[२६०]
कैंचा आत्मा कैंचा देह |
माझा मी चि नि:संदेह ||१||
कैंचें कर्म कैंचा कर्ता |
अवघी एक माझी सत्ता ||२||
कैंचें विश्व कैंचें भान |
मी चि आपणा प्रमाण ||३||
मिलोनिया मीतूंपण |
स्वामी झाला सच्चिद् घन ||४||
[२६१]
राम-नामी रंगे मन |
कैंची भूक कैची तहान ||१||
कैंचा राहे देह-भाव |
नुरे दिक्कालासी ठाव ||२||
कैंची आधि कैंची व्याधी |
अवघी संपली उपाधि ||३||
नित्य निवांत निर्भय |
स्वामी झाला राममय ||४||
||श्रीकृष्णापर्णमस्तु ||
Wednesday, July 6, 2011
Tuesday, July 5, 2011
[२५७]
छाया तैसा देह मानितों स्वभावें |
नाही आम्हां ठावें सुख-दु:ख ||१||
जन्म मरणाचा संपला संसार |
झाला साक्षात्कार स्व-रूपाचा ||२||
कैंचा देश-काळ विश्व चि केवळ |
माया-मृगजळ कळों आलें ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही अनादि अनंत |
सुख-दु:खातीत स्वयंसिद्ध ||४||
[२५८]
काम-क्रोध-व्यथा नाहीं भय चिंता |
संसाराची वार्ता दूर ठेली ||१||
लौकिकाचा पांग फेडिला सहजें |
सांडोनिया ओझें अहंतेचे ||२||
न सोडवे मज आत्म-सुख गोडी |
भावें दिली बुडी प्रेम-रंगी ||३||
स्वामी म्हणे आता झालों सुख-रूप |
कोण करी माप स्वानंदाचे ||४||
[२५९]
देह नव्हे ऐसा केलों गुरु-राये |
देखिली म्या सोये स्व-रुपाची ||१||
जन्म-मरणाची संपली ते वार्ता |
दूर ठेली चिंता संसाराची ||२||
आतां आत्म-रूप झालें त्रिभुवन |
हारपले भान दिक्कालाचें ||३||
स्वामी म्हणे मन होतां चि उन्मन |
लाधलें निधन स्वानंदाचें ||४||
छाया तैसा देह मानितों स्वभावें |
नाही आम्हां ठावें सुख-दु:ख ||१||
जन्म मरणाचा संपला संसार |
झाला साक्षात्कार स्व-रूपाचा ||२||
कैंचा देश-काळ विश्व चि केवळ |
माया-मृगजळ कळों आलें ||३||
स्वामी म्हणे आम्ही अनादि अनंत |
सुख-दु:खातीत स्वयंसिद्ध ||४||
[२५८]
काम-क्रोध-व्यथा नाहीं भय चिंता |
संसाराची वार्ता दूर ठेली ||१||
लौकिकाचा पांग फेडिला सहजें |
सांडोनिया ओझें अहंतेचे ||२||
न सोडवे मज आत्म-सुख गोडी |
भावें दिली बुडी प्रेम-रंगी ||३||
स्वामी म्हणे आता झालों सुख-रूप |
कोण करी माप स्वानंदाचे ||४||
[२५९]
देह नव्हे ऐसा केलों गुरु-राये |
देखिली म्या सोये स्व-रुपाची ||१||
जन्म-मरणाची संपली ते वार्ता |
दूर ठेली चिंता संसाराची ||२||
आतां आत्म-रूप झालें त्रिभुवन |
हारपले भान दिक्कालाचें ||३||
स्वामी म्हणे मन होतां चि उन्मन |
लाधलें निधन स्वानंदाचें ||४||
Monday, July 4, 2011
[२५५]
' अहं देह ' वृत्ती पावते विनाश |
येतां उदयास आत्म-ज्ञान ||१||
अज्ञानाचा नाश करोनियां ज्ञान |
होतसे विलीन आत्म-रुपीं ||२||
' अहं आत्मा ' ह्या हि वृत्तीची निवृत्ती |
आत्म-रूप-स्थिती ती चि जाण ||३||
स्वामी म्हणे कैंची प्रवृत्ती-निवृत्ती |
शब्दातीत स्थिती स्वरूपाची ||४||
[२५६]
नाना रुपी विश्वीं नटलेंसे भासे |
परी एक असे आत्म-रूप ||१||
जैसे सान थोर होती अलंकार |
परी तें साचार सुवर्ण चि ||२||
वस्त्री ओत-प्रोत तंतु चि केवळ |
तरंगी तें जळ अभिन्नत्वें ||३||
स्वामी म्हणे तैसे विश्वी निरंतर |
स्थिर अविकार आत्म-तत्व ||४||
' अहं देह ' वृत्ती पावते विनाश |
येतां उदयास आत्म-ज्ञान ||१||
अज्ञानाचा नाश करोनियां ज्ञान |
होतसे विलीन आत्म-रुपीं ||२||
' अहं आत्मा ' ह्या हि वृत्तीची निवृत्ती |
आत्म-रूप-स्थिती ती चि जाण ||३||
स्वामी म्हणे कैंची प्रवृत्ती-निवृत्ती |
शब्दातीत स्थिती स्वरूपाची ||४||
[२५६]
नाना रुपी विश्वीं नटलेंसे भासे |
परी एक असे आत्म-रूप ||१||
जैसे सान थोर होती अलंकार |
परी तें साचार सुवर्ण चि ||२||
वस्त्री ओत-प्रोत तंतु चि केवळ |
तरंगी तें जळ अभिन्नत्वें ||३||
स्वामी म्हणे तैसे विश्वी निरंतर |
स्थिर अविकार आत्म-तत्व ||४||
Sunday, July 3, 2011
[२५३]
आड येतां विघ्न सोडी सुदर्शन |
