Thursday, March 31, 2011

[९८]
अखंड एकांत आवडे जीवास |
लौकिकाचा त्रास वाटतसे ||१||
लावोनियां मन देवाचें चिंतन |
वाटे रात्रं-दिन करावेंसें ||२||
देहाचा अभिमान गळवा संपूर्ण |
भावें व्हावें लीन हरि-पायीं ||३||
स्वामी म्हणे घ्यावें हरिचें दर्शन |
नावडे त्याविण दुजें काहीं ||

[९९]
देतसे व्याख्यान सांगे ब्रह्मज्ञान |
पोटी अभिमान पांडित्याचा ||१||
स्वानुभवविण डोलावुनी मान |
वंचितो आपण आपणातें ||२||
वाउगा तो शीण वृथा शब्द-ज्ञान |
नाही समाधान अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं बाणली विरक्ती |
तरी आत्म-प्राप्ति कैसी होय ||४||

Wednesday, March 30, 2011

[९६]
देवा तूं सागर मी तुझी लहरी |
दोघांसी अंतरी भेद नाही ||१||
देवा तूं सुवर्ण मी तुझें भूषण |
दोघां एकपण ठाईचें चि ||२||
देवा तू चंद्रमा मी तुझी चंद्रिका |
आम्हां एकमेकां अभिन्नत्व ||३||
देवा तूं प्रदीप मी तुझा प्रकाश |
नांदूं सावकाश स्वामी म्हणे ||४||

[९७]
सांडुनी फलाशा स्व-कर्म आदरीं |
गीतेमाजीं हरि उपदेशी ||१||
साधितां स्व-कर्म होते चित्त-शुद्धी |
तेणे मोक्ष-सिद्धी लाभतसे ||२||
जोवरी अंतरी नाहीं आत्म-ज्ञान |
तोंवरी साधन कर्म हें चि ||३||
स्वामी म्हणे जाण होता आत्मज्ञान |
कर्माचे बंधन राहे चि ना ||४||

Tuesday, March 29, 2011

[९४]
कां गा माझा तुज न ये कळवळा |
उदार दयाळा पांडुरंगा ||१||
दर्शनाची आस लागली जीवास |
झालों कासावीस तुजविण ||२||
दाटला हा गळा लागे न तो डोळा |
वाहे घळघळां अश्रुधारा ||३||
उतावीळ मन सुटूं पाहे भान |
दाखवीं चरण स्वामी म्हणे ||४||

[९५]
रूप चतुर्भुज सुंदर सावळे |
आजि म्यां देखिलें श्रीहरीचें ||१||
चरण सुकुमार कांसे पितांबर |
वैजयंती-हार कंठीं साजे ||२||
सुहास्य-वदन राजीव-लोचन |
मस्तकीं भूषण मुकुटाचें ||३||
शंख चक्र गदा पद्म करीं शोभे |
सन्मुख हें उभें स्वामी म्हणे ||४||

अभंग क्रं ९२,९३,९४ - स्वामीजींना सगुण दर्शनाचा १ ते १.५ वर्षे जो ध्यास लागला होता त्या काळात हे अभंग रचले गेले , त्या नंतर त्यांच्या जीवन चरित्रात जो सगुण साक्षात्काराचा प्रसंग आहे त्या नंतर अभंग क्रं ९५ रचला गेला .

Monday, March 28, 2011

[९२]
रूप चतुर्भुज तुवां चक्र-पाणि |
ध्रुव मधु-वनीं दाविले जे ||१||
तें चि देखावया भुकेले हे डोळे |
काय सांगो झाले उतावीळ ||२||
लडिवाळपणें घेतलीसे आळी |
बाळ मी माउली तूं चि माझी ||३||
तुजपासी आता काय धरूं भीड |
पुरवीं माझे लाड स्वामी म्हणे ||४||

