Tuesday, May 31, 2011

[१८७]
झालो ब्रह्म ऐसें बोलतां अहंता |
स्पर्शे पाहे चित्ता म्हणोनियां ||१||
मन बुद्धीसहित समर्पिले चित्त |
राहिलों निवांत हरिपायीं ||२||
आतां अहं सोsहं मावळलें भान |
अवघें नारायण रूप झालें ||३||
स्वामी म्हणे ऐसें भक्तीचें महिमान |
ओळखावी खूण स्वानुभवें ||४||

[१८८]
नाम-जपे जाप जळोनियां पाप |
होय आपेआप आत्म-शुद्धी ||१||
नाम-जपें जाय काम क्रोध भय |
होय मनोजय अनायासें ||२||
जपा हरि-नाम जपा हरि-नाम |
मार्ग हा सुगम वैकुंठींचा ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही नामें चि सबळ |
कांपे कळिकाळ आम्हांपुढे ||४||

Saturday, May 28, 2011

[१८५]
नका बोलों ऐसें झालो ब्रह्मज्ञानी |
ब्रह्म वोलांडुनि वेगळें चि ||१||
झोपलों मी म्हणे असे चि तो जागा |
कळों आले जगा आपेंआप ||२||
झालों म्हणे मुका तो चि तो बोलका |
कळों आलें लोका आपेंआप ||३||
आम्ही झालो म्हणे तें चि तया न्यून |
मौन हीं चि खूण स्वामी म्हणे ||४||

[१८६]
दीन मी अभागी होऊनी भिकारी |
कैसा दारोदारीं हिंडतसें ||१||
मी चि भाग्यवंत होऊनी सधन |
वाटीतसें अन्न याचीकांते ||२||
मी चि नर-नारी संन्यासी संसारी |
नाना वेषधारी मी चि एक ||३||
स्वामी म्हणे झालों मी चि चराचर
नांदतों साचार एकला चि ||४||

Friday, May 27, 2011

[१८३]
आघवा संसार झाला मोक्ष-मय |
होता ज्ञानोदय अंतर्यामी ||१||
लाधले सकल साधनांचे फळ |
भेटला गोपाल अखंडित ||२||
काम क्रोध लोभ निमाले संपूर्ण |
झाले समाधान अनिर्वाच्य ||३||
स्वामी म्हणे आता बैसलो निवांत |
हरिपायी चित्त लावोनिया ||४||

[१८४]
जगीं जो का बळी तो चि कान पिळी |
थोर मासा गिळी लहानतें ||१||
कां गा लुबाडावे दीन असहाय |
साजे का हा न्याय मानवतें ||२||
हे चि काय सांगें बुद्धीचें लक्षण |
करावे भक्षण दुर्बळांचें ||३||
स्वामी म्हणे ज्याचें ध्येय सर्वोदय |
धन्य तो चि होय मानवांत

Thursday, May 26, 2011

[१८१]
होतां कृष्णार्पण सर्व हि व्यापार ||
देही अहंकार राहे कैचा ||१||
करता करविता एकला श्रीहरि |
भाव हा अंतरी दृढावला ||२||
होवो निंदा-स्तुति न धरूं ती चित्तीं |
आळवूं श्री-पति भक्ति-भावे ||३||
स्वामी म्हणे जाता भक्तीचिया वाटे |
बोंचती न काटे विकल्पाचे ||४||

[१८२]
नको नको मना धनाचा अभिमान |
तेणें जनार्दन रुष्ट होय ||१||
नको नको मना लौकिकाचा पाश |
तेणें जगदिश दुरावेल ||२||
नको नको मना संसारी आसक्ती |
तेणें तो श्री-पति अंतरेल ||३||
स्वामी म्हणे मना होई गा तूं भृंग |
नित्य रमा-रंग-पाद-पद्मी ||४||

