[१८९]
राम-नाम येता कानीं |
होय पातकांची धुनी ||१||
राम-नाम घेता वाचे |
होय सार्थक देहाचें ||२||
राम-नामाचे स्मरण |
होता , चुके जन्म-मरण ||३||
उच्चारितां राम-नाम |
स्वामी झाला पूर्ण-काम ||४||
[१९०]
जों जों धरी प्रपंचाची आस |
तों तों त्याचा फांस दृढावतो ||१||
जों जों राहे जीवी प्रपंची उदास |
तों तों त्याचा फास ढिला होय ||२||
कां गा जासी वृथा प्रपंची गुंतून |
पाहे विचारून सारासार ||३||
स्वामी म्हणे देहीं उदास राहून |
करी सोडवण तुझी तूं ची ||४||
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