[९३]
रूप तुझे देवा दाखवीं केशवा |
मुकुंद माधवा नारायणा ||१||
अच्युता अनंता कृष्ण दामोदरा |
गोविंदा श्रीधरा ह्रषीकेशा ||२||
हरि-जनार्दना रुक्मिणी-रमणा |
देवकी-नंदना वासुदेवा ||३||
स्वामी म्हणे मज हा चि निदिध्यास |
पूर्ण करीं आस दर्शनाची ||४||

Sunday, March 27, 2011

[९०]
करावा विचार आपुला आपण |
कोण मी कोठून जन्मा आलों ||१||
जन्मोनिया काय करावें उचित |
बरवे हिताहित विचारावे ||२||
देहातीं मागुतें कोठें जाणें असे |
काय विश्व कैसें होय जाय ||३||
स्वामी म्हणे यत्नें ऐसा घेतां शोध |
होतसे प्रबोध अंतर्यामी ||४||

[९१]
स्वच्छंद निर्मल वाहतो निर्झर |
आम्हां साक्षात्कार गोविंदाचा ||१||
करी गुंजारव पंकजीं भ्रमर |
आम्हांसी गजर हरि-नामाचा ||२||
उद्यानी कोकिळ गातसे संगीत |
आम्हां हरि-गीत आवडे तें ||३||
अखंड गंभीर गर्जतो सागर |
आम्हां सोsहं-स्वर स्वामी म्हणे ||४||

Saturday, March 26, 2011

[८८]
माझें मजपाशी सापडलें धन |
आनंदले मन आत्म-रंगी ||१||
सोडवेना मज नित्य नवी गोष्ट ||२||
सेवितों आवडी ब्रह्म-रस |
सन्निध तें परी होतें दुरावले |
गुरु-कृपा-बळे आंगवलें ||३||
प्राणाचा प्रणव मनाचें उन्मन |
होता समाधान स्वामी म्हणे ||४||

[८९]
मन हें चंचळ धावे वाऱ्यावरी |
तयासी आवरी अभ्यासानें ||१||
विषयांचे सुख नाशिवंत देख |
अविनाशी एक आत्म-रूप ||२||
ऐसा सारासार करावा विचार |
सार तें साचार दाखवावें ||३||
स्वामी म्हणे मना आत्म-सुखी गोडी |
लावितां आवडी स्थिरावेल ||४||

Friday, March 25, 2011

[८६]
आणिकांचे सुख देखोनि जो सुखी |
होय धन्य लोकी तो चि संत ||१||
आणिकांचे दु:ख देखोनियां डोळां |
येई कळवळा तो चि संत ||२||
आणिकांचे दोष आणी न जो मनीं |
गुणातें वाखाणी तो चि संत ||३||
लोककल्याणार्थ वेंची जो जीवित |
संत तो महंत स्वामी म्हणे ||४||

[८७]
दु:खाचा डोंगर आदळो कां शिरीं |
जयासी अंतरी खेद नाही ||१||
प्राप्त झाली सिद्धी पावला समृद्धी |
तरी आत्म-बुद्धी भंग नाही ||२||
नेणे निंदा-स्तुती नेणे भव-भ्रांती |
राहे-आत्म स्थिती अखंडित ||३||
नित्य आत्म-तृप्त निर्भय निश्चिंत |
तो चि प्रज्ञावंत स्वामी म्हणे ||४||

Thursday, March 24, 2011

[८४]
बळावतां रजोवृत्ती |
होय कर्माची प्रवृत्ती ||१||
उठावती काम क्रोध |
जीव होतेसे मदांध ||२||
पोटीं लोभ अनिवार |
न देखे तो सारासार ||३||
मांडी कर्माचा पसारा |
नसे सुख-संतोषा थारा ||४||
स्वामी म्हणे रजोगुण |
दु:ख देतसे दारूण ||५||

