Friday, May 6, 2011

[१५१]
एक वासुदेव नांदे चराचारी |
त्याविण दुसरी वस्तु नाही ||१||
वासुदेव येथें वासुदेव तेथे |
व्यापितो सर्वातें वासुदेव ||२||
व्याप्त तो व्यापक सर्व सर्वात्मक |
सर्वातीत एक वासुदेव ||३||
ध्याता ध्यान ध्येय वासुदेवमय |
एक तो अद्वय स्वामी म्हणे ||४||

[१५२]
अंतरी विरक्ती नाहीं भाव-भक्ति |
तया अधोगती चुके चि ना ||१||
लोळती शेणांत सुखें शेणकिडे |
तैसे ते बापुडे प्रपंचांत ||२||
गुंतुनिया देहीं बुडाले संदेही |
अंती तयां नाही समाधान ||३||
भाव-भक्ती हीन कोरडे कठीण |
जळो तें जीवन स्वामी म्हणे ||४||

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