Sunday, May 22, 2011

[१७३]

होता अंतर्यामी ज्ञानाची जागृती |
जीव-जगत्-भ्रांति दूर ठेली ||१||
कर्मजात आतां प्रकृतीच्या माथा |
लावुनी तत्वतां मुक्त झालों ||२||
जन्म-मरणाची लोपली ते वार्ता |
सुखें आलें हातां ब्रह्म-पद ||३||
स्वामी म्हणे चारी देहांते निरसून |
झालों आम्ही पूर्ण ब्रह्म-रूप ||४||

[१७४]
"सांगा का जावे संतांसी शरण |
काय संतांविण ज्ञान नाही ||१||
कशासाठीं व्हावी संतांची मध्यस्थी |
आम्ही ब्राह्मी-स्थिती स्वयें गाठूं" ||२||
नका बोलूं ऐसें पावाल पतन |
तुम्हा अभिमान नागवील ||३||
स्वामी म्हणे संत ब्रह्म मूर्तिमंत |
विश्व-कल्याणार्थ वावरती ||४||

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