[६४]
मूळ नाभि-स्थानीं जन्म पावे ध्वनि |
ती चि परा वाणी ओळखावी ||१||
हृदयी ची जाण पश्यन्तीचे स्थान |
कंठीं ओळखण मध्यमेची ||२||
मुखें जो उच्चार वैखरी साचार |
ऐशा वाणी चार जाणोनियां ||३||
परेहुनी पर राहे परात्पर |
पाहे निरंतर स्वामी म्हणे ||४||
[६५]
गुरुकृपेवीण नाहीं आत्म-ज्ञान |
वाउगा तो शीण साधनांचा ||१||
सहज साधन गुरु-कृपा जाण |
जीवाचें कल्याण तेणें होय ||२||
गुरु माता -पिता गुरु चि देवता |
गुरु मुक्ती-दाट ऐसें मानी ||३||
गुरु सेवेविण जावों नेदीं क्षण |
तेणे तो प्रसन्न स्वामी म्हणे ||४||
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