[८५]
अंगी वाढे तमोगुण |
तदा फांकते अज्ञान ||१||
जीव होय मोह-ग्रस्त |
लक्ष नाहीं राहे सुस्त ||२||
मंद आळशी खादाड |
सदा निद्रेची झांपड ||३||
कर्म करी तैं प्रमाद |
किती होती नाहीं शुद्ध ||४||
स्फूर्तिहीन अंत:करण |
स्वामी म्हणे तो पाषाण ||५||

Wednesday, March 23, 2011

[८२]
असो अश्म-युग असो यंत्र-युग |
आम्हां नित्य योग हरिपायीं ||१||
हरि हा प्राचीन हरि हा अर्वाचीन |
हरि चिरंतन एकला चि ||२||
हरि तळीं वरी हरि मागें पुढे |
हरि चोहींकडे अंतर्बाह्य ||३||
अमूर्ताची मूर्ति आदि-मध्य-अंती |
हरि सर्व भूतीं स्वामी म्हणे ||४||

[८३]
अंगी सत्व बळावतां |
देव-दर्शनी उत्कंठा ||१||
होय ज्ञानाची जागृती |
होय सद्भावाची स्फूर्ती ||२||
विषय-भोग नावडती |
रुचे संतांची संगति ||३||
लौकिकाचा वाटे त्रास |
सुख एकांती जीवास ||४||
सहज बाणे सदाचार |
अंती आत्म-साक्षात्कार ||५||
सत्व गुणांची लक्षणे |
ऐसी जाण स्वामी म्हणे ||६||

Tuesday, March 22, 2011

[८०]
पोटी एक ओठी दुजें |
हें तों घातक सहजे ||१||
जरी वाटे लाभ झाला
नव्हे तो परिणामीं भला ||२||
सत्य बोलाया कारणे |
मनोधैर्य संपादणे ||३||
तुज कशाचे गा भय |
कोण नेते तुझे काय ||४||
करी बुद्धीचा निश्चय |
अंती सत्याचा निश्चय ||५||
स्वामी म्हणे सत्याचरण |
देई आत्म-समाधान ||६||

[८१]
बैसुनी विमानीं आकाशी उड्डाण |
करूं येतें जन यंत्र युगी ||१||
हिंडविती नौका सागराच्या पोटीं |
विद्दुत् द्वारा देती संदेश ते ||२||
साधाया कल्याण नाना शोध जाण |
लाविती विज्ञान शास्त्रवेत्ते ||३||
अंतरी सद्भाव असेल जागृत |
तरी यंत्रे हित स्वामी म्हणे ||४||

Monday, March 21, 2011

[७८]

आम्ही हरी-दास प्रपंचीं उदास |
आम्हां निदिध्यास श्रीहरिचा ||१||
जनीं मनीं एक हरी-रूप पाहूं |
हरि-गुण गाऊं आवडीनें ||२||
नाम-संकीर्तानीं हरीसंगे डोलूं |
भाव-बळें बोलूं गुज-गोष्टी ||३||
एकू हरि-गीत सेवू नामामृत |
भेटूं अखंडित स्वामी म्हणे ||४||

[७९]
हरि-रूप सान हरि-रूप थोर |
नाही पारावर हरि-रूपा ||१||
हरि-रूप येथें हरि-रूप तेथें |
व्यापुनी सर्वातें हरि राहे ||२||
स्वरूपीं अरूप असे हरि-रूप |
विश्वीं विश्वरूप हरि दिसे ||३||
सगुण-निर्गुण हरि-रूप जाण |
एक चि परिपूर्ण स्वामी म्हणे ||४||

Sunday, March 20, 2011

[७६]

आणिकांते वाटे संसाराचें भय |

आम्हांसी तो होय सुख-रूप ||१||

संतत अंतरी राहे श्रीगोपाळ |

बापुडा तो काळ आम्हांपुढे ||२||

सेवेसाठी सुखे साहूं गर्भवास |

होऊ हरि-दास जन्मोजन्मी ||३||

स्वामी म्हणे भावें करूं संकीर्तन |

सवें थोर-सान घेवोनियां ||४||



[७७]

