Wednesday, March 23, 2011

[८२]
असो अश्म-युग असो यंत्र-युग |
आम्हां नित्य योग हरिपायीं ||१||
हरि हा प्राचीन हरि हा अर्वाचीन |
हरि चिरंतन एकला चि ||२||
हरि तळीं वरी हरि मागें पुढे |
हरि चोहींकडे अंतर्बाह्य ||३||
अमूर्ताची मूर्ति आदि-मध्य-अंती |
हरि सर्व भूतीं स्वामी म्हणे ||४||

[८३]
अंगी सत्व बळावतां |
देव-दर्शनी उत्कंठा ||१||
होय ज्ञानाची जागृती |
होय सद्भावाची स्फूर्ती ||२||
विषय-भोग नावडती |
रुचे संतांची संगति ||३||
लौकिकाचा वाटे त्रास |
सुख एकांती जीवास ||४||
सहज बाणे सदाचार |
अंती आत्म-साक्षात्कार ||५||
सत्व गुणांची लक्षणे |
ऐसी जाण स्वामी म्हणे ||६||

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