Wednesday, May 25, 2011

[१७९]
सद् गुरु-चरण उपासिता जाण |
आंगवाले ज्ञान विज्ञानेंसी ||१||
आता कोठें काहीं राहिले ना न्यून |
अवघे परिपूर्ण एकलेंचिं ||२||
एक ना जे दुजें शून्य ना संपूर्ण |
देखयेली खुण महा-शून्यीं ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही न पडों संदेही |
देही चि विदेही आत्मरूप ||४||

[१८०]
अनाथांचा नाथ पतित पावन |
सज्जन-जीवन वासुदेव ||१||
दुर्बलांचा वाली सखा दीन-बंधू |
कारुण्याचा सिंधु वासुदेव ||२||
शरणागता हात देई सदोदित |
संतांचे दैवत वासुदेव ||३||
स्वामी म्हणे देव भाविका माउली |
कृपेची साउली करीतसे ||४||

Tuesday, May 24, 2011

[१७७]
सांगे प्राण्या कां गा होसी वेडा पिसा |
श्रीहरि कोंवसा भाविकांसी ||१||
हरिकृपेविण संसाराची व्यथा |
न फिटे सर्वथा ऐसें जाण ||२||
जाय मनोभावें हरीसी शरण |
तेणे उद्धरण होय तुझें ||३||
स्वामी म्हणे हा चि निर्धारिता पंथ |
संसारी परमार्थ जोडसील ||४||

[१७८]
संतांसी सद्भावे करोनी प्रणिपात |
कांहीं आत्महित विचारावे ||१||
काय ती विरक्ती कैसी आत्म-स्थिती |
ज्ञानाची प्रचीती कैसी होय ||२||
कैसी हरी-भक्ती कैसी शरणागती |
नामाची महती कैसी होय ||३||
स्वामी म्हणे संत दावितील खुण |
घ्यावी ओळखून ज्याची त्यानें ||४||

Monday, May 23, 2011

[१७५]
गुरु तो ची देव ऐसा ठेवीं भाव |
सद् गुरू -गौरव काय वानूं ||१||
तो चि ज्ञान-मूर्ती ब्रह्मानंद-स्थिती |
देई परा शांती भाविकांते ||२||
भक्ती-भावें जातां तयासी शरण |
होते ओळखण स्व-रुपाची ||३||
स्वामी म्हणे वंदी सद् गुरु-पाऊलें |
भलें आकारले प्र-ब्रह्म ||४||

[१७६]
सोsहं सोsहं ध्यास लागता जीवास |
होतसे निरास संमोहाचा ||१||
त्रिगुणाचे भान हारपे मीपण |
होता सोsहं ध्यान निरंतर ||२||
अंती एकमय ध्याता ध्यान ध्येय |
होता ज्ञानोदय अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे मग स्वानंदाचा भोग
होय तो हि साड्ग सुखरूप ||४||

Sunday, May 22, 2011

[१७३]

होता अंतर्यामी ज्ञानाची जागृती |
जीव-जगत्-भ्रांति दूर ठेली ||१||
कर्मजात आतां प्रकृतीच्या माथा |
लावुनी तत्वतां मुक्त झालों ||२||
जन्म-मरणाची लोपली ते वार्ता |
सुखें आलें हातां ब्रह्म-पद ||३||
स्वामी म्हणे चारी देहांते निरसून |
झालों आम्ही पूर्ण ब्रह्म-रूप ||४||

[१७४]
"सांगा का जावे संतांसी शरण |
काय संतांविण ज्ञान नाही ||१||
कशासाठीं व्हावी संतांची मध्यस्थी |
आम्ही ब्राह्मी-स्थिती स्वयें गाठूं" ||२||
नका बोलूं ऐसें पावाल पतन |
तुम्हा अभिमान नागवील ||३||
स्वामी म्हणे संत ब्रह्म मूर्तिमंत |
विश्व-कल्याणार्थ वावरती ||४||

Saturday, May 21, 2011

[१७१]
अंतरी भजन चाले रांत्र-दिन |
तेणें समाधान अनिर्वाच्य ||१||
नित्य नाम-जप होतो आपेंआप |
तया सुख माप कोण करी ||२||
शब्दाविण ध्वनी करोनी श्रवण |
ठेवी अनुसंधान आत्म-रुपी ||३||
स्वामी म्हणे खूण घ्यवी ओळखून |
संतांसी शरण जावोनियां ||४||