प्रपंची विचार करीं सारासार |

राहें निरंतर सावधान ||१||

स्वभावतां पावे जे जे सुख-दु:ख |

त्याचा हर्ष शोक मानू नको ||२||

प्रसंगी असावें अंगी धैर्य-बळ |

लोभें उतावीळ होऊं नको ||३||

स्वधर्मानुसार वर्तोनी साचार |

होई भव-पार स्वामी म्हणे ||४||

Saturday, March 19, 2011

[७४]
पडे त्यासी पडो विश्वाचें हें कोडें |
आम्हांसी उघडें आत्म-रूप ||१||
एक आत्म-रूप सर्वत्र संचले |
नाही त्यावेगळें दुजे काहीं ||२||
जळीं स्थळीं काष्ठी पाषाणीं संपूर्ण |
आत्म-रूप जन प्रकटले ||३||
आत्म-रूप दृष्टी आत्म-रूप सृष्टी |
आत्मा पाठी-पोटी स्वामी म्हणे ||४||

[७५]
वेदांताचे सार सांगतों साचार |
नका वारंवार पुसो आता ||१||
सत्य एक आत्मा नित्य निर्विकार |
जाणा चराचर मायाभास ||२||
दिसे जें लोचना भासे जें जें मना |
तें तें मिथ्या जाणा माया-रूप ||३||
विश्व आणि माया एक चि अभिन्न |
जाणा ही चि खूण स्वामी म्हणे ||४||

Friday, March 18, 2011

[७२]
अंतरी स्वानंद असे स्वयंसिद्ध |
परी मति-मंद भोगी चि ना ||१||
समाधी-निधन असता सन्निध |
झालासे मोहांध पाहे चि ना ||२||
अखंड भजन चाले रांत्र -दिन |
तेथे सावधान राहे चि ना ||३||
सद् गुरु वाचून नाही आत्म-ज्ञान |
जाईना शरण स्वामी म्हणे ||४||

[७३]
प्रपंचाकारणे केली आटापीट |
परी यातायात चुके चि ना ||१||
माझें माझें म्हणुनी बांधियलें गांठी |
परी ते शेवटी कामा नये ||२||
कन्या पुत्र वित्त आप्त गण-गोत |
सांडुनी समस्त जावें लागे ||३||
हरि-नाम एक येईल सांगाती |
तारील तें अंती स्वामी म्हणे ||४||

Thursday, March 17, 2011

[७०]
चित्त-शुद्धीचा उपाय |
सदा चिंतावे हरि-पाय ||१||
पोटी व्ह्वावा अनुताप |
मुखें हरि-नाम जप ||२||
हरि-नाम गातां गीती |
होय पापाची निष्कृती ||३||
चित्ती उपजे सद्भाव |
स्वामी म्हणे भेटे देव |४||
[७१]
नको वेदाभ्यास करावा सायास |
उपास-तापास देह-दंड ||१||
नको धुम्र-पान पंचाग्नी-साधन |
नको तीर्थाटन काशी गया ||२||
नको मंत्र-तंत्र जप-जाप्य अर्चा |
वेदान्ताची चर्चा करावया ||३||
अखंड अंतरी सहज-स्फुरण |
तेथे ठेवीं मन स्वामी म्हणे ||४||

Wednesday, March 16, 2011

[६८]
आवडीने भावे हरि-नाम गावे |
निर्लज्ज नाचावे संकीर्तनीं ||१||
रंगतां कीर्तनीं लागते समाधी |
होते योग-सिद्धी अनायासें ||२||
नसे तरी नसो वेदांताचें ज्ञान |
नाम संकीर्तन सोडूं नये ||३||
स्वामी म्हणे भावें आकळे वेदांत |
भेटे मूर्तिमंत पर-ब्रह्म ||४||

