांगितलें ||२||
ठायीं ची लागली अखंड समाधि|
संपली उपाधी अविद्येची ||३||
स्वामी म्हणे देव सर्वत्र संचला|
संसार तो झाला मोक्ष-मय ||४||
[ १८ ]
विषयी विरक्ति दया सर्वां भूतीं |
हरिपायीं भक्ति एकनिष्ठ ||१||
अंतरीं जयातें नित्य समाधान |
गेले मोह मान सांडोनियां ||२||
झाली पर-नारी माउलीसमान |
आणिकांचे धन विष-तुल्य ||३||
नेणे पार-निंदा न बोले अनृत |
सर्वा-भूत-हित लक्षी सदा ||४||
संतांचीं लक्षणें वर्णिता अपार |
सांगितलें सार स्वामी म्हणे ||५||
कृपावंत भला सद् गुरु लाभला |
अंगीकार केला तेणे माझा ||१||
अंतरींची खुण दाखवोनी मज |
सोsहं -मंत्र गुज सांगितलें ||२||
ठायीं ची लागली अखंड समाधि|
संपली उपाधी अविद्येची ||३||
स्वामी म्हणे देव सर्वत्र संचला|
संसार तो झाला मोक्ष-मय ||४||
[ १८ ]
विषयी विरक्ति दया सर्वां भूतीं |
हरिपायीं भक्ति एकनिष्ठ ||१||
अंतरीं जयातें नित्य समाधान |
गेले मोह मान सांडोनियां ||२||
झाली पर-नारी माउलीसमान |
आणिकांचे धन विष-तुल्य ||३||
नेणे पार-निंदा न बोले अनृत |
सर्वा-भूत-हित लक्षी सदा ||४||
संतांचीं लक्षणें वर्णिता अपार |
सांगितलें सार स्वामी म्हणे ||५||
Tuesday, February 15, 2011
Monday, February 14, 2011
[ १५ ]
बुद्धिमंत काय बोलतीं तें वायां |
' जनां सौख द्याया यंत्र-युग' ||१|
मुत्सद्दी तो मुखे शांति-पाठ गाती |
परि युध्दाअंती महायुद्ध ||२|
स्फोटक ते गोळे विषारी तो धूर |
महा-भयंकर रण-गाडे ||३||
कळीची विमानें आणि पाण-तीर |
करिती संहार मानवांचा ||४|
गुरें घरें दारे सु-रम्य नगरें |
क्षणार्धात सारें दग्ध होय ||५
स्वामी म्हणे ऐसी आसुरी संस्कृती |
करीतसे माती मानव्याची ||६|
बुद्धिमंत काय बोलतीं तें वायां |
' जनां सौख द्याया यंत्र-युग' ||१|
मुत्सद्दी तो मुखे शांति-पाठ गाती |
परि युध्दाअंती महायुद्ध ||२|
स्फोटक ते गोळे विषारी तो धूर |
महा-भयंकर रण-गाडे ||३||
कळीची विमानें आणि पाण-तीर |
करिती संहार मानवांचा ||४|
गुरें घरें दारे सु-रम्य नगरें |
क्षणार्धात सारें दग्ध होय ||५
स्वामी म्हणे ऐसी आसुरी संस्कृती |
करीतसे माती मानव्याची ||६|
Sunday, February 13, 2011
[ १३ ]
भक्तांसी साचार विश्वाचा संसार
परि अहंकार नसे चित्ती ||१||
स्वयें विश्व-रूप होऊनी आपण
साधिती कल्याण जगताचें ||२||
मोक्ष-रूप हातीं घेउनी संपत्ती
जनालागीं देती भक्ती-पंथे ||३||
भक्तीचें भूषण मस्तकीं धारण |
करी नारायण स्वामी म्हणे ||४||
[ १४ ]
जीव-शिवाचा संयोग
हाचि माझा राज-योग ||१||
भेद-भाव हारपला |
हरि एकला संचला ||२||
दूर झाली आधि-व्याधी |
लागे अखंड समाधि ||३||
स्वामी बैसला स्व-स्थानीं
हरि-रूप ध्यानीं मनीं
भक्तांसी साचार विश्वाचा संसार
परि अहंकार नसे चित्ती ||१||
स्वयें विश्व-रूप होऊनी आपण
साधिती कल्याण जगताचें ||२||
मोक्ष-रूप हातीं घेउनी संपत्ती
जनालागीं देती भक्ती-पंथे ||३||
भक्तीचें भूषण मस्तकीं धारण |
करी नारायण स्वामी म्हणे ||४||
[ १४ ]
जीव-शिवाचा संयोग
हाचि माझा राज-योग ||१||
भेद-भाव हारपला |
हरि एकला संचला ||२||
दूर झाली आधि-व्याधी |
लागे अखंड समाधि ||३||
स्वामी बैसला स्व-स्थानीं
हरि-रूप ध्यानीं मनीं
Saturday, February 12, 2011
[ ११ ]
नाशिवंत देह पुत्र वित्त गेह |
अल्प हि संदेह नाहीं मज ||१|
विश्व सर्व जाण काळाचे भक्ष्यान्न |
प्रत्यक्ष प्रमाण देखतसें ||२||
जारज अंडज स्वदेज उद्वीज |
जन्म हें चि बीज विनाशाचें ||३||
अज अविनाश हरि-पद एक |
झालों मी सेवक स्वामी म्हणे ||४||
[ १२ ]
हरि-रूप जाण मृत्तिका पाषाण |
ग्रह तारांगण हरि-रूप ||१||
अथांग सागर अनंत आकाश |
पावन निःशेष हरि-रूप ||२||
मन बुद्धी अहं अष्टधा प्रकृती |
मूळमाया-व्यक्ती हरि-रूप ||३||
एकला चि हरि नांदे सर्वां घटीं
आदि -मध्य-अंती स्वामी म्हणे ||४||
नाशिवंत देह पुत्र वित्त गेह |
अल्प हि संदेह नाहीं मज ||१|
विश्व सर्व जाण काळाचे भक्ष्यान्न |
प्रत्यक्ष प्रमाण देखतसें ||२||
जारज अंडज स्वदेज उद्वीज |
जन्म हें चि बीज विनाशाचें ||३||
अज अविनाश हरि-पद एक |
झालों मी सेवक स्वामी म्हणे ||४||
[ १२ ]
हरि-रूप जाण मृत्तिका पाषाण |
ग्रह तारांगण हरि-रूप ||१||
अथांग सागर अनंत आकाश |
पावन निःशेष हरि-रूप ||२||
मन बुद्धी अहं अष्टधा प्रकृती |
मूळमाया-व्यक्ती हरि-रूप ||३||
एकला चि हरि नांदे सर्वां घटीं
आदि -मध्य-अंती स्वामी म्हणे ||४||
Friday, February 11, 2011
[ ९ ]
शब्दांचे पांडित्य कल्पनेच्या गोष्टी |
वाउगी चावटी करूं नये ||१||
तेणे पोटीं उठे दंभ अभिमान |
आत्म-समाधान दूर राहे ||२||
गोडी कळावया द्यावा गूळ खाया |
देव ओळखावा स्वानुभव ||३|
स्वामी म्हणे नाही पांडित्याचे काम
स्वयें आत्माराम दाखवावा ||४||
[ १० ]
बोलती संतांनी बुडविला देश |
भक्तीचा उपदेश करोनियां ||१|
कार्य-कारणाचा संबंध जोडिती |
आपुलाल्या मतीं जैसा तैसा ||२||
भक्तीनें साचार विश्वाचा उद्धार |
ऐसा साक्षात्कार मज आला ||३||
स्वामी म्हणे धन्य साधु-संत-जन |
तयांसी शरण जातां भलें
शब्दांचे पांडित्य कल्पनेच्या गोष्टी |
वाउगी चावटी करूं नये ||१||
तेणे पोटीं उठे दंभ अभिमान |
आत्म-समाधान दूर राहे ||२||
गोडी कळावया द्यावा गूळ खाया |
देव ओळखावा स्वानुभव ||३|
स्वामी म्हणे नाही पांडित्याचे काम
स्वयें आत्माराम दाखवावा ||४||
[ १० ]
बोलती संतांनी बुडविला देश |
भक्तीचा उपदेश करोनियां ||१|
कार्य-कारणाचा संबंध जोडिती |
आपुलाल्या मतीं जैसा तैसा ||२||
भक्तीनें साचार विश्वाचा उद्धार |
ऐसा साक्षात्कार मज आला ||३||