[१७२]
पाहे ज्याची दृष्टी सर्वत्र श्रीहरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||१||
रामकृष्ण हरि उच्चारी वैखरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||२||
आठवी श्रीहरी नित्य ह्रदंतरी |
भक्त तो संसारी भाग्यवंत ||३||
स्वामी म्हणे भक्तीपासी चारी मुक्ती |
भाग्य नाहीं मिती भक्ताचिया ||४||

Friday, May 20, 2011

[१७०]
एक झाला सत्ताधारी |
एक घालितो चाकरी ||१||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||२||
एक राजा एक रंक |
एक ज्ञाता एक मूर्ख ||३||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||४||
एक श्रेष्ठ एक हीन |
एक सुदृढ एक क्षीण ||५||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||६||
एक तृप्त एक भुकी |
एक सुखी एक दु:खी ||७|
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||८||
कृपा करी एकावरी |
देव एकाते अव्हेरी ||९||
कुणाचे हि न चले बळ|
कर्म तैसें भोगी फळ ||१०||

Monday, May 16, 2011

[१६८]
हरि-रूप ध्याऊं हरि-रूप पाहूं |
अखंडित राहूं हरिपायीं ||१||
सेवू नामामृत होऊं या पुनीत |
गाऊ हरि-गीत आवडीने ||२||
तन-मन-धन हरिसी अर्पून |
घालूं लोटांगण भक्ती-भावें ||३||
स्वामी म्हणे लावूं सार्थकीं जीवन |
हरिसी शरण जावोनियां ||४||

[१६९]
सांगे कां गा जासी स्तुतीसी भाळून |
जगीं तुझ्यावीण दुजें कोण ||१||
एकोनिया निंदा कां गा होसी खिन्न |
जगीं तुझ्यावीण दुजें कोण ||२||
तूं ची तुझा बंधू तूं ची तुझा वैरी |
तुझा तूं विचारीं दुजें कोण ||३||
कोणाशीं गा द्वेष कोणावरी लोभ |
एकला स्वयंभ तुझा तूं चि ||४||
स्वामी म्हणे पाहे आपणा आपण |
विश्वीं दुजेपण राहे कैचें ||५||

Sunday, May 15, 2011

[१६६]
जनासी घरदार कुटुंब-संसार |
आम्ही दिगंबर ठायीचे चि ||१||
जनासी अधिकार वैभवाची हांव |
आम्हा रूप नांव ते हि नको ||२||
जन अपेक्शिती धन मान कीर्ती |
आम्हांलागीं क्षिती नाहीं त्याची ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही झालों कानफाटे |
चालों उफराटे जगामाजीं ||४||

[१६७]
नाथ-संप्रदायी आम्ही कानफाटे |
जाऊं नका वाटे आमुचिया ||१||
मन-पवनाची घालोनियां गांठ |
करूं वाताहत संसाराची ||२||
देहासवें पुसूं लौकीकाचे नांव |
नेदूं उरों ठाव जीवासी हि ||३||
स्वामी म्हणे तुम्हां बुडवू महा-शून्यीं |
गगनासी आटणी होये जेथे ||४||

Saturday, May 14, 2011

[१६४]
साधकें सर्वदा असावे सावध |
यत्ने काम-क्रोध आवरावे ||१||
अंतरी जागृत ठेवावा विवेक |
लक्षूनियां एक आत्म-रूप ||२||
विश्वासें करावा हरिनामोच्चार |
होता अनावर काम-क्रोध ||३||
स्वामी म्हणे हा ची निर्वाणींचा बाण |
तेणे निर्दालन षड्रिपूंचें ||४||