[६९]
नाम-संकीर्तन जीवासी आवडे |
मन-बुद्धी जडे हरि-पायीं ||१||
हरि नामापुढें अमृत थोकडें |
तुच्छ तें बापुडें स्वर्ग-सुख ||२||
नको कर्म-कांड नको ब्रह्म-ज्ञान |
नको न्यावा प्राण ब्रह्मांडाते ||३||
भाव-बळे आम्हा हरिचें दर्शन |
नित्य समाधान स्वामी म्हणे ||४||

Tuesday, March 15, 2011

[६६]
नेणे विधी ना निषेध |
नेणे पाप-पुण्य-बंध ||१||
नेणे लौकिक-संबंध |
जगीं वागतो स्वच्छंद ||२||
घर दार ना संसार
सदा राहे निराधार ||३||
स्वामी म्हणे संत-जन
तया कैचें जगद्भान ||४||

[६७]
सगुण निर्गुण एकरूप जाण |
ओळखावी खूण स्वानुभवें ||१||
नित्य निराकार निर्गुण एकलें |
तें चि प्रकटलें विश्व-रूपें ||२||
बीजीं सामावला वृक्षाचा विस्तार |
तैसें चराचर निराकारीं ||३||
स्वामी म्हणे ज्वाळा वन्हीसी अभिन्न |
सगुण-निर्गुण तैसें मानी ||४|

Monday, March 14, 2011

[६४]
मूळ नाभि-स्थानीं जन्म पावे ध्वनि |
ती चि परा वाणी ओळखावी ||१||
हृदयी ची जाण पश्यन्तीचे स्थान |
कंठीं ओळखण मध्यमेची ||२||
मुखें जो उच्चार वैखरी साचार |
ऐशा वाणी चार जाणोनियां ||३||
परेहुनी पर राहे परात्पर |
पाहे निरंतर स्वामी म्हणे ||४||

[६५]
गुरुकृपेवीण नाहीं आत्म-ज्ञान |
वाउगा तो शीण साधनांचा ||१||
सहज साधन गुरु-कृपा जाण |
जीवाचें कल्याण तेणें होय ||२||
गुरु माता -पिता गुरु चि देवता |
गुरु मुक्ती-दाट ऐसें मानी ||३||
गुरु सेवेविण जावों नेदीं क्षण |
तेणे तो प्रसन्न स्वामी म्हणे ||४||

Sunday, March 13, 2011

[६२]
सत्याचे दर्शन घडावे संपूर्ण |
ध्येय हे लक्षून जीवनाचे ||१||
प्रेम-अहिंसेचे घेवोनिया व्रत |
लोक-सेवा-रत राहे सदा ||२||
शस्त्रविण करी दुष्टाचा प्रतिकार |
न घेई माघार प्राणांतीं हि ||३||
स्वामी म्हणे त्या होउनी प्रसन्न |
देई जनार्दन शांति-सुख ||४||

[६३]
स्वरूपीं तल्लीन साधु-संत-जन |
अंतरी प्रसन्न अखंडित ||१||
निंदा आणि स्तुति समान लेखिती |
सोनें आणि माती एकरूप ||२||
नाही माया पाश नाहीं राग-द्वेष |
नाहीं तयां क्लेश संसाराचा ||३||
स्वामी म्हणे विश्वीं नाही दुजेपण |
सर्वत्र संपूर्ण आत्म-रूप ||४||

Saturday, March 12, 2011

[६०]
नको व्रत नेम नको तीर्थाटन |
हरिसी शरण जय वेगें ||१||
नको योग-याग नको भोग-त्याग
हरि-नाम चांग दृढ धरीं ||२||
नको मंत्र-तंत्र नको कर्म-धर्म |
घेई हरि-नाम भक्तिभावें ||३||
स्वामी म्हणे नको नाना देह-दंड |
चालवी अखंड नाम-घोष ||४||