स्वामी म्हणे धन्य साधु-संत-जन |
तयांसी शरण जातां भलें
Thursday, February 10, 2011
[ ७ ]
राम कृष्ण हरि गोविंद |
मना लागो हा चि छंद ||१||
भक्ती-भावें रात्रं-दिन
घडो चित्ता हरि-चिंतन ||२||
हरि-नामे पडो कानीं
हरि-नाम गर्जो वाणी ||३||
दृष्टीलागीं एक मात्र
हरि दिसों दे सर्वत्र ||४||
स्वामी म्हणे सर्वथैव
हरिपायी जडो जीव ||५||
[ ८ ]
हरि-रूप जाण व्यापक संपूर्ण |
गिळोनि त्रि-गुण राहिलेंसे ||१||
जयाचिया पोटीं सामावली सृष्टि |
नाना जीव-कोटी असंख्यात ||२||
शून्याचें जे सार प्रकृत माहेर
अवीट अक्षर परात्पर ||३||
व्याप्य-व्यापकता नुरे चि तत्वतां |
अवघी हरि-सत्ता स्वामी म्हणे ||४||
राम कृष्ण हरि गोविंद |
मना लागो हा चि छंद ||१||
भक्ती-भावें रात्रं-दिन
घडो चित्ता हरि-चिंतन ||२||
हरि-नामे पडो कानीं
हरि-नाम गर्जो वाणी ||३||
दृष्टीलागीं एक मात्र
हरि दिसों दे सर्वत्र ||४||
स्वामी म्हणे सर्वथैव
हरिपायी जडो जीव ||५||
[ ८ ]
हरि-रूप जाण व्यापक संपूर्ण |
गिळोनि त्रि-गुण राहिलेंसे ||१||
जयाचिया पोटीं सामावली सृष्टि |
नाना जीव-कोटी असंख्यात ||२||
शून्याचें जे सार प्रकृत माहेर
अवीट अक्षर परात्पर ||३||
व्याप्य-व्यापकता नुरे चि तत्वतां |
अवघी हरि-सत्ता स्वामी म्हणे ||४||
Wednesday, February 9, 2011
[ ५]
सद्गुरू गणनाथ उदार समर्थ |
घाली नयनांत ज्ञानांजन ||१||
सहज-समाधि सांपडलें धन
लाचावलें मन तया ठायी ||२||
चालतां बोलतां न ढळे आसन |
न भंगे तें मौन कदा काळीं ||३||
स्वामी म्हणे लाभे अवीट आनंद
लागलासे छंद स्वरूपाचा ||४||
[ ६ ]
शरण जातां रमा-वरा |
सर्व सुखें आलीं घरा ||१||
ॠध्दि-सिध्दी उभ्या दासी |
सदा सादर सेवेसी ||२||
धन्य जाहलो संसारीं |
हरी-रूप नर-नारी ||३||
स्वामी म्हणे सौख्य-कंद |
वसे अंतरी गोविंद ||४||
सद्गुरू गणनाथ उदार समर्थ |
घाली नयनांत ज्ञानांजन ||१||
सहज-समाधि सांपडलें धन
लाचावलें मन तया ठायी ||२||
चालतां बोलतां न ढळे आसन |
न भंगे तें मौन कदा काळीं ||३||
स्वामी म्हणे लाभे अवीट आनंद
लागलासे छंद स्वरूपाचा ||४||
[ ६ ]
शरण जातां रमा-वरा |
सर्व सुखें आलीं घरा ||१||
ॠध्दि-सिध्दी उभ्या दासी |
सदा सादर सेवेसी ||२||
धन्य जाहलो संसारीं |
हरी-रूप नर-नारी ||३||
स्वामी म्हणे सौख्य-कंद |
वसे अंतरी गोविंद ||४||
Tuesday, February 8, 2011
[ ३ ]
अंतर्बाह्य राम झालो पूर्ण-काम |
देखियेले ब्रह्म मूर्तिमंत ||१||
आनंदाला जीव भेटला केशव
गेलो भवार्णव तरोनियां ||२||
काम क्रोध लोभ दंभ मोह मान
अवघें नारायण-रूप झालें ||३||
काय वाचा मन केलें कृष्णार्पण |
गेले मी-तू-पण स्वामी म्हणे ||४||
[ ४ ]
निर्भय निश्चित निवांत निरार्त
रतलेंसे चित्ता हरिपायीं ||१||
सांडिला संसार व्हावया उध्दार |
