Monday, July 4, 2011

[२५५]
' अहं देह ' वृत्ती पावते विनाश |
येतां उदयास आत्म-ज्ञान ||१||
अज्ञानाचा नाश करोनियां ज्ञान |
होतसे विलीन आत्म-रुपीं ||२||
' अहं आत्मा ' ह्या हि वृत्तीची निवृत्ती |
आत्म-रूप-स्थिती ती चि जाण ||३||
स्वामी म्हणे कैंची प्रवृत्ती-निवृत्ती |
शब्दातीत स्थिती स्वरूपाची ||४||

[२५६]
नाना रुपी विश्वीं नटलेंसे भासे |
परी एक असे आत्म-रूप ||१||
जैसे सान थोर होती अलंकार |
परी तें साचार सुवर्ण चि ||२||
वस्त्री ओत-प्रोत तंतु चि केवळ |
तरंगी तें जळ अभिन्नत्वें ||३||
स्वामी म्हणे तैसे विश्वी निरंतर |
स्थिर अविकार आत्म-तत्व ||४||

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