[६१]
लोक-सेवा व्रत आचरिती भावें |
तयांतें मानावें भाग्यवंत ||१||
लोक-सेवेसाठी सत्यातें स्मरून |
करिती ते दान सर्वस्वाचें ||२||
त्या चि सेवा-व्रतें तोषे जगन्नाथ |
शुद्ध करी चित्त सेवकाचे ||३||
स्वामी म्हणे तेणे लाभे आत्म-ज्ञान |
जनी जनार्दन प्रकटतो ||४||

Friday, March 11, 2011

[५८]
बाळपणीं खेळ यौवनी विलास |
वार्धक्यीं जीवास व्याधी चिंता ||१||
बाळपणीं शाळा तारुण्यीं संसार |
वार्धक्यीं जोजार तयाचा चि ||२||
जन्मुनियां वायां कष्टविली काया |
स्व-हित साधाया वेळ नाही ||३||
स्वामी म्हणे मोहें विसरला देव |
तयासी विसावा कैंचा अंती ||३||
[५९]
बाळकाची भूक कळे माउलीतें |
बोलावुनी देते स्तन-पान ||१||
तैसें माझें हित जाने जगन्नाथ |
तेणे मी निश्चिंत सर्वकाळ ||२||
भाव-बळें देव आपुलासा केला |
कृपाळु तो भला सांभाळितो ||३||
स्वामी म्हणे खेळ खेळतो लडिवाळ |
खेळवी गोपाळ प्रेम-भरें ||४||

Thursday, March 10, 2011

[५६]
काम-क्रोधलोभ-दार हें तिहेरी |
घोर यम-पुरी पाववितें ||१||
तेणें आत्म-नाश होतसे निभ्रांत |
सांगतो श्री-कांत गीतेमाजीं ||२||
सोडी आडवाट धरी जो सत्पंथ |
दृढ-भावें चित्त देवोनियां ||३||
आत्म्याचें कल्याण साधुनी तो जाण |
पावतो निर्वाण स्वामी म्हणे ||४||

[५७]
कधीं खाई तूप-रोटी
कधी राहे अर्धपोटी ||१||
कधीं झोपे गादीवरी |
कधीं घोंगडी अंथरी ||२||
कधीं लोकरीची शाल |
कधीं पांघरी वाकळ ||३||
कधीं हवेली सुंदर |
कधीं चंद्र -मौळी घर ||४||
कधीं सज्जनांची भेट |
कधीं नाठाळाशीं गाठीं ||५||
कधीं गळा पुष्प-हार |
कधीं निंदेचा भडिमार ||६||
कधीं सुखाचा संसार |
कधीं हिंडे दारोदार ||७||
स्वामी म्हणे आत्म-स्थित |
संत सुख दु:खातीत ||८||

Wednesday, March 9, 2011

[५४]
बैसे अधांतरी उभा अग्नीवरी |
सांगे देशांतरी काय चाले ||१||
बोले तें तें घडे ऐसे चि रोकडे |
दावी लोकांपुढे चमत्कार ||२||
वश केल्या सिद्धी पावला प्रसिद्धी |
लागली उपाधी लौकिकाची ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं आत्म-साक्षात्कार |
काय चमत्कार दावोनियां ||४||

[५५]
दावी चमत्कार त्यासी नमस्कार |
लोक-व्यवहार ऐसा असे ||१||
स्वभावें साचार रची चराचर |
त्याचा जयजयकार कोण करी ||२||
स्व-रूपीं विलीन साधू-संत-जन |
तयांचे चरण कोण धरी ||३||
स्वामी म्हणे जना कृत्रिमाची गोडी |
नसे चि आवडी स्वाभाविकीं ||४||

Tuesday, March 8, 2011

[५२]
भावे हरी-नाम धरिसील कंठीं |
तरी चि वैकुंठीं वास घडे ||१||
एक वेळ पडे हरि-नाम कानीं |
पातकांची खाणी दग्ध होय ||२||
हरि-नाम सार हरि-नाम सार |
तेणें चि भव-पार पावसील ||३||
स्वामी म्हणे अंतीं हरि-नाम एक |
तारील नि:शंक तुजलागीं ||४||

