Tuesday, June 21, 2011

[२२९]
बाह्य सुखालागी धांवतो हा जीव |
यंत्र-युगे हांव वाढवली ||१||
अंतरींच्या सुखा होउनी पारखा |
दु:खाचिया नरकामाजीं पडे ||२||
करावया क्रांति सत्याग्रही वीर |
पुढें येती धीर धरोनियां ||३||
स्वामी म्हणे होय सत्याचा विजय |
सत्य तें निर्भय आदि-अंती ||४||

[२३०]
यंत्र-युगे माजला आकांत |
बळावला प्रांत दुर्जनांचा ||१||
शास्त्रज्ञांचे शोध योजिती उन्मत्त |
साधावया घात दुर्बलांचा ||२||
लोभ अहंकार वाढती अपार |
नीति-धर्म थार नुरे कोठें ||३||
पाशवी संस्कार घालिती ते पिंगा |
गुप्त झाली गंगा मानव्याची ||४||
स्वामी म्हणे नाहीं स्वरूपाचा शोध |
व्यर्थ तो प्रबोध शास्त्रज्ञांचा ||५||

No comments:

Post a Comment