[१४९]
करीं गा निष्काम स्वकर्माचरण |
नामसंकीर्तन विठ्ठलाचें ||१||
आत्म-निरीक्षण किंवा धरीं ध्यान |
स्वीकारी साधन आवडे तें ||२||
साधनी निमग्न राहें रांत्र-दिन |
तेणे होय जान चित्त-शुद्धी ||३||
होता चित्त-शुद्धी लाभे आत्म-ज्ञान |
ज्ञानें समाधान स्वामी म्हणे ||४||
[१५०]
अंतरी संतत करीं सोsहं ध्यान |
न जाई गुंतून संसारांत ||१||
धन सुत दर असूं दे पसारा
नको देऊं थारा आसक्तीतें ||२||
होवो हानि-लाभ पावो सुख-दु:ख |
न सोडीं विवेक साक्षित्वाचा ||३||
स्वामी म्हणे राहे देही उदासीन |
पाहे रांत्र-दिन आत्म-रूप ||४||
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