[२४९]
देसी तरी देईं देवा मजप्रति |
संतांची संगती सर्वकाळ ||१||
हे चि एक मज पुरे वर-दान |
न मागे ह्याहून दुजें कांही ||२||
आवडीनें जीव जडो संतांपायी |
भावें घडो कांही सेवा त्यांची ||३||
स्वामी म्हणे रंगे नित्य संत संगे |
होईन निजांगें शांति-रूप ||४||
[२५०]
भलें देवा मज केलेंसी दुर्बळ |
तेणें चि निर्मळ जाहलों मी ||१||
कैसें नेणें तुझे झालें विस्मरण |
बळानें संपन्न होतों जेव्हां ||२||
शरीर सबळ असो वा दुर्बळ |
तुज सर्व काळ आठवीन ||३||
स्वामी म्हणे मन करोनियां शुद्ध |
तुझ्या चि सन्निध राहेन मी ||४||
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment