सदैव मार्गी चालत असता मजला देतो हात
उठतां बसतां उभा पाठिशीं त्रलोक्याचा नाथ ।।९८।।
प्रसन्न मन सहजासन सु-वसन अर्धोन्मीलित नेत्र
स्व-स्थ अन्तरीं तत्पद-चिंतन करी दिन-रात्र ।।९९।।
निधान सन्निध परि घोर तमीं इतस्ततः भ्रमलो मी
ज्ञान-किरण-दर्शनें अतां सत्प्रकाश अन्तर्यामीं ।।१००।।
उठतां बसतां उभा पाठिशीं त्रलोक्याचा नाथ ।।९८।।
प्रसन्न मन सहजासन सु-वसन अर्धोन्मीलित नेत्र
स्व-स्थ अन्तरीं तत्पद-चिंतन करी दिन-रात्र ।।९९।।
निधान सन्निध परि घोर तमीं इतस्ततः भ्रमलो मी
ज्ञान-किरण-दर्शनें अतां सत्प्रकाश अन्तर्यामीं ।।१००।।
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