[१६५]
घडे जे स्वभावें कर्म तें आघवें |
भावे समर्पावे हरिपायीं ||१||
देता घेता करता भोक्ता नारायण |
भाव परिपूर्ण असों द्यावा ||२||
तेणें शुभाशुभ-कर्माचें बंधन |
न लागता जाण मोक्ष-लाभ ||३||
स्वामी म्हणे भक्तीपासीं चारी मुक्ती |
ऐसी चि प्रचीती आली मज ||४||
[१६२]
आठ हि प्रहर संसार व्यवहार |
करी ना विचार दुजा कांही ||१||
नाठविता देव नाचरितां धर्म |
अर्थ आणि काम भोगूं पाहे ||२||
अर्थ अनर्थासी होवुनी कारण |
कामे केला दीन बापुडा तो ||३||
स्वामी म्हणे अंती साधिला ना स्वार्थ |
जिणे गेले व्यर्थ पामराचें ||४||

[१६३]
रामकृष्ण परमहंस |
थोर जगदंबेचा दास ||१||
कालीमातेचे चिंतन |
करी भावें रात्रं-दिन ||२||
जगन्माते संगे बोले |
माता सांगे तैसा चाले ||३||
कालीमातेचा प्रख्यात
भक्त योगी ज्ञानवंत ||४||
स्वामी म्हणे होता भेटी |
नेत्री प्रेमाश्रु दाटती ||५||

Thursday, May 12, 2011

[१६०]
वासुदेवमय विश्व हें आघवें |
भ्रांतीचे निनांवें शून्याकार ||१||
नाम-स्वरूपातीत वसे वासुदेव |
विश्वी स्वयमेव एकला चि ||२||
प्रभा आणि भानू एक चि संपूर्ण |
पट तंतुहून भिन्न काई ||३||
सगुण निर्गुण तैसा नारायण |
भूतांसी अभिन्न स्वामी म्हणे ||४||


[१६१]
एक चि तत्वतां आत्म-रूप-सत्ता |
भूतांसी भिन्नता उरे कोठे ||१||
काय काळोखातें ओळखितो सूर्य |
तेजें लोक-त्रय प्रकाशी जो ||२||
अमृत तें जाणे काइ मृत्यू वार्ता |
चंद्रा दाहकता असे ठावी ? ||३||
स्वामी म्हणे होतां स्वरूपी तद्रूप |
लोपे आपेआप द्वैताभास ||४||

Wednesday, May 11, 2011

[१५८]
तीन पाउलांत व्यापिला त्रि-लोक |
काय तें कौतुक वामनाचें ||१||
झाला द्वार-पाळ बळीचा पाताळीं |
भक्तातें सांभाळी सर्वकाळ ||२||
वामनाचे पायीं ठेवोनियां डोई |
भक्ती-भावे होई लीन आतां ||३||
सर्वस्वाचे दान देतां वामनातें |
उरे न मनातें चिंता कांही ||४||
स्वामी म्हणे दान मागतो वामन |
त्यासी मीपण समर्पिले ||५||

[१५९]
वासुदेवविण न देखे दर्शन |
वासुदेवी मन स्थिरावले ||१||
आता अंतर्बाह्य वसे वासुदेव |
नसे रिता ठाव अणुमात्र ||२||
काय विश्व कोठें गेले मीतूंपण |
हारपलें भान एकाएकी ||३||
देवभक्तपण करोनी निर्माण |
आपुला आपण खेळतसे ||४||
स्वामी म्हणे झालो वासुदेवी लीन |
भावें लोटांगण घालोनिया ||५||

Tuesday, May 10, 2011

[१५७]
एकशे छप्पन अभंग रचोन |
पहाया म्हणोन दिले संतां ||१||
संती संतोषून डोलाविली मान |
परी एक न्यून दाखविलें ||२||
"अनिर्दिष्टनाम काव्य गमे उणें |
केली मिठाविणे पाक-सिद्धी ||३||
अभंगाशेवटीं नामाचा निर्देश |
करणे सुयश जोडावया " ||४||
संतांहातीं ऐसा पाठवी निरोप |
माझा माय-बाप वासुदेव ||५||
संतांचे वचन मानुनी प्रमाण |
न्यून केले पूर्ण हरि-कृपें ||६||
लक्षुनी भावार्थ अभंग समस्त |
पुनरपि साद्दन्त संशोधिले ||७||
अभंगाशेवटी नामाची योजना |
केली जनार्दना तोषवाया ||८||
स्वामी म्हणे माझा सखा नारायण |
कोठें काहीं न्यून पडों नेदी ||९||

