Friday, April 29, 2011

[१३७]
एक चि हरि-रूप सर्वत्र संचले |
व्यापुनी राहिले त्रैलोक्यासी ||१||
एक हरिविण दुजें नाही कांही |
जीव-जगत् पाहीं मायाजन्य ||२||
मिथ्या माया जाण मिथ्या नाम रूपें |
एकला स्वरूपें हरि नांदे ||३||
व्याप्त न व्यापक वाच्य ना वाचक |
एक तें नि:शंक स्वामी म्हणे ||४||

[१३८]
सद्वस्तु अव्यक्त अनादि अनंत |
अचळ अचुत्य अद्वितीय ||१||
निष्क्रिय निर्लिप्त अज अविकार |
अक्षय्य अपार निरालंब ||२||
अरूप अरंग अवीट अभंग |
निर्गुण नि:संग निर्विशेष ||३||
स्वामी म्हणे कैसें करावे वर्णन |
स्वीकारावे मौन हें चि भले ||४||

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