केली सारासार-विचारणा ||२||
होई-कृपाबळें लढला सत्संग |
सापडला मार्ग स्वानंदाचा ||३||
स्वामी म्हणे मज आकळलें गुज |
देखिले सहज आत्म-रूप ||४||
अंतर्बाह्य राम झालो पूर्ण-काम |
देखियेले ब्रह्म मूर्तिमंत ||१||
आनंदाला जीव भेटला केशव
गेलो भवार्णव तरोनियां ||२||
काम क्रोध लोभ दंभ मोह मान
अवघें नारायण-रूप झालें ||३||
काय वाचा मन केलें कृष्णार्पण |
गेले मी-तू-पण स्वामी म्हणे ||४||
[ ४ ]
निर्भय निश्चित निवांत निरार्त
रतलेंसे चित्ता हरिपायीं ||१||
सांडिला संसार व्हावया उध्दार |
केली सारासार-विचारणा ||२||
होई-कृपाबळें लढला सत्संग |
सापडला मार्ग स्वानंदाचा ||३||
स्वामी म्हणे मज आकळलें गुज |
देखिले सहज आत्म-रूप ||४||
Monday, February 7, 2011
|| ॐ राम कृष्ण हरि ||
[ १ ]
भक्ताचे अंतरी सांवळा श्रीहरी |
सुखे वास करी सर्वकाळ ||१||
म्हणोनी तयासी विश्व हरि-रूप
झाले आपेंआप अखंडित ||२||
हरि-रूप काय हरि-रूप माया
हरि-रूप जाया-पुत्र-वित्त ||३||
हरि-रूप कर्म हरि-रूप धर्म |
भक्तीचे हे वर्म स्वामी म्हणे ||४||
[ 2 ]
कैंचा भक्त कैंचा देव |
हरि-रूप झाले सर्व ||१||
देव-भक्तां पडे मिठी |
अंतर्बाह्य जगजेठी ||२||
सर्वां ठायीं सर्वां घटीं |
हरि नांदे पाठीं पोटीं ||३||
एक झाले मी-तूं-पण |
स्वामी म्हणे भलें मौंन ||४||
[ १ ]
भक्ताचे अंतरी सांवळा श्रीहरी |
सुखे वास करी सर्वकाळ ||१||
म्हणोनी तयासी विश्व हरि-रूप
झाले आपेंआप अखंडित ||२||
हरि-रूप काय हरि-रूप माया
हरि-रूप जाया-पुत्र-वित्त ||३||
हरि-रूप कर्म हरि-रूप धर्म |
भक्तीचे हे वर्म स्वामी म्हणे ||४||
[ 2 ]
कैंचा भक्त कैंचा देव |
हरि-रूप झाले सर्व ||१||
देव-भक्तां पडे मिठी |
अंतर्बाह्य जगजेठी ||२||
सर्वां ठायीं सर्वां घटीं |
हरि नांदे पाठीं पोटीं ||३||
एक झाले मी-तूं-पण |
स्वामी म्हणे भलें मौंन ||४||
Sunday, February 6, 2011
updated List for Topics
Vibhute Prasanna 10/3/2011
Sohoni Shailesh 10/31/2010
Reddy Dayakar 12/5/2011
Rangole Ujwala 1/2/2011
Rangole Hemant 2/6/2011
Pandhare Shekhar 3/6/2011
Kulkarni Suyog 4/3/2011
Kothekar Dilip 5/1/2011
Gole Neelima 6/6/2011
Gole Dilip 7/3/2011
Bidwai Pankaj 8/7/2011
Sawant Bipin 9/4/2011
Bhavana Patil 10/2/2011
Ajit Gore 11/6/2011
Sohoni Shailesh 10/31/2010
Reddy Dayakar 12/5/2011
Rangole Ujwala 1/2/2011
Rangole Hemant 2/6/2011
Pandhare Shekhar 3/6/2011
Kulkarni Suyog 4/3/2011
Kothekar Dilip 5/1/2011
Gole Neelima 6/6/2011
Gole Dilip 7/3/2011
Bidwai Pankaj 8/7/2011
Sawant Bipin 9/4/2011
Bhavana Patil 10/2/2011
Ajit Gore 11/6/2011
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