Monday, May 9, 2011

[१५५]
मना तुजप्रती एक ची विनंती |
आळवी श्रीपती आवडीनें ||१||
हरि पदाबुंजीं होवुनी भ्रमर |
करी निरंतर गुंजराव ||२||
श्रीहरि चंद्रमा होई तूं चकोर |
सेवी गा मधुर सुधा-रस ||३||
श्रीहरि माउली बाळ तूं होवून
करी स्तन-पान स्वामी म्हणे ||४||

[१५६]
तुजलागीं मना ऐसा विज्ञापना |
भावे जनार्दना आठवावें ||१||
विषयांची भीड येवो नेदीं आड |
करी गा अखंड हरी-ध्यान ||२||
तोडी देह-बंध लौकिक -संबंध |
जोडी सौख्य-कंद वासुदेव ||३||
स्वामी म्हणे नाहीं काळाचे हि भय |
होतां चि तन्मय वासुदेवीं ||४||

Saturday, May 7, 2011

[१५३]
सखा माझा नारायण |
करी चिंता निवारण ||१||
मज सांवरितां हरि |
आलीं विघ्नें दूर करी ||२||
दोष जाळूनी समस्त |
शुद्ध करी माझें चित्त ||३||
तो ची लक्षी माझें हित |
स्वामी म्हणे मी निश्चिंत ||४||

[१५४]
भासे मृगजळ तैसें चि केवळ |
विश्व हे सकळ भ्रांतिरूप ||१||
रज्जूवरी व्हावा सर्पाचा आभास |
तैसा विश्वाभास आत्मरूपीं ||२||
वांझेची संतति तैसी भूतसृष्टी |
व्हावी जैसी वृष्टी खपुष्पांची ||३||
स्वामी म्हणे वश्व नश्वर मायिक |
अविनाशी एक आत्म-रूप ||४||

Friday, May 6, 2011

[१५१]
एक वासुदेव नांदे चराचारी |
त्याविण दुसरी वस्तु नाही ||१||
वासुदेव येथें वासुदेव तेथे |
व्यापितो सर्वातें वासुदेव ||२||
व्याप्त तो व्यापक सर्व सर्वात्मक |
सर्वातीत एक वासुदेव ||३||
ध्याता ध्यान ध्येय वासुदेवमय |
एक तो अद्वय स्वामी म्हणे ||४||

[१५२]
अंतरी विरक्ती नाहीं भाव-भक्ति |
तया अधोगती चुके चि ना ||१||
लोळती शेणांत सुखें शेणकिडे |
तैसे ते बापुडे प्रपंचांत ||२||
गुंतुनिया देहीं बुडाले संदेही |
अंती तयां नाही समाधान ||३||
भाव-भक्ती हीन कोरडे कठीण |
जळो तें जीवन स्वामी म्हणे ||४||

Thursday, May 5, 2011

[१४९]
करीं गा निष्काम स्वकर्माचरण |
नामसंकीर्तन विठ्ठलाचें ||१||
आत्म-निरीक्षण किंवा धरीं ध्यान |
स्वीकारी साधन आवडे तें ||२||
साधनी निमग्न राहें रांत्र-दिन |
तेणे होय जान चित्त-शुद्धी ||३||
होता चित्त-शुद्धी लाभे आत्म-ज्ञान |
ज्ञानें समाधान स्वामी म्हणे ||४||

[१५०]
अंतरी संतत करीं सोsहं ध्यान |
न जाई गुंतून संसारांत ||१||
धन सुत दर असूं दे पसारा
नको देऊं थारा आसक्तीतें ||२||
होवो हानि-लाभ पावो सुख-दु:ख |
न सोडीं विवेक साक्षित्वाचा ||३||
स्वामी म्हणे राहे देही उदासीन |
पाहे रांत्र-दिन आत्म-रूप ||४||

Wednesday, May 4, 2011

[१४७]
निवडावे जैसे हंसे क्षीर-नीर |
तैसे सारासार विचारावे ||१||
नामरूपात्मक जग हे मायिक |
अविनाश एक आत्म-पद ||२||
आत्म-पदीं द्यावी बुडी निश्चयाची |
आसक्ती देहाची सांडोनिया ||३||
असोनि संसारी घ्यावे आत्म-सुख
तरी चि सार्थक स्वामी म्हणे |४||

[१४८]
सगुण निर्गुण कासया हा भेद |
एकला अभेद वासुदेव ||१||
वासुदेवावीण विश्वीं नाही दुजे |
नांदतो सहजे एकला चि ||२||
अणूअणूंतून राहिला भरून |
सकळ संपूर्ण वासुदेव ||३||
आत्मा बुद्धी मन इंद्रियें विषय |
वासुदेवमय स्वामी म्हणे ||४||

Tuesday, May 3, 2011

[१४५]
देह पराधीन नाशिवंत जाण |
वाया अभिमान वाहसी कां ||१||
गुंतुनी संसारी मानिसी मी-माझे |
बाळगिसी ओझे भ्रांतीचे चि ||२||
होई सावधान विचारीं कल्याण |
जेणे समाधान पावसील ||३||
स्वामी म्हणे मोह झुगारुनी दूर |
सदा राहें स्थिर आत्म-रुपी ||४||

[१४६]
आता मज एक विठ्ठलाचा छंद |
लौकिक-संबंध दूर केला ||१||
विठ्ठलावांचून न बोले वचन |
न देखे नयन दुजें काही ||२||
मज रात्र-दिन विठ्ठलाचें ध्यान |
वाटे जीव प्राण विठ्ठल चि ||३||
स्वामी म्हणे मज विठ्ठल प्रमाण |
वाहतसे आण विठ्ठलाची ||४||

Monday, May 2, 2011

[१४३]
संतांचा सहवास आवडे जीवास |
दुणावे उल्हास अंतर्यामी ||१||
होता संत भेटी तयांचे संगती |
कराव्या एकांती गुज गोष्टी ||२||
भक्ती-सुधा-रस सेवुनी यथेष्ट |
असावें संतुष्ट आत्म-रंगी ||३||
स्वामी म्हणे मज ही चि एक आस |
संतांचा सहवास नित्य घडो ||४||

[१४४]
नेणे मी वेदात न जाणें सिद्धांत |
जाणे भगवंत सर्व काही ||१||
नेणें वज्रासन नेणें प्राणायाम |
जाणे आत्माराम सर्व काहीं ||२||
न जाणें भजन न जाणे पूजन |
जाणे जनार्दन सर्व काही ||३||
नेणें धर्माधर्म नेणें कर्माकर्म |
जाणे पुरुषोत्तम सर्व काही ||४||
स्वामी म्हणे तुज येतसें शरण
जाण मी अजाण वासुदेवा ||५||

Sunday, May 1, 2011

[१४१]
पाहे कोण कोणा तारी |
कोण कोणते संहारी ||१||
हरिविण चराचरीं |
वस्तु आहे का दुसरी ||२||
कोण सुष्ट कोण दुष्ट |
पुण्यवंत वा पापिष्ट ||३||
स्वामी म्हणे हरि-रूप |
विश्व झालें आपेंआप ||४||

[१४२]
भला देवा तुझ्या रूपासी भाळलो |
वृथा होतों मेलो संसारात ||१||
तुझे पाय मज एक चि विषय |
आतां काय भय प्रपंचाचे ||२||
विश्व चराचर तुझा चि अवतार |
ऐसा साक्षात्कार झाला जीव ||३||
स्वामी म्हणे होय तुझी नित्य भेटी |
पडे पायीं मिठी अखंडित ||४||