Tuesday, May 24, 2011

[१७७]
सांगे प्राण्या कां गा होसी वेडा पिसा |
श्रीहरि कोंवसा भाविकांसी ||१||
हरिकृपेविण संसाराची व्यथा |
न फिटे सर्वथा ऐसें जाण ||२||
जाय मनोभावें हरीसी शरण |
तेणे उद्धरण होय तुझें ||३||
स्वामी म्हणे हा चि निर्धारिता पंथ |
संसारी परमार्थ जोडसील ||४||

[१७८]
संतांसी सद्भावे करोनी प्रणिपात |
कांहीं आत्महित विचारावे ||१||
काय ती विरक्ती कैसी आत्म-स्थिती |
ज्ञानाची प्रचीती कैसी होय ||२||
कैसी हरी-भक्ती कैसी शरणागती |
नामाची महती कैसी होय ||३||
स्वामी म्हणे संत दावितील खुण |
घ्यावी ओळखून ज्याची त्यानें ||४||

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