[५३]
वेद-वेदांताचे संपादुनी ज्ञान |
देतसे व्याख्यान लोकांपुढे ||१||
अद्वैत-वेदांत मांडितो सिद्धांत |
देउनी दृष्टांत नानाविध ||२||
भला थोर ज्ञाता ऐसी कीर्ति होतां |
आला स्वर्ग हात ऐसें वाटे ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं आत्म-समाधान |
व्यर्थ अभिमान पांडित्याचा ||४||

Monday, March 7, 2011

[५०]
हरि-नामाचे पवाडे |
गातां सनकादिक वेडे ||१||
तेथे मी एक बापुडें |
किती गाऊं वाडेंकोडें ||२||
हरि-नामाची महती |
गातां वेद मौनावती ||३||
तेथे काय माझी मति |
स्वामी म्हणे वर्णूं किती ||४||

[५१]
आता काय मज संन्यासाचे काज |
निजांतरीं गुज प्रकटले ||१||
प्रकटतां घडे सहज-संन्यास |
नैष कर्म्य-पदास गांठियेले ||२||
करोनि अकर्ता भोगोनी अभोक्ता |
विश्वीं आत्म-सत्ता नांदतसे ||३||
स्वामी म्हणे आता जाहलों नि:संग |
त्याग आणि भोग दूर ठेले ||४||

Sunday, March 6, 2011

[४८]
सेवावा एकांत सुखे वारंवार |
जन संगे फार बोलो नये ||१||
आणिकांची निंदा नायकावी कानी |
पर-द्रव्य मनीं आणों नये ||३||
पर-स्त्री चे ठायीं सदा मातृ-भाव |
असों द्यावा ठाव दयेलागीं ||३||
स्वामी म्हणे दक्ष रहावें साधनी |
सद्भावें लक्षोनी हरिपाय ||४||

[४९]
भावें हरि-नाम उच्चारितां वाचे |
कोटि कल्मषांचे भस्म होय ||१||
हरीनाम मंत्र जपा अहोरात्र |
अंतरी पवित्र तेणें तुम्हीं ||२||
सानंद सोल्हास करा नाम-घोष |
तेणे भव-पाश दूर होय ||३||
चुके अधोगति लाभे चिर-शांति |
जिवासी विश्रांती स्वामी म्हणे ||४||

Saturday, March 5, 2011

[४६]
सोडिला संसार जोडिला संन्यास |
पालटिला वेष बाह्यात्कारीं ||१||
अंतरी मी-माझे बाळगिले ओझें |
तरी ती सहजे विटंबना ||२||
वाटला संन्यास घ्यावा ज्या कारणे |
तेथें लक्ष उणे कामा नये ||३||
स्वामी म्हणे मन होतां कृष्णार्पण
संसारी असोन संन्यासी तो ||४||

[४७]
करी थोडे बोले फार
त्याचा बुडाला संसार ||१||
वस्तु विकी जो उधार |
त्याचा बुडाला व्यापार ||२||
विचारी ना सारासार |
त्याचा बुडाला आचार ||३||
स्वामी म्हणे अहंकार |
तेथे कैंचा आत्मोद्धार ||४||

Friday, March 4, 2011

[४४]
ज्ञानदेव एकनाथ |
आले स्वामी रामतीर्थ ||१||
तुकाराम रामदास |
रामकृष्ण परमहंस ||२||
माता शारदा तापसी |
आली जगदबांदासी ||३||
स्वामी विवेकानंद हे |
आले मथुरबाबू पाहें ||४||
मेहेर बाबा उपासनी |
आले भक्त योगी मुनी ||५||
आला ख्रिस्त आला बुध्द |
आला महात्मा प्रसिद्ध ||६||
जगद् गुरु कृष्णमुर्ति |
प्रभू गौरांग प्रभृति ||७||
साधु संत भक्त यती |
नित्यनेमें येथें येती ||८||
प्रेमें पासीं बैसवितों
आप्त मित्र पाचारितों ||९||
आणि तयाचे संगतीं |
गुरु सांगती त्या रीतीं ||१०||
ठेवोनियां भाव-भक्ति |
हरिपाय ध्यातो चित्तीं ||११||
गेले गेले देह-भान |
हरिपायी झालो लीन ||१२||
स्वामी म्हणे ध्याता ध्यान |
हरि-रूप परिपूर्ण ||१३||



