[२१९]
म्हणता 'माझा' देह मी तों नव्हे देह |
आहें नि :संदेह आत्म-रूप ||१||
सुख-दु:ख वार्ता देहाचिया माथां |
लावुनी तत्वतां वेगळा मी ||२||
गेले क्रिया-कर्म ठेले धर्माधर्म |
कळों आलें वर्म परमार्थाचें ||३||
स्वामी म्हणे गेला देह-अहंकार |
झाला साक्षात्कार स्व-रूपाचा ||४||
[२२०]
पाहों जातां मूळ अहंता तत्वतां |
उरे आत्म-सत्ता एकली चि ||१||
तेथे अहं सोsहं नुरे वृत्ती-भेद |
स्फुरे चिदानंद एकला चि ||२||
जाणीव नेणीव गळे द्वैत-भाव |
खेळे स्वयमेव प्र-ब्रह्म ||३||
स्वामी म्हणे मूळीं झाला वृत्ती-लोप
विश्व आत्म-रूप तयालागीं ||४||
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