भक्तां नारायण सांभाळितो ||१||
धरोनियां हात नेई पैलतीरा |
सोडवी संसारापासोनियां ||२||
पतित-पावन अनाथांचा नाथ |
पुरवी मनोरथ भाविकांचे ||३||
स्वामी म्हणे होई दासाचा हि दास |
येई नाना वेष धरोनियां ||४||
[२५४]
लौकिकाची मात सांडावी समस्त |
सेवावा एकांत आवडीनें ||१||
निर्वातीचा दीप तेवतो निवांत |
तैसी वृत्ती शांत असों द्यावी ||२||
अहंतेची नीद न लागो जीवास |
जागा सोsहं-ध्यास निरंतर ||३||
ठाईचि बैसोन करावें साधन |
भावें व्हावें लीन गुरुपाई ||४||
स्वामी म्हणे तुम्ही दिगंबरदास |
रहावें उदास देह-धर्मी ||५||
आड येतां विघ्न सोडी सुदर्शन |
भक्तां नारायण सांभाळितो ||१||
धरोनियां हात नेई पैलतीरा |
सोडवी संसारापासोनियां ||२||
पतित-पावन अनाथांचा नाथ |
पुरवी मनोरथ भाविकांचे ||३||
स्वामी म्हणे होई दासाचा हि दास |
येई नाना वेष धरोनियां ||४||
[२५४]
लौकिकाची मात सांडावी समस्त |
सेवावा एकांत आवडीनें ||१||
निर्वातीचा दीप तेवतो निवांत |
तैसी वृत्ती शांत असों द्यावी ||२||
अहंतेची नीद न लागो जीवास |
जागा सोsहं-ध्यास निरंतर ||३||
ठाईचि बैसोन करावें साधन |
भावें व्हावें लीन गुरुपाई ||४||
स्वामी म्हणे तुम्ही दिगंबरदास |
रहावें उदास देह-धर्मी ||५||
Saturday, July 2, 2011
[२५१]
कोण पाहे देह सबळ दुर्बळ |
झालों मी केवळ ब्रह्मरूप ||१||
कोण पाहे आतां संपत्ती विपत्ती |
जाहलीसे मति आत्म-रूप ||२||
प्रपंचाचा ठाव गेला भेद-भाव |
प्रकटला देव अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे कैंचें उरे देह-भान |
होतां चि तल्लीन आत्म-रूप ||४||
[२५२]
आलीं विघ्नें दूर सारुनी सहज |
उद्धरिलें मज पांडुरंगें ||१||
लडीवाळपणें घेतली जे आळी |
ते तूं पूर्ण केली आवडीनें ||२||
सर्व काळ माझें लक्षोनियां हित |
सांभाळूनी नीट चालविलें ||३||
स्वामी म्हणे कैसा होऊं उतराई |
तुझ्या पायी डोई ठेवियेली ||४||
कोण पाहे देह सबळ दुर्बळ |
झालों मी केवळ ब्रह्मरूप ||१||
कोण पाहे आतां संपत्ती विपत्ती |
जाहलीसे मति आत्म-रूप ||२||
प्रपंचाचा ठाव गेला भेद-भाव |
प्रकटला देव अंतर्यामी ||३||
स्वामी म्हणे कैंचें उरे देह-भान |
होतां चि तल्लीन आत्म-रूप ||४||
[२५२]
आलीं विघ्नें दूर सारुनी सहज |
उद्धरिलें मज पांडुरंगें ||१||
लडीवाळपणें घेतली जे आळी |
ते तूं पूर्ण केली आवडीनें ||२||
सर्व काळ माझें लक्षोनियां हित |
सांभाळूनी नीट चालविलें ||३||
स्वामी म्हणे कैसा होऊं उतराई |
तुझ्या पायी डोई ठेवियेली ||४||
Friday, July 1, 2011
[२४९]
देसी तरी देईं देवा मजप्रति |
संतांची संगती सर्वकाळ ||१||
हे चि एक मज पुरे वर-दान |
न मागे ह्याहून दुजें कांही ||२||
आवडीनें जीव जडो संतांपायी |
भावें घडो कांही सेवा त्यांची ||३||
स्वामी म्हणे रंगे नित्य संत संगे |
होईन निजांगें शांति-रूप ||४||
[२५०]
भलें देवा मज केलेंसी दुर्बळ |
तेणें चि निर्मळ जाहलों मी ||१||
कैसें नेणें तुझे झालें विस्मरण |
बळानें संपन्न होतों जेव्हां ||२||
शरीर सबळ असो वा दुर्बळ |
तुज सर्व काळ आठवीन ||३||
स्वामी म्हणे मन करोनियां शुद्ध |
तुझ्या चि सन्निध राहेन मी ||४||
देसी तरी देईं देवा मजप्रति |
संतांची संगती सर्वकाळ ||१||
हे चि एक मज पुरे वर-दान |
न मागे ह्याहून दुजें कांही ||२||
आवडीनें जीव जडो संतांपायी |
भावें घडो कांही सेवा त्यांची ||३||
स्वामी म्हणे रंगे नित्य संत संगे |
होईन निजांगें शांति-रूप ||४||
[२५०]
भलें देवा मज केलेंसी दुर्बळ |
तेणें चि निर्मळ जाहलों मी ||१||
कैसें नेणें तुझे झालें विस्मरण |
बळानें संपन्न होतों जेव्हां ||२||
शरीर सबळ असो वा दुर्बळ |
तुज सर्व काळ आठवीन ||३||
स्वामी म्हणे मन करोनियां शुद्ध |
तुझ्या चि सन्निध राहेन मी ||४||
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