[४५]
मन हे चंचळ स्वभावें ओढाळ |
धांवे रानोमाळ आवरे ना ||१||
गांजितो संसार सोशितो जोजार |
परि अहंकार वोसरे ना ||२||
स्व-रुपीं आनंद असे स्वयं-सिद्ध |
धुंडाळी मोहांध आढळे ना ||३||
गुरु-कृपेविण आकळे ना खुण |
व्हावें सावधान स्वामी म्हणे ||४||

Thursday, March 3, 2011

[४२]
सोनें आणि लेणें एक चि तत्वतां |
तैसी आत्मसत्ता विश्वरूप ||१||
तरंग आणि सागर एक चि साचार
तैसा विश्वाकार आत्म-मय||२||
ज्वाला आणि अग्न एक चि संपूर्ण |
भूतांसी अभिन्न आत्मतत्व ||३||
स्वामी म्हणे जैसा कापुरीं सुवास |
तैसा श्रीनिवास विश्वीं वसे ||४||

[४३]
प्रपंच-विटाळापासुनी मोकळा |
झालो मी सोवळा आत्म-रूप ||१||
नाम रूप कुळ सांडोनी सकळ |
झालों मी केवळ आत्म-रूप ||२||
भेद-भाव मळ गेला अमंगळ |
झालों मी निर्मळ आत्म-रूप ||३||
जळांत कमळ तैसा उपाधींत |
राहतो अलिप्त स्वामी म्हणे ||४||

Wednesday, March 2, 2011

[४०]
वेदांती तो बोले सृष्टी मिथ्या ऐसें |
भक्ता ती चि दिसे हरि-रूप ||१||
वेदांती ओळखे मिथ्या मायाभास |
हरीचा विलास भक्त म्हणे ||२||
दोहीचा भावार्थ सारिखा तत्वतां |
एक चि हरि-सत्ता सर्वां ठायीं ||३||
भक्ती तो चि ज्ञानी ज्ञानी तो चि भक्त |
जाणावा सिद्धान्त स्वामी म्हणे ||४||

[ ४१]
हरिपायी धांव घेतां उठाउठी |
आड उभे ठाती कामक्रोध ||१||
असों द्यावा चित्तीं एकनिष्ठ भाव |
भक्तालागीं देव सांभाळितो ||२||
स्वयें जगन्नाथ साधकाचा हात |
धरोनियां नीट चालवितो ||३||
साधकाकारणें घडे हें बोलणे |
ज्याचें तोचि जाणे स्वामी म्हणे ||४||

Tuesday, March 1, 2011

[३८]
चित्त असों द्यावें निवांत प्रसन्न |
कल्पांती हि खिन्न होऊं नये ||१||
अंतरी असावा अखंड उल्हास |
आपत्तीचा त्रास मानूं नये ||२||
संसारी रहावे अलिप्त उदास |
मोहे माया-पाश जोडूं नये ||३||
स्वामी म्हणे व्हावा ईश्वरी विश्वास |
संतांचा सहवास सोडूं नये ||४||

[३९]
'नेति' 'नेति' ऐसें बोलती ते वेद |
जाहले नि:शब्द पर-तत्वीं ||१||
मोकळें न बध्द एकलें न दुजें
नांदतें सहजें आत्म-पणे ||२||
शून्य ना संपूर्ण मूर्त न अमूर्त |
भावाsभावातीत महाशून्य ||३||
ते चि आम्हा भलें अंतरी लाभले |
गुरु-कृपा-बळें स्वामी म्हणे ||४||