Tuesday, February 22, 2011

[ २४ ]
धरिसील जरी हरीसी अंतरी |
तरी चि संसारीं सुखी होसी ||१||
होता लाभ-हानि प्रियाप्रिय दोन्ही |
समान मानुनी वर्तें बापा ||२||
पुत्र-वित्त-गोत लौकिकीं समस्त |
असों दे अलिप्त चित्त सदा ||३||
पाळुनी स्वधर्म भोगीं अर्थ-काम |
गांठीं मोक्ष-धाम स्वामी म्हणे ||४||

[ २५ ]
प्रकटतां नारायण |
विश्व एकरूप जाण ||१||
द्विज गज गाय श्वान |
हीन चांडालादि वर्ण ||२||
नर-नारी सखे वैरी |
भेद-भाव ठेला दूरी ||३||
सोनें मृतिका पाषाण
सर्व जाहलें समान ||४||
स्वामी म्हणे वासुदेवें
विश्व व्यापिले स्